भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 653

11/43-46 ] अनुभाष्य—'विष्णुदास, नन्दन और गङ्गादास'—ये तीनों भाई नवद्वीपवासी भट्टाचार्य हैं। विष्णुदास और गङ्गादास कुछ दिनोंके लिये नीलाचलमें महाप्रभुके पास रहे थे (चैःचः आदिलीला, 10/151 संख्या)। नन्दनाचार्यके घरमें महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्य छिपे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभुने भी नवद्वीपमें आकर कुछ दिन इनके घरमें वास किया था। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “चतुर्भुज पण्डित-नन्दन गङ्गादास। पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर विलास॥ 745॥” “चतुर्भुज पण्डितके पुत्र गङ्गादासके घर किसी एक समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने विहार किया था॥”43॥ (29) परमानन्द उपाध्याय, (30) जीव पण्डित :- नित्यानन्दभृत्य—परमानन्द उपाध्याय। श्रीजीव पण्डित नित्यानन्द-गुण गाय॥ 44॥ अनुवाद—परमानन्द उपाध्याय श्रीनित्यानन्द प्रभुके सेवक थे और श्रीजीव पण्डित श्रीनित्यानन्द प्रभुका गुणगान करते थे॥ 44॥ अनुभाष्य—'परमानन्द उपाध्याय'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “परमानन्द उपाध्याय—वैष्णव एकान्त॥ 744॥” “परमानन्द उपाध्याय ऐकान्तिक वैष्णव थे।” 'श्रीजीव पण्डित'—ये श्रीनित्यानन्द प्रभुके पिता श्रीहाड़ाइ ओझाके बाल्यकालके मित्र रत्नगर्भ आचार्यके मंझले पुत्र हैं। चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “महाभाग्यवन्त जीवपण्डित उदार। याँर घरे नित्यानन्दचन्द्रेर विहार॥ 751॥” “जीव पण्डित उदार और महाभाग्यवान् हैं, क्योंकि उनके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने विहार किया था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 169वाँ श्लोक)— “इन्दिरा जीवपण्डितः॥ 169(ख)॥” “श्रीजीव पण्डित व्रजकी इन्दिरा हैं॥”44॥ (31) परमानन्द गुप्त :- परमानन्द गुप्त—कृष्णभक्त महामति। पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर वसति॥ 45॥ अनुवाद—परमानन्द गुप्त बहुत बुद्धिमान और श्रीकृष्ण भक्त थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके घरमें भी रहे थे॥ 45॥ अनुभाष्य—'परमानन्द गुप्त'—चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “प्रसिद्ध परमानन्द गुप्त महाशय। पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर आलय॥ 747॥” “प्रसिद्ध परमानन्द गुप्त महाशयके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुका अवस्थान था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 194 एवं 199वाँ श्लोक)— “मालती चन्द्रलतिका 'मञ्जुमेधा' वराङ्गदा॥ 194(क)॥ 'परमानन्दगुप्तो' यत्कृता कृष्णस्तवकवली॥ 199(ख)॥” “व्रजकी मञ्जुमेधा वही परमानन्द गुप्त हैं, जिन्होंने श्रीकृष्ण 'स्तवावली' की रचना की है॥”45॥ (32) नारायण, (33) कृष्णदास, (34) मनोहर, (35) देवानन्द :- नारायण, कृष्णदास, आर मनोहर। देवानन्द—चारि भाइ निताइ-किङ्कर॥ 46॥ अनुवाद—नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानन्द—ये चारों भाई श्रीनित्यानन्द प्रभुके दास थे॥ 46॥ अनुभाष्य—'नारायण, कृष्णदास, मनोहर और देवानन्द'— चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय— “कृष्णदास, देवानन्द—दुइ शुद्धमति॥ 749(क)॥ नित्यानन्दप्रिय 'मनोहर', नारायण'। 'कृष्णदास', 'देवानन्द'—एइ चारिजन॥ 752॥” “कृष्णदास और देवानन्द, ये दोनों शुद्धमति थे। मनोहर, नारायण, कृष्णदास और देवानन्द—ये चारों श्रीनित्यानन्द प्रभुके अति प्रिय थे॥”46॥ ग्यारहवाँ अध्याय | 117