श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 650, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/40 जिनके देहमें श्रीकृष्णप्रेमका अमृत सदा परिपूर्ण रहता है॥ 40 ॥ अनुभाष्य - 'कानु ठाकुर' - कोई-कोई इन्हें द्वादशगोपालोंमें अन्यतम कहते हैं। इनका निवास बोधखाना है। ठाकुर कानाइके पूर्वजोंमें चतुर्थ पुरुष (चार पीढ़ी पूर्व-पितामहके पितामह) श्रीकंसारि सेनका नाम 'सम्बरारि' है। देवकीनन्दनने वैष्णव-वन्दनामें ठाकुर कानाइके पूर्वज चार पुरुषोंका नाम उल्लेख किया है,- “श्रीकंसारि सेन वन्दों सेन श्रीवल्लभ। सदाशिव कविराज वन्दों एक मने। निरन्तर प्रेमोन्माद, बाह्य नाहि जाने। इष्टदेव वन्दों श्रीपुरुषोत्तम नाम। के कहिते पारे ताँर गुण अनुपाम॥” “सदाशिवके पुत्र पुरुषोत्तम ठाकुर हैं और पुरुषोत्तम ठाकुरके पुत्र ही कानुठाकुर हैं। कानुठाकुरके वंशज पुरुषोत्तम ठाकुरको 'नागर पुरुषोत्तम' से पृथक् मानते हैं। उनका कहना है कि 'दास पुरुषोत्तम' के रूपमें जिनका नाम गौरगणोद्देशमें उल्लिखित है, एवं ब्रजलीलामें जो स्तोक-कृष्ण हैं, वही कानु ठाकुरके पिता हैं, परन्तु गौरगणोद्देशमें वैद्यवंशमें आविर्भूत सदाशिवके पुत्र पुरुषोत्तम ही 'नागर पुरुषोत्तम' के रूपमें उल्लिखित हैं। वे 'नागर पुरुषोत्तम' ब्रजलीलामें 'दाम' नामक सखा हैं। कानुठाकुरके वंशजोंमें एक किंवदन्ती प्रचलित है कि पुरुषोत्तम ठाकुर गङ्गाके पूर्वीतटपर 'सुखसागर' नामक गाँवमें रहते थे। पुरुषोत्तमकी पत्नीका नाम 'जाह्नवा' था। ठाकुर कानाइके जन्मके बाद ही जाह्नवा अप्रकट हो गयीं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने जब पुरुषोत्तम ठाकुरकी धर्मपत्नीके वियोगकी बात सुनी, तब वे उनके घर आये और बारह दिनके शिशु (कानु ठाकुर) को अपने भवन खड़दह ले गये। कानुठाकुरके वंशजोंके मतानुसार 1457 शकाब्दमें (बङ्गाब्द 942 वर्ष) आषाढ़-मासकी शुक्ला-द्वितीय बृहस्पतिवारको रथयात्राके दिन कानाइ ठाकुर आविर्भूत हुये थे। बचपनसे ही ठाकुरमें कृष्णभक्ति-परायणताको देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनका नाम 'शिशुकृष्णदास' रखा था। शिशुकृष्णदास जब पाँच वर्षके थे, तब ईश्वरी जाह्नवा-माताके साथ श्रीवृन्दावन-धाम गये थे। श्रीजीव गोस्वामी आदि प्रमुख व्रजवासियोंने शिशुकृष्णदासके भावादिको देखकर उन्हें 'ठाकुर कानाइ' नाम प्रदान किया। जनश्रुति है कि ठाकुर कानाइ जब वृन्दावनमें कीर्त्तनके आनन्दमें विह्वल होकर नृत्य कर रहे थे, तब उनके दक्षिण पैरका एक नूपुर अन्तर्हित हो गया, तब ठाकुर कानाइने कहा कि 'जिस स्थानपर यह नूपुर गिरा है, मैं उसी स्थानपर निवास करूँगा।' सुननेमें आता है कि यशोहर जिलाके 'बोधखाना' नामक गाँवमें यह नूपुर गिरा था, तबसे ठाकुर कानाइ 'बोधखाना' में आकर रहने लगे। इनकी वंश-परम्परामें एक और जनश्रुति प्रचलित है कि श्रीमन्महाप्रभुके आविर्भावके कुछ सौ वर्ष पूर्वसे सदाशिवके किसी पूर्वजके द्वारा प्रतिष्ठित 'प्राणवल्लभ' विग्रहकी सेवा चली आ रही थी। ये 'प्राणवल्लभ' अभी भी बोधखानामें सेवित हो रहे हैं। 'साम्प्रदायिक दङ्गों' के समय ठाकुर कानाइके ज्येष्ठ पुत्रकी सन्तानोंको छोड़कर वंशीवदन आदि अन्यान्य पुत्र बोधखाना छोड़कर भाग गये एवं नदीया जिलाके अन्तर्गत 'भाजनघाट' नामक गाँवमें जाकर रहने लगे। ठाकुर कानाइके छोटे पुत्रोंमेंसे 'हरिकृष्ण गोस्वामी' 'साम्प्रदायिक दङ्गों' के मिट जानेके पश्चात् बोधखानामें आये। इन्होंने 'प्राणवल्लभ' नामसे और एक नये विग्रहकी प्रतिष्ठा की। अभी भी बोधखाना गाँवमें ठाकुर कानाइके ज्येष्ठ पुत्रोंके वंशजोंके द्वारा प्राचीन 'श्रीप्राणवल्लभ' की और कनिष्ठ पुत्रके वंशजोंके द्वारा नये प्रतिष्ठित 'प्राणवल्लभ' की सेवा हो रही है। भाजनघाटमें 'श्रीराधावल्लभ' विग्रह सेवित हो रहे हैं। प्रेमविलास-ग्रन्थमें लिखा है कि कानु ठाकुर खेतरिके उत्सवके समय श्रीजाह्नवा-देवी और श्रीवीरभद्रप्रभुके साथ वहाँ उपस्थित थे। 114 | श्रीचैतन्यचरितामृत