भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 652

[ 11/41-43

स्तम्भपर स्मृतिरक्षक पत्थरके पटलोंपर मन्दिरके निर्माता और श्रीपाटके संस्कार करवानेवालोंके नाम खुदे हुए हैं। नाट्यमन्दिरके सामने ही एक सुशीतल छायापूर्ण माधवी-मण्डप है। माधवी-मण्डपके दोनों ओर दो स्तम्भ हैं, एकमें उद्धारण ठाकुर महाशयका चित्रपट और दूसरेमें पत्थरके पटलपर चतुर्युगके चार तारक-ब्रह्मनाम खुदे हुए हैं। 1283 (बङ्गाब्द) वर्षमें निताइदास बाबाजी नामक एक भिक्षुने श्रीपाटके लिये बारह बीघा भूमि संग्रह की थी। तत्पश्चात् किसी-किसीकी विशेष चेष्टासे श्रीपाटकी सेवा कुछ दिनोंतक चलनेपर भी धीरे-धीरे सेवामें कमी होती गयी। तदुपरान्त 1306 (बङ्गाब्द) वर्षमें हुगलीके भूतपूर्व सब-जज बलराम मल्लिक और कोलकाता-निवासी अनेक धनी सुवर्ण-व्यापारियोंकी एकजुट चेष्टासे पुनः श्रीपाटकी सेवामें कुछ परिपाटी दिखाई देने लगी। 1875 ईसवीके लगभग पहले एक टूटी-फूटी कुटियामें हुगली-वालि-निवासी परलोकगत जगमोहन दत्तके द्वारा प्रतिष्ठित श्रील उद्धारण ठाकुरकी एक दारुमयी (लकड़ीकी) श्रीमूर्त्ति विराजित थी। वह श्रीमूर्त्ति अब सप्तग्राम-श्रीपाटमें नहीं है। उनका चित्रपट ही अब पूजित हो रहा है। लगभग सौ वर्ष पूर्व अनुसन्धानसे सुना गया था कि उद्धारण ठाकुरकी वह श्रीमूर्त्ति तब हुगली-वालि-निवासी श्रीमदन दत्त महोदयके घरमें और ठाकुरके द्वारा सेवित श्रीशालग्राम उसी गाँवमें श्रीनाथ दत्तके घरमें विराजमान थे। ठाकुर उद्धारण काटोयासे डेढ़ मील उत्तरी दिशाकी ओर 'नैहाटी'-गाँवमें राजाके दीवान थे। दाँइहाट स्टेशनके निकट अभी भी राजवंशके लोगोंके महलोंके भग्नावशेष दिखायी देते हैं। ठाकुर राजकार्यके उपलक्ष्यमें जिस स्थानपर वास करते थे, उस स्थानका नाम 'उद्धारण-पुर' है। कहा जाता है कि ठाकुरके द्वारा प्रतिष्ठित यहाँके श्रीनिताइगौर-विग्रह वनओयारीबादकी राजधानीसे लाये गये थे। इस स्थानपर स्थित मन्दिरके पश्चिम ओर (और किसी-किसीके मतानुसार, वृन्दावनमें) ठाकुरकी समाधि वर्तमान है। किसीके मतानुसार, ठाकुरके पिताका नाम श्रीकर, माताका नाम भद्रावती और पुत्रका नाम श्रीनिवास है॥41॥ (27) वैष्णवानन्द आचार्य :- आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति-अधिकारी। पूर्वे नाम छिल याँर 'रघुनाथ पुरी' ॥ 42 ॥ अनुवाद-आचार्य वैष्णवानन्द परम भक्त थे और उनका पहले नाम रघुनाथपुरी था॥42॥ अनुभाष्य-'वैष्णवानन्द आचार्य'-चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय- “आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार। पूर्वे 'रघुनाथपुरी'-नाम ख्याति याँर ॥ 746 ॥ ” “आचार्य वैष्णवानन्द परम उदार थे। पहले ये रघुनाथपुरीके नामसे विख्यात थे।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 96-97वाँ श्लोक)- “वृन्दावने याः प्रागासन्नणिमाद्याष्टसिद्धयः। ता एवाष्टौ भक्तरूपा भूता गौड़े च ते यथा॥96॥ अनन्तश्च सुखानन्दो गोविन्दो रघुनाथकः। कृष्णानन्दः केशवश्च श्रीदामोदर-राघवौ। पुर्युपाधिक्रमाज्ज्ञेया अणिमाद्यष्टसिद्धयः॥97॥” “पूर्वकालमें श्रीवृन्दावनमें जो अणिमा आदि अष्टसिद्धियाँ थीं, उन्होंने गौड़देशमें आठ भक्तोंके रूपमें जन्म ग्रहण किया है। क्रमसे उन आठोंके नाम इस प्रकार हैं, यथा-अनन्त, सुखानन्द, गोविन्द, रघुनाथ, कृष्णानन्द, केशव, दामोदर और राघव। ये आठों 'पुरी' उपाधिसे युक्त थे॥”42॥ (28) विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास-तीन भाई :- विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास,-तिन भाइ। पूर्वे याँर घरे छिला ठाकुर निताइ ॥ 43 ॥ अनुवाद-विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास-ये तीन भाई थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आनेपर पहले इनके घरमें आकर रहे थे॥43॥

116 | श्रीचैतन्यचरितामृत