श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 12/13-18
घटनाएँ महाप्रभुके संन्यासके दो-तीन वर्ष पहले हुईं—ऐसा स्वीकार करना पड़ेगा। चैःभाः मध्यखण्ड उन्तीसवाँ अध्याय—
“अच्युत प्रणाम करे अद्वैत-तनय॥ 128(ख)॥”
श्रीअच्युत बाल्यकालसे ही श्रीमन्महाप्रभुके भक्त थे। इन्होंने पत्नी ग्रहणकर कभी संसार धर्मका पालन किया, ऐसी कोई भी बात नहीं सुनी जाती है। श्रीअद्वैत-शाखाके वर्णनमें इनका नाम शिष्योंमें अग्रणी है। श्रीयदुनन्दनदासके द्वारा रचित श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी ‘शाखा-निर्णयामृत’ ग्रन्थके अनुसार अच्युतानन्द श्रीगदाधर पण्डितके शिष्य और शाखा हैं—
“महारसामृतानन्दमच्युतानन्द-नामकम्। गदाधर-प्रियतमं श्रीमदद्वैतनन्दनम्॥”
“जिनका नाम अच्युतानन्द है, वे महारसामृतानन्द हैं। श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगदाधर पण्डितके अति प्रिय शिष्य हैं।” (चैःचः आदिलीला, 10/150)—
“अच्युतानन्द—अद्वैत आचार्य-तनय। नीलाचले रहे प्रभुर चरण-आश्रय॥”
अच्युतानन्दने नीलाचलमें महाप्रभुका चरणाश्रय करके भजन किया था। श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने अपना शेष जीवन महाप्रभुके निकट नीलाचलमें व्यतीत किया था, इसी कारणसे यह देखनेमें आता है कि अच्युतानन्दादि श्रीअद्वैतप्रभुके वास्तविक सेवक-मण्डलियोंमेंसे अनेकोंने ही श्रीगदाधरका चरणाश्रय किया था। अच्युतानन्दकी श्रीमन्महाप्रभुके प्रति अति बाल्यकालसे ही प्रबल भक्तिका प्रमाण देखा जाता है। (चैःचः मध्यलीला, 13/45)—
“शान्तिपुर-आचार्येर एक सम्प्रदाय। अच्युतानन्द नाचे ताँहा, आर सब गाय॥”
प्रत्येक वर्ष जगन्नाथ रथके सामने (महाप्रभुके) नृत्य-कीर्तनके समय भी हम महाप्रभुके प्रिय अच्युतानन्दका वर्णन सर्वत्र देखते हैं। उस समय बालककी आयु केवल 6 वर्षकी थी। श्रीकविकर्णपूर-प्रणीत गौरगणोद्देश-दीपिकामें अच्युतानन्दको ‘श्रीगदाधरके शिष्य एवं श्रीकृष्णचैतन्यके प्रिय’ के रूपमें कहा गया है—
“तस्य पुत्रोऽच्युतानन्दः कृष्णचैतन्यवल्लभः। श्रीमत्पण्डित-गोस्वामि-शिष्यः प्रिय इति श्रुतम्॥ 87॥ यः कार्त्तिकेयः प्रागासीदिति जल्पन्ति केचन। केचिदाहू रसविदोऽच्युतानाम्नी तु गोपिका। उभयन्तु समीचीनं द्वयोरेकत्र सङ्गतात्॥ 88॥”
“श्रीअच्युतानन्द श्रीकृष्णचैतन्यके अतिशय प्रिय, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य तथा श्रीअद्वैताचार्यके प्रिय पुत्रके रूपमें प्रसिद्ध हैं। किसी-किसीका कहना है कि कार्त्तिकेय ही अच्युतानन्द हैं, परन्तु अन्यान्य किन्हीं रसविदोंका कहना है कि ब्रजकी अच्युता नामक गोपी ही अब अच्युतानन्द हैं। ये दोनों ही विचार ठीक हैं, क्योंकि कार्त्तिकेय और अच्युता नामक गोपी मिलकर ही श्रीअच्युतानन्द हुए हैं।”
श्रीनरहरिदासके द्वारा रचित ‘नरोत्तमविलास’ ग्रन्थमें खेतरि-महोत्सवके समय अच्युतानन्दके आगमन एवं योगदानकी कथा सविस्तार वर्णित है। जननी श्रीसीता और श्रीजाह्नवाके अनुरोधसे नितान्त असमर्थ होनेपर भी उन्होंने महोत्सवके समय योगदान दिया था। इन्हीं नरहरिदासके मतानुसार जीवनके अन्तिम समय उन्होंने शान्तिपुरके भवनमें वास किया था; परन्तु ऐसा जाना जाता है कि श्रीमहाप्रभुके प्रकटकालमें उन्होंने महाप्रभुके साथ और बादमें श्रीगदाधरके निकट पुरीमें वास किया था। विवाह न करनेके कारण उनकी कोई सन्तानादि नहीं थी॥ 13-17॥
(2) कृष्णमिश्र :- कृष्णमिश्र-नाम आर आचार्य-तनय। चैतन्य-गोसाञि कैसे याँहार हृदय॥18॥
अनुवाद— कृष्णमिश्र नामक श्रीअद्वैताचार्यके एक और पुत्र थे, जिनके हृदयमें सदा श्रीचैतन्य महाप्रभु निवास करते थे॥ 18॥
अनुभाष्य— 'कृष्णमिश्र'—संस्कृतभाषाके ग्रन्थ ‘अद्वैतचरित’ में—
126 | श्रीचैतन्यचरितामृत