भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 664, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 664

[ 12/19-31

सभीका मन आनन्दित हो गया और सभी 'हरि' 'हरि' ध्वनि करने लगे ॥ 19-26 ॥ अनुभाष्य—'गोपाल'—श्रीअद्वैताचार्यके तीन वैष्णव पुत्रोंमें अन्यतम हैं। चैःचः मध्यलीला, 12/143-149 संख्या द्रष्टव्य है। सम्बित् अर्थात् सम्विद् अथवा ज्ञान ॥ 19-26 ॥ आचार्येर आर पुत्र—श्रीबलराम। आर पुत्र—'स्वरूप'-शाखा, 'जगदीश' नाम ॥ 27 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके अन्य पुत्र श्रीबलराम, स्वरूप और जगदीश हैं ॥ 27 ॥ अनुभाष्य—'बलराम, स्वरूप और जगदीश'—संस्कृतके ग्रन्थ 'अद्वैतचरित' में कहा गया है— “चतुर्थो बलरामश्च स्वरूपः पञ्चमः स्मृतः। षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट्॥” “श्रीअद्वैताचार्यके छह पुत्र हैं, जिनमें बलराम चौथे, स्वरूप पाँचवें और जगदीश छठे पुत्र हैं।” ये तीनों गौर विमुख स्मार्त्त अथवा मायावादी हैं, अतः अवैष्णव हैं। बलरामकी तीन पत्नियोंके गर्भसे नौ पुत्रोंका जन्म हुआ। प्रथम पत्नीकी कनिष्ठ सन्तान मधुसूदनने 'गोसाईं भट्टाचार्य' नामसे विख्यात होकर स्मार्त्तधर्मको स्वीकार किया। इनके पुत्र राधारमणने 'गोस्वामी भट्टाचार्य' नाम ग्रहण करके गृहत्यागीके योग्य पदवी 'गोस्वामी' शब्दका अपमान किया। और इन्होंने स्मार्त्त रघुनन्दनके आनुगत्यमें श्रीअद्वैताचार्यकी 'कुश-पुत्तलिका' का दहन करके प्रेत या राक्षस श्राद्ध-कार्य करके श्रीहरिभक्तिविलासादिमें वर्णित विष्णु-भक्तिपरक श्राद्धकी विधिके विरुद्ध आचरण करके मूर्खता एवं महाअपराधका प्रदर्शन किया। उन्होंने शुद्धभक्त ना होते हुए भी कुछ नये ग्रन्थों और कुछ प्राचीन ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना की—ये सब शुद्धभक्तोंके लिये आदरणीय नहीं है। बलरामकी वंशतालिका वैष्णवमञ्जूषा (चतुर्थ संख्या में) द्रष्टव्य है ॥ 27 ॥

(4) कमलाकान्त :— 'कमलाकान्त विश्वास'—नाम आचार्य-किङ्कर। आचार्य-व्यवहार सब—ताँहार गोचर ॥ 28 ॥ अनुवाद—कमलाकान्त विश्वास नामक एक श्रीअद्वैताचार्यके दास थे, जो उनके सभी सांसारिक कार्यकलापोंको देखते थे ॥ 28 ॥ अनुभाष्य—'कमलाकान्त विश्वास'—चैःचः आदिलीला, 10/119 संख्यामें वर्णित भक्तोंमें 'कमलाकान्त' ही कमलाकान्त विश्वास हैं। चैःचः आदिलीला, 10/149 संख्यामें वर्णित 'कमलानन्द' और मध्यलीला, 10/94 संख्यामें लिखित 'द्विज कमलाकान्त' सम्भवतः एक ही व्यक्ति हैं। कमलाकान्त-ब्राह्मण महाप्रभुके निजगण हैं और कमलाकान्त विश्वास श्रीअद्वैतप्रभुके सेवक हैं। चैःचः मध्यलीला, 10/94— “प्रभुर एक भक्त—'द्विज कमलाकान्त' नाम। ताँरे लञा नीलाचले करिला प्रयाण॥” “श्रीपरमानन्दपुरी नवद्वीपसे नीलाचल आते समय नवद्वीपवासी महाप्रभुके भक्त 'ब्राह्मण-कमलाकान्त' को अथवा कमलानन्दको साथ लेकर नीलाचल आये॥” 28 ॥

कमलाकान्तका चरित्र :— नीलाचले तेंहो एक पत्रिका लिखिया। प्रतापरुद्रेर स्थाने दिल पाठाइया ॥ 29 ॥ सेइ पत्रीर कथा आचार्य नाहि जाने। कोन पाके सेइ पत्री आइल प्रभुस्थाने ॥ 30 ॥ अनुवाद—उन्होंने नीलाचलमें एक पत्र लिखकर किसीके हाथों राजा प्रतापरुद्रके पास भिजवाया। उस पत्रके विषयमें श्रीअद्वैताचार्यको कुछ पता नहीं था। किसी कारणसे वह पत्र महाप्रभुके पास पहुँच गया ॥ 29-30 ॥

कमलाकान्तके पत्रमें पागल-मत :— से पत्रीते लेखा आछे—एइ त' लिखन। ईश्वरत्वे आचार्येरे करियाछे स्थापन ॥ 31 ॥

128 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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