श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 663, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें“अच्युतः कृष्णमिश्रश्च गोपालदास एव च। रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भाब्धिसम्भवम्।” “श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्रोंमेंसे 'अच्युत, कृष्णमिश्र और गोपाल'-ये तीनों भाई श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके दास्यके रूपमें नियुक्त थे।” गौरगणोद्देशदीपिका श्लोक 88– “कार्तिकेयः कृष्णमिश्रस्तत् साम्यादिति केचन॥88॥” “कार्तिकेय और श्रीकृष्णमिश्रमें समानताके कारण कोई-कोई श्रीकृष्णमिश्रको भी कार्तिकेय कहते हैं।” कृष्णमिश्रके दो पुत्र थे—(1) रघुनाथ चक्रवर्त्ती, (2) दोलगोविन्द। इनमेंसे रघुनाथके वंशज शान्तिपुरके मदनगोपालके मोहल्ला, गणकर, मृजापुर और कुमारखालिमें वर्तमान है। दोलगोविन्दके तीन पुत्र थे—(1) चाँद, (2) कन्दर्प, (3) गोपीनाथ। कन्दर्पके वंशज मालदह, जिकावाड़ीमें हैं। गोपीनाथके तीन पुत्र— (1) श्रीवल्लभ, (2) प्राणवल्लभ और (3) केशव थे। श्रीवल्लभके वंशज मशियाडारा (महिषडेरा ?), दामुकदिया और चण्डीपुर आदि स्थानोंपर हैं। श्रीवल्लभके ज्येष्ठपुत्र गङ्गानारायणसे मशियाडाराकी वंश-धारा एवं कनिष्ठ पुत्र रामगोपालसे दामुकदिया, चण्डीपुर, शोलमारि आदि गाँवोंकी वंश-धारा है। प्राणवल्लभ और केशवके वंशज उथलीमें वास करते हैं। प्राणवल्लभके पुत्र रत्नेश्वर, उनके पुत्र कृष्णराम, उनके छोटे पुत्र लक्ष्मीनारायण, उनके पुत्र नवकिशोर, उनके द्वितीय पुत्र राममोहनके बड़े पुत्र 'जगबन्धु' और तृतीय पुत्र 'वीरचन्द्र' ने भिक्षुका श्रम स्वीकार करके काटोयामें श्रीमन्महाप्रभुके विग्रहकी स्थापना की। लोग इन्हें 'बड़ेप्रभु' और 'छोटेप्रभु' कहते थे। इन्होंने ही नवद्वीपधाम-परिक्रमाका प्रवर्त्तन किया था। कृष्णमिश्रकी पूर्ण वंशातालिकाके बारेमें वैष्णवमञ्जूषाके चतुर्थ संख्यामें “अद्वैत-वंश' द्रष्टव्य है॥18॥ (3) गोपालका बाल-चरित्र :– श्रीगोपाल-नामे आर आचार्येर सुत। ताँहार चरित्र, शुन, अत्यन्त अद्भुत॥19॥
12/18–26 ] गुण्डिचा-मन्दिरे महाप्रभुर सन्मुखे। कीर्त्तने नर्त्तन करे बड़ प्रेमसुखे॥20॥ नाना-भावोद्गम देहे अद्भुत नर्त्तन। दुइ गोसाञि 'हरि' बले आनन्दित मन॥21॥ नाचते नाचते गोपाल हइल मूर्च्छित। भूमेते पड़िल, देहे नाहिक सम्बित॥22॥ दुःखित हइला आचार्य पुत्र कोले लञा। रक्षा करे नृसिंहरे मन्त्र पड़िया॥23॥ नाना मन्त्र पड़ेन आचार्य, ना हय चेतन। आचार्येर दुःखे वैष्णव करेन क्रन्दन॥24॥ तबे महाप्रभु ताँर हृदे हस्त धरि'। “उठह, गोपाल-बल, बल 'हरि' 'हरि'॥”25॥ उठिल गोपाल प्रभुर स्पर्श-ध्वनि शुनि'। आनन्दित हञा सबे करे हरिध्वनि॥26॥ अनुवाद—श्रीगोपाल नामक एक और श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र थे। उनके अद्भुत चरित्रके विषयमें सुनो। वे एक बार महाप्रभुके सामने गुण्डिचा मन्दिरमें प्रेममें डूबकर बड़े आनन्दसे नृत्य कर रहे थे। उनके शरीरमें नाना प्रकारके भावोंका उद्गम हो रहा था और वे अद्भुत नृत्य कर रहे थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु दोनों आनन्दित मनसे 'हरि' 'हरि' बोल रहे थे। नाचते-नाचते गोपाल मूर्च्छित हो गये और उनकी देहमें कोई चेतना नहीं रही। श्रीअद्वैताचार्य बहुत दुःखी हो गये और अपने पुत्रको उन्होंने अपनी गोदमें ले लिया। उसकी रक्षाके लिये उन्होंने नृसिंह-मन्त्र पढ़ा। उसके बाद उन्होंने अनेक मन्त्र पढ़े, परन्तु फिर भी गोपालकी चेतना लौटकर नहीं आयी। श्रीअद्वैताचार्यके दुःखको देखकर सभी वैष्णव क्रन्दन करने लगे। तब महाप्रभुने अपना हाथ गोपालके हृदयपर रखा और कहा—“गोपाल! उठो और 'हरि' 'हरि' बोलो।” महाप्रभुके स्पर्श और ध्वनिको सुनकर गोपाल उठकर बैठ गये। इसे देखकर
बारहवाँ अध्याय | 127