श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/4-17 श्रीगौर-कृपासे सारग्राही श्रीअद्वैतदासोंका ही विस्तार :- चैतन्य-मालीर कृपाजलेर सेचने। सेइ जले पुष्ट स्कन्ध बाड़े दिने दिने॥5॥ सेइ स्कन्धे यत प्रेमफल उपजिल। सेइ कृष्णप्रेमफले जगत् भरिल॥6॥ सेइ जले स्कन्धे करे शाखाते सञ्चार। फले-फुले बाड़े,-शाखा हइल विस्तार॥7॥ धान्यराशि मापे यैछे पात्ना सहिते। पश्चाते पात्ना उड़ाञा संस्कार करिते॥12॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥8-12॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पहले श्रीअद्वैतप्रभुके समस्त अनुगतजन एकमत थे, बादमें कुछ लोग दैववशतः पृथक् मतके हो गये। आचार्यके निजमतसे जो चले, वे शुद्ध-वैष्णव हैं और जिन्होंने दैववशतः आचार्यके बतलाये मतसे स्वतन्त्र किसी प्रकार अपने मतकी कल्पना की, वे असार हैं। जिस प्रकार धानको छिलके सहित ही तोला जाता है और साफ करते समय छिलकेको उड़ाकर केवल सार चावलको ही ग्रहण किया जाता है; उसी प्रकार असार व्यक्तियोंके नामोंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है, तो भी सारग्राही वैष्णवोंसे असारवाहियोंको पृथक् रखनेके अभिप्रायसे उनकी एक साथ गणना की है। चावलसे रहित असार धानको 'पात्ना' कहते हैं॥8-12॥ अनुवाद-वृक्षके दूसरे स्कन्ध श्रीअद्वैताचार्य हैं। उनकी जितनी शाखाएँ हुई हैं, उनकी कोई गणना नहीं हो सकती। श्रीचैतन्य-महाप्रभु मालीके कृपारूपी जलके सिञ्चनसे पुष्ट होकर यह स्कन्ध दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। उस स्कन्धपर जितने प्रेमफल उत्पन्न हुए, सारा जगत् उन श्रीकृष्णप्रेमरूपी फलोंसे परिपूर्ण हो गया। स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य) ने उस महाप्रभुके कृपारूपी जलका अपनी शाखाओंमें सञ्चार किया, जिससे उनपर फूल और फलोंके बढ़नेसे शाखाओंका बहुत विस्तार हुआ॥4-7॥ (1) अच्युतानन्द-शाखा :- अच्युतानन्द-बड़ शाखा, आचार्य-नन्दन। आजन्म सेविला तें'हो चैतन्य-चरण॥13॥ अच्युतके गुणोंका वर्णन :- “चैतन्य गोसाञिर गुरु-केशव भारती।” एइ पितार वाक्य शुनि' दुःख पाइल अति॥14॥ “जगद्गुरुते तुमि कर ऐछे उपदेश। तोमार एइ उपदेशे नष्ट हइल देश॥15॥ चौद्द भुवनेर गुरु-चैतन्य-गोसाञि। ताँर गुरु-अन्य, एइ कोन शास्त्रे नाइ॥”16॥ पञ्चम वर्षे बालक कहे सिद्धान्तेर सार। शुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार॥17॥ श्रीअद्वैतदासोंके दो पृथक् मत :- प्रथमे त' आचार्येर एकमत गण। पाछे दुइमत हैल दैवेर कारण॥8॥ सारग्राहियोंकी श्रीअद्वैतके आनुगत्यमें गौरभक्ति, असारगणोंके द्वारा स्वतन्त्रभावमें गौरविरोध :- केह त' आचार्येर आज्ञाय, केह त' स्वतन्त्र। स्वमत कल्पना करे दैव-परतन्त्र॥9॥ आचार्यका अनुगत्य ही सार, अन्यथा असार :- आचार्येर मत येइ, सेइ मत सार। ताँर आज्ञा लङ्घि' चले, सेइ त' असार॥10॥ श्रीअद्वैत-दासाभिमानी अभक्तोंके उल्लेखका कारण और दृष्टान्त :- असारेर नामे इँहा नाहि प्रयोजन। भेद जानिवारे करि एकत्र गणन॥11॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतानन्द एक बड़ी शाखा हैं, जिन्होंने सारा जीवन श्रीचैतन्य महाप्रभुके 124 | श्रीचैतन्यचरितामृत