श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 649, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें11/38-40 ]
श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंमें निमग्न रहता था और वे निरन्तर श्रीकृष्णके साथ बाल्यलीला करते थे॥३८-३९॥
अनुभाष्य—'सदाशिव कविराज और नागर पुरुषोत्तम'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— "सदाशिव कविराज महाभाग्यवान्। यॉर पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास नाम॥741॥ बाह्य नाहि पुरुषोत्तम दासेर शरीरे। नित्यानन्दचन्द्र यॉर हृदये विहरे॥742॥"
"महाभाग्यवान् सदाशिव कविराजके पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास थे। श्रीपुरुषोत्तम दासको अपने बाह्य शरीरका ज्ञान नहीं रहता था, क्योंकि उनके हृदयमें सदा श्रीनित्यानन्द प्रभु विहार करते थे।” गौरगणोद्देशदीपिका 156 श्लोकमें— "पुरा चन्द्रावली यासीद्व्रजे कृष्णप्रिया परा। अधुना गौड़देशे सा कविराजः सदाशिवः॥156॥"
"ब्रजमें जो पहले श्रीकृष्णकी परमप्रिया चन्द्रावली थीं, वे अब गौड़देशमें सदाशिव कविराज हैं।” गौरगणोद्देशदीपिका 131 श्लोकमें— "सदाशिवसुतो नाम्ना नागरः पुरुषोत्तमः। वैद्यवंशोद्भवो नाम्ना दामा योबल्लवो ब्रजे॥131॥"
"ब्रजमें 'दाम' नामक गोप सखा अब वैद्यवंशमें उत्पन्न सदाशिवके पुत्र नागर-पुरुषोत्तम हैं।”
सदाशिव कविराजके पिता कंसारि सेन श्रीकृष्णलीलामें ब्रजकी 'रत्नावली' सखी हैं। कोई-कोई कहते हैं कि कंसारि सेनका निवास गुप्तिपाड़ामें हैं, परन्तु अब इसका कोई चिह्न वहाँ नहीं दिखायी देता। जो भी हो, इन सबकी भाँति चार पुरुष-परम्परा (श्रीकंसारिसेन, उनके पुत्र श्रीसदाशिव कविराज, उनके पुत्र श्रीपुरुषोत्तम दास और उनके पुत्र श्रीकानु ठाकुर) से सिद्ध गौरभक्त अन्यत्र विरले ही हैं।
श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरका श्रीपाट पहले चाकदह और सुखसागरमें था। पहले बेलेडाङ्गा गाँवके ध्वंस हो जानेसे श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरके सभी श्रीविग्रह सुखसागरमें लाये गये। परन्तु बादमें सुखसागरके भी गङ्गाके गर्भमें समा जानेसे, उस स्थानपर श्रीजाह्नवा-माताकी जो गद्दी थी, उस गद्दीके श्रीविग्रहोंके साथ पुरुषोत्तम ठाकुरके भी श्रीविग्रह साहेबडाङ्गा बेड़ीग्राममें आये। बेड़ीग्राम ध्वंस होनेपर जाह्नवा-माताके गद्दीके श्रीविग्रहोंके साथ पुरुषोत्तम ठाकुरके श्रीविग्रह प्राय पचास वर्ष तक नदीया जिलाके अन्तर्गत चान्दुड़े-गाँवमें विराजमान थे। प्राचीन सुखसागर नदीगर्भमें समा जानेके कारण नवीन सुखसागर इस चांदुड़े-गाँवसे 3-4 मीलकी दूरीपर कालीगञ्जके दक्षिणमें अवस्थित है।
श्रीनित्यानन्द प्रभुके दामाद (श्रीमती गङ्गादेवीके पतिदेव) जिराट्-निवासी श्रीमाधवाचार्य (माधव चट्टोपाध्याय) किसी-किसीके मतानुसार श्रीनित्यानन्द प्रभुके और किसी-किसीके मतानुसार श्रीजाह्नवादेवीके तथा किसी-किसीके मतानुसार इन श्रीपुरुषोत्तम ठाकुरके शिष्य थे। 'वैष्णव-वन्दना' के लेखक श्रीदेवकीनन्दन दास इन्हींके ही शिष्य थे, इस बातका वैष्णव वन्दनामें स्पष्ट उल्लेख है।
वर्तमान मन्दिर मिट्टीकी दीवारोंपर फूसकी छतसे बना घर है। मन्दिरगृहमें श्रीजगन्नाथ, श्रीबलराम, सुभद्रा, निताइ-गौर-दो-दो विग्रह, गोपीनाथ, जाह्नवा-माता, बालगोपाल, राधागोविन्द-पाँचयुगल; रेवती और श्रीबलराम, एवं शालग्राम विराजित हैं। किसी-किसीका ऐसा कहना है कि इनमेंसे कुछ श्रीमूर्तियाँ पुरुषोत्तम ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित हैं एवं शेष श्रीमूर्तियाँ जाह्नवा-देवीकी गद्दीकी हैं। यह श्रीपाट 'वसु-जाह्नवाका श्रीपाट' के नामसे भी विख्यात है। निम्नलिखित सेवायेत महान्तगणोंके नाम चादुंड़े-श्रीपाटमें मिलते है,—(1) गोपालदास महान्त, (2) रामकृष्ण, (3) बिहारीदास, (4) रामदास, (5) गोपालदास और (6) सीतानाथ दास॥38-39॥
(25) कानु ठाकुर :- तॉर पुत्र-महाशय श्रीकानु ठाकुर। यॉर देहे रहे कृष्ण-प्रेमामृतपूर॥40॥
अनुवाद—श्रीपुरुषोत्तमदासके पुत्र श्रीकानु ठाकुर हैं,
ग्यारहवाँ अध्याय | 113