भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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11/51–56 ] और श्रीनिवासाचार्य प्रभुके प्रचार और भजनके प्रधान एवं प्रियतम सङ्गी थे। इन्होंने पहले श्रीखण्डमें और बादमें भागीरथीके तटपर ‘कुमारनगर’ में आकर वास किया (भक्तिरत्नाकर द्रष्टव्य है)। ‘गोविन्द कविराज’—खण्डवासी चिरञ्जीवके कनिष्ठ पुत्र एवं रामचन्द्र कविराजके भाई है। ये पहले शाक्त थे और बादमें श्रीनिवासाचार्य प्रभुके दीक्षित शिष्य हुए। इन्होंने पहले श्रीखण्ड में, बादमें कुमारनगर में, तत्पश्चात् पद्मानदीके दक्षिण तटपर ‘तेलिया बुधरि’ गाँवमें आकर वास किया। इनकी काव्य-प्रतिभाको देखकर श्रीजीव गोस्वामी प्रभुने इन्हें भी ‘कविराज’ नाम प्रदान किया था। ये ‘सङ्गीत-माधव’ नाटक और ‘गीतामृत’ आदि ग्रन्थोंके रचयिता हैं (भक्तिरत्नाकर नवम तरङ्ग द्रष्टव्य है)॥51॥ (64) पीताम्बर, (65) माधवाचार्य, (66) दामोदर, (67) शङ्कर, (68) मुकुन्द, (69) ज्ञानदास, (70) मनोहर :— पीताम्बर, माधवाचार्य, दास दामोदर। शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर ॥ 52 ॥ (71) गोपाल, (72) रामभद्र, (73) गौराङ्गदास, (74) नृसिंह-चैतन्य, (75) मीनकेतन :— नर्त्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्गदास। नृसिंहचैतन्य, मीनकेतन रामदास ॥ 53 ॥ अनुवाद—पीताम्बर, माधवाचार्य, दामोदरदास, शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास, मनोहर, नर्त्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्गदास, नृसिंह-चैतन्य और मीनकेतन रामदास, ये भी श्रीनित्यानन्द प्रभुके अन्य दास थे॥52-53॥ अनुभाष्य—‘मीनकेतन रामदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 68वाँ श्लोक)— “मीनकेतन-रामादिव्यूहः सङ्कर्षणोऽपरः॥68(ख)॥” “मीनकेतन रामदास (श्रीकृष्णके) आदिव्यूह-श्रीबलदेवके अन्य रूप सङ्कर्षण (अर्थात् श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अभिन्न विग्रह) हैं॥”53॥ (76) श्रीठाकुर वृन्दावनदास :— वृन्दावनदास—नारायणीर नन्दन। ‘चैतन्य-मङ्गल’ येंहो करिल रचन ॥ 54 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके एक अन्य प्रमुख दास नारायणीदेवीके पुत्र श्रीवृन्दावनदास थे, जिन्होंने चैतन्य-मङ्गलकी रचना की थी॥54॥ अनुभाष्य—‘वृन्दावनदास’—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 109वाँ श्लोक)— “वेदव्यासो य एवासीद्वासो वृन्दावनोऽधुना। सखा यः कुसुमापीडः कार्यतस्तं समाविशत्॥109॥” “श्रीवेदव्यास ही अब श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं। व्रजके कुसुमापीड नामक सखा भी कार्यवशतः इनमें प्रविष्ट हुए हैं।” ये श्रीवास पण्डितकी भतीजी नारायणीदेवीके पुत्र और चैतन्यभागवतके लेखक हैं। भाष्यकार-कृत चैतन्यभागवतकी भूमिकामें ‘ठाकुरकी जीवनी’ शीर्षक प्रबन्ध द्रष्टव्य है॥54॥ इति अनुभाष्ये एकादश परिच्छेद। ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। व्यासदेवके द्वारा श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णलीला और श्रीचैतन्यभागवतमें श्रीगौरलीलाका वर्णन :— भागवते कृष्णलीला वर्णिला वेदव्यास। चैतन्य-लीलाते व्यास—वृन्दावनदास ॥ 55 ॥ अनुवाद—जिस प्रकार वेदव्यासजीने भागवतमें श्रीकृष्णकी लीलाका वर्णन किया है, उसी प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाके व्यास वृन्दावनदास हैं॥55॥ वीरभद्रगोसाई-शाखा—सर्वश्रेष्ठ :— सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र गोसाञि। ताँर उपशाखा यत, तार अन्त नाइ ॥ 56 ॥ अनुवाद—वीरभद्र गोसाईं श्रीनित्यानन्द प्रभुकी सर्वश्रेष्ठ शाखा हैं और उनकी अनन्त उपशाखाएँ हैं॥56॥ ग्यारहवाँ अध्याय | 119