भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 659

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बारहवाँ अध्याय बारहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें श्रीअद्वैतप्रभुकी सभी शाखाओंका वर्णन करके उनमेंसे श्रीअच्युतानन्दके मतानुयायी वैष्णवोंको 'सारग्राही' और अन्य सभीको 'असार' कहकर निर्देश किया गया है। अन्तमें श्रीगदाधर पण्डित-गोस्वामीकी शाखाका वर्णन करके इस अध्यायको समाप्त किया है। इस अध्यायके मध्यमें श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र गोपाल मिश्र और श्रीअद्वैताचार्यके सेवक कमलाकान्त विश्वासके दो उपाख्यानोंका वर्णन हुआ है। छोटी आयुमें श्रीगोपालका गुण्डिचा-मन्दिर मार्जनके समय प्रेम-मूर्च्छाको प्राप्त होना और श्रीमन्महाप्रभुकी कृपासे उनकी मूर्च्छा भङ्ग होनेका प्रसङ्ग वर्णित है। आचार्यके सेवक कमलाकान्त विश्वासने राजा प्रतापरुद्रसे श्रीअद्वैतप्रभुके तीन सौ मुद्राओंके ऋणशोधनकी भिक्षाके लिये पत्र लिखा और महाप्रभुको यह पता लगनेपर उस पागल विश्वासको दण्ड प्रदान किया और श्रीअद्वैताचार्यके अनुरोधपर उसका शोधन किया। (अमृतप्रवाह भाष्य) सारग्राही और असारग्राही-भेदसे दो प्रकारके श्रीअद्वैतदास :— अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गांस्तान् सारासारभृतोऽखिलान्। हित्वाऽसारान् सारभृतो नौमि चैतन्यजीवनान्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभुके अनुगतजन दो प्रकारके हैं—'सारग्राही' और 'असारग्राही'। इन दोनोंमेंसे असारवाहियोंका परित्यागकर समस्त सारग्राही चैतन्यदासोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य—सारासारभृतः (सारः अद्वैतानुगो गौरहरिजनः, असारः तदनुगाभिमानी गौरहरि-विमुखजनः, तौ विभ्रतीति तान्) अखिलान् (सर्वान्) अद्वैताङ्घ्र्यब्जभृङ्गान् (अद्वैतस्य अङ्घ्री एव अब्जे तयोः भृङ्गान् भ्रमरान् अद्वैतसेवकान्) [मत्वा] असारवान् (तदनुप्रयान् शुद्धभक्तिरहितान् मायावादिनः) हित्वा (त्यक्त्वा) चैतन्यजीवनान् (चैतन्य एव जीवनं येषां तान् गौरप्राणान्) सारभूतः (सारग्राहिणः भागवतान्) नौमि (नमस्करोमि)। श्लोक भावानुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके दो प्रकारके अनुगतजन हैं—श्रीअद्वैतानुग जो श्रीगौरहरिको समर्पित हैं, वे सारग्राही हैं और जो अपनेमें केवल श्रीअद्वैतानुग होनेका अभिमान करते हैं, परन्तु श्रीगौरहरिके विमुख हैं, वे असारग्राही है। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुके चरणकमलोंके समस्त भ्रमरोंमेंसे असारग्राहियोंको छोड़कर शेष जिनका जीवन ही चैतन्य महाप्रभु हैं, ऐसे गौरगतप्राण सारग्राही भक्तोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ जय जय महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥२॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो; धन्य श्रीअद्वैत प्रभुकी जय हो॥२॥ गौरभक्त सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंकी वन्दना :— श्रीचैतन्यामरतरौर्द्वितीयस्कन्धरूपिणः। श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् गणान्नुमः॥३॥ अनुवाद—अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥३॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यामरतरोः (गौरामरवृक्षस्य) द्वितीय स्कन्धरूपिणः श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् (वृक्षशाखातुल्यान्) गणान् (आश्रितजनान्) [वयं] नुमः (नमस्कुर्मः)। श्लोक भावानुवाद—श्रीचैतन्य कल्पवृक्षके दूसरे स्कन्धरूप श्रीमद्-अद्वैतचन्द्रकी शाखारूप उनके आश्रितजनोंको मैं प्रणाम करता हूँ॥३॥ वृक्षेर द्वितीय स्कन्ध—आचार्य गोसाञि। ताँर यत शाखा हइल, तार लेखा नाञि॥४॥

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