भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 651

11/40-41 ] पुरुषोत्तम ठाकुर और कानु ठाकुरके अनेक ब्राह्मण शिष्य थे। पुरुषोत्तम ठाकुरके ब्राह्मण शिष्योंमेंसे प्रधान चारके नाम इस प्रकारसे वर्णित हैं— “तस्य प्रियतमाः शिष्याश्चत्वारो ब्राह्मणोत्तमाः। श्रीमुखो माधवाचार्यो यादवाचार्यो-पण्डित॥ देवकीनन्दन-दासः प्रख्यातो गौड़मण्डले। येनैव रचिता पुस्ती श्रीमद्वैष्णव-वन्दना॥” “श्रीमुख, श्रीमाधवाचार्य, श्रीयादवाचार्य और श्रीदेवकीनन्दन दास उनके प्रिय चार उत्तम ब्राह्मण शिष्य थे। गौड़मण्डलमें विख्यात श्रीदेवकीनन्दन दासने श्रीमद्वैष्णव-वन्दना ग्रन्थकी रचना की थी।” ये माधवाचार्य श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कन्या गङ्गादेवीके पति हैं। सुखसागर गाँव ध्वंस हो जानेके पश्चात् पुरुषोत्तमके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीविग्रह चादुड़ियाँमें लाये गये। आजकल जिराट्के गङ्गा-वंशजोंकी देखरेखमें उनके अन्यान्य विग्रहके साथ सेवित हो रहे हैं। पुरुषोत्तम ठाकुरका श्रीपाट ‘वसु-जाह्नवाका’ श्रीपाट नामसे भी कहा जाता है। कानु ठाकुरके शिष्योंने मेदिनीपुर-जिलाके शिलावती नदीके पास गड़वेता नामक गाँवमें वास किया। सामवेदीय कौथुमी-शाखाके राढ़ीश्रेणीय “श्रीराम’ नामक एक ब्राह्मण कानाइ ठाकुरके प्रसिद्ध शिष्य थे॥40॥ (26) उद्धारण ठाकुर (गोपाल-11) :— महाभागवत-श्रेष्ठ दत्त उद्धारण। सर्वभावे सेवे नित्यानन्देर चरण॥41॥ अनुवाद—उद्धारण दत्त श्रेष्ठ महाभागवत थे। वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणोंकी सभी प्रकारसे सेवा करते थे॥41॥ अनुभाष्य—‘उद्धारणदत्त’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 129वाँ श्लोक)— “सुबाहुर्यो ब्रजे गोपो दत्त उद्धारणाख्यकः॥129(क)॥” “ब्रजके ‘सुबाहु’ नामक गोप अब उद्धारण दत्त कहलाते हैं।” इनका निवास स्थान हुगली जिलाके अन्तर्गत सप्तग्राममें हैं। पहले ‘सप्तग्राम’ कहनेसे वासुदेवपुर, बाँशवेड़िया, कृष्णपुर, नित्यानन्दपुर, शिवपुर, शङ्खनगर और सप्तग्रामको समझा जाता था। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “उद्धारण दत्त महावैष्णव उदार। नित्यानन्द-सेवााय याँहार अधिकार॥743॥” “उद्धारण दत्त महावैष्णव और परम उदार थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सेवामें उनका अधिकार था।” चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “कतदिन थाकि’ नित्यानन्द खड़दहे। सप्तग्राम आइलेन सर्वगण सहे॥443॥ उद्धारण दत्त भाग्यवन्तरे मन्दिरे। रहिलेन प्रभुवर त्रिवेणीर तीरे॥449॥ कायमनोवाक्ये नित्यानन्देर चरण। भजिलेन अकैतवे दत्त उद्धारण॥450॥ यतेक वणिककुल उद्धारण हैते। पवित्र हइल, द्विधा नाहिक इहाते॥453॥” “खड़दहमें कुछ दिन रहकर श्रीनित्यानन्द प्रभु सभी परिकरोंके साथ सप्तग्राममें पधारे। त्रिवेणीके तटपर स्थित सप्तग्राममें उद्धारण दत्तके घरमें प्रभु ठहरे। उद्धारण दत्तने निष्कपट भावसे काय-मन-वाक्यके द्वारा श्रीनित्यानन्दके चरणोंकी सेवा की। वहाँ जितने भी वणिक कुल थे, सभी उद्धारण दत्तके कारण पवित्र हो गये, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है।” उद्धारण दत्त शौक्रसुवर्णवणिक (सोनेके व्यापारी) कुलमें आविर्भूत हुये थे। सप्तग्राममें श्रीउद्धारण ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित और उनके हाथोंसे सेवित महाप्रभुकी षड्भुज मूर्ति है। उनके दायीं ओर श्रीनित्यानन्द प्रभु और बायीं ओर श्रीगदाधर विराजमान हैं। श्रीराधागोविन्द मूर्ति, श्रीशालग्राम और सिंहासन-बेदीके नीचे श्रीउद्धारण ठाकुर महाशयका चित्रपट अर्चित होता है। वर्तमान श्रीमन्दिरके सामने एक बड़ा नाट्य-मन्दिर है। नाट्य-मन्दिरके प्रत्येक ग्यारहवाँ अध्याय | 115