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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 661, कुल 2549 में से

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चरणोंकी सेवा की है। अपने पिताके मुखसे यह वाक्य सुनकर कि केशव भारती श्रीचैतन्य महाप्रभुके गुरु हैं, उन्हें अपार दुःख हुआ। उन्होंने अपने पिताजीसे कहा कि जगद्गुरु (श्रीचैतन्य महाप्रभु) के विषयमें आप ऐसा उपदेश कर रहे हैं, (लोग उन्हें भगवान् नहीं मानकर साधारण जीव मान लेंगे) जिसके कारण सारे देशका विनाश हो जायेगा। चैतन्य महाप्रभु तो चौदह भुवनोंके गुरु हैं और किसी भी शास्त्रमें ऐसा वर्णन नहीं है कि कोई अन्य उनका गुरु है। अच्युतानन्द उस समय केवलमात्र पाँच वर्षके बालक थे। उनके मुखसे यह सिद्धान्त-सार सुनकर श्रीअद्वैताचार्यको परम आनन्द हुआ॥ 13-17॥ अनुभाष्य - 'अच्युतानन्द' - श्रीचैतन्यभागवतके अन्त्यखण्डके आठवें अध्यायमें लिखा है- “अद्वैतेर ज्येष्ठपुत्र श्रीअच्युतानन्द ॥ 60(क)॥” “अच्युतानन्द श्रीअद्वैतप्रभुके ज्येष्ठ पुत्र हैं।” संस्कृत भाषाके ग्रन्थ 'अद्वैतचरित' में लिखा है- “अच्युतः कृष्णमिश्रश्च गोपालदास एव च। रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भाब्धिसम्भवम्। आचार्यतनयेष्ठेते त्रयो गौरगणाः स्मृताः॥ चतुर्थो बलरामश्च स्वरूपः पञ्चमः स्मृतः। षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट्॥” “अच्युत, कृष्णमिश्र और गोपाल-ये सीतादेवीके गर्भसमुद्रसे उत्पन्न तीन रत्न कहलाते हैं। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्रोंमेंसे ये तीन गौरजन कहलाते हैं। चौथे पुत्र श्रीबलराम, पाँचवें पुत्र स्वरूप और छठे पुत्र जगदीश हैं- इस प्रकार श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्र हैं।” श्रीअद्वैतप्रभुके गौरभक्त तीनों पुत्रोंमें श्रीअच्युतानन्द ही ज्येष्ठ हैं। श्रीअद्वैतप्रभुका विवाह पन्द्रहवीं शक-शताब्दीके प्रारम्भमें ही हुआ था। श्रीमन्महाप्रभुने जिस वर्ष नीलाचलसे रामकेलि होते हुए वृन्दावन जानेका मन बनाया था, उसी वर्ष 1433-34 शकाब्दमें अच्युतानन्द केवल पाँच वर्षके थे। चैःभाः अन्त्यखण्डके चतुर्थ अध्यायमें “पञ्चवर्ष वयस मधुर दिगम्बर” के रूपमें उनका वर्णन है। इसलिये अच्युतानन्दका जन्म 1428 शकाब्दमें हुआ था। अच्युतानन्दके जन्मसे पहले महाप्रभुके जन्मके समय श्रीअद्वैतपत्नी सीतादेवी महाप्रभुके जन्मके उपरान्त (1407 शकाब्दमें) उन्हें देखनेके लिये आयी थीं, इसलिये इन 21 वर्षोंमें उनके और भी तीन पुत्र होनेकी असम्भावना नहीं है। 'श्रीनित्यानन्द-दायिनी' पत्रिकामें 1792 शकाब्दमें छपी प्राकृत सहजिया सखीभेखी-दलके लोकनाथदास नामक एक व्यक्तिने 'सीताद्वैतचरित' नामक एक बङ्गला कविता-ग्रन्थमें अच्युतानन्दको महाप्रभुके सहपाठीके रूपमें वर्णित किया है; यह बात चैतन्यभागवतके विरुद्ध है। महाप्रभु जिस वर्ष संन्यास ग्रहणकर शान्तिपुरमें श्रीअद्वैतके भवनमें आये, तब 1431 शकाब्द था, उस समय अच्युतानन्द तीन वर्षके बालक थे- (चैःभाः अन्त्यखण्ड प्रथम अध्याय)- “दिगम्बर शिशुरूप अद्वैत-तनय ॥213(क)॥ आसिया पड़िल गौरचन्द्र-पदतले। धूलार सहित प्रभु लइलेन कोले॥216॥ प्रभु बोले,- अच्युत, आचार्य मोर पिता। से-सम्बन्धे तोमाय आमाय (हइ) दुइ भ्राता ॥217॥” “श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र शिशुरूपमें दिगम्बर (वस्त्रहीन) वेशमें थे। वे आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े। महाप्रभुने धूल-धूसरित उन शिशुको उठाकर अपनी गोदमें ले लिया और कहने लगे, अच्युत! (श्रीअद्वैत) आचार्य मेरे पिता हैं, इस सम्बन्धसे तुम और मैं-दोनों भाई हैं।” श्रीमन्महाप्रभुने श्रीनवद्वीपमें अपने महाप्रकाशसे पहले श्रीअद्वैताचार्यको लानेके लिये श्रीराम पण्डितको शान्तिपुर भेजा था। उस समय अच्युतानन्द भी पिता-माताके साथ आनन्द-क्रन्दनमें डूब गये थे। चैःभाः मध्यखण्ड छठा अध्याय- “अद्वैतेर तनय 'अच्युतानन्द'-नाम। परमबालक, सेहो कान्दे अविराम ॥41॥” और जब श्रीअद्वैताचार्य भक्तिके विरुद्ध ज्ञानकी व्याख्या कर रहे थे और महाप्रभुने उनपर प्रहार किया था, तब भी अच्युतानन्द वहाँ उपस्थित थे। ये सारी बारहवाँ अध्याय | 125

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