भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 656

[ 11/57-61 असंख्य श्रीनित्यानन्दगण :- अनन्त नित्यानन्दगण—के करु गणन। आत्मपवित्रता-हेतु लिखिलाङ कत जन॥ 57॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके असंख्य भक्त हैं, जिनकी गणना कौन कर सकता है? मैंने तो केवल स्वयंको पवित्र करनेके उद्देश्यसे कुछ भक्तोंका यहाँ उल्लेख किया है॥ 57॥ इन सबके श्रीकृष्णप्रेमदानसे जगत्का उद्धार :- एइ सर्वशाखा पूर्ण-पक्व प्रेमफले। यारे देखे, तारे दिया भासाइल सकले॥ 58॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके सभी परिकर पके हुए प्रेमफलसे पूर्ण थे। श्रीनित्यानन्दके भक्त जिसपर भी दृष्टिपात करते थे, उसे प्रेममें डुबो देते थे॥ 58॥ इन सबकी निरन्तर श्रीकृष्णप्रीति-चेष्टा :- अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा अनर्गल। प्रेम दिते, कृष्ण दिते सबे धरे महाबल॥ 59॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंमें प्रचुर प्रेम था और उसे वितरण करनेमें उन्हें कोई भी बाधा नहीं आती थी। उनमें इतना बल था कि वे किसीको भी श्रीकृष्णप्रेम और स्वयं श्रीकृष्णको भी प्रदान करनेमें सक्षम थे॥ 59॥ संक्षेपे कहिलाङ एइ नित्यानन्दगण। याँहार अवधि ना पाय 'सहस्रवदन' ॥ 60॥ अनुवाद—मैंने संक्षेपमें इन श्रीनित्यानन्द प्रभुके भक्तोंका वर्णन किया है, अनन्त-शेष भी अपने हजारों मुखोंसे वर्णन करके भी जिनका अन्त नहीं पाते हैं॥ 60॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥ 61॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे नित्यानन्द-स्कन्ध-शाखावर्णनं नाम एकादश-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 61॥ श्रीश्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डका श्रीनित्यानन्द-स्कन्धकी शाखाओंका वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।