भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 665, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 665

12/31-43 ] किन्तु ताँर दैवे किछु हइयाछे ऋण। ऋण शोधिबारे चाहि मुद्रा शत-तिन ॥ 32 ॥ पत्र पड़िया प्रभुर मने हैल दुःख। बाहिरे हासिया किछु बोले चाँदमुख ॥ 33 ॥ “आचार्येरे स्थापियाछे करिया ईश्वर। इथे दोष नाहि, आचार्य-दैवत ईश्वर ॥ 34 ॥ षडैश्वर्यशाली नारायणको जीव समझकर दरिद्रबुद्धि करना ही मायावाद अथवा पागल-मत :- ईश्वरेर दैन्य करि' करियाछे भिक्षा। अतएव दण्ड करि' कराइब शिक्षा ॥" 35 ॥ अनुवाद—उस पत्रमें उन्होंने यह लिखा कि श्रीअद्वैताचार्य स्वयं ईश्वर हैं, परन्तु दैववशतः उनपर कुछ ऋण हो गया है। ऋणके शोधनके लिये उन्हें तीन सौ मुद्राओंकी आवश्यकता है। पत्र पढ़कर महाप्रभुके मनमें दुःख हुआ, परन्तु बाहरसे हँसते हुए चन्द्रवदन महाप्रभुने कहा—“इसने आचार्यको ईश्वर कहा है, इसमें कोई भी दोष नहीं है, क्योंकि वे वास्तवमें ईश्वर हैं। परन्तु ईश्वरको दीन बनाकर इसने जो भिक्षा माँगी है, उसके लिये इसे मैं दण्ड देकर शिक्षा दूँगा ॥” 31-35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दैवत ईश्वर'—वास्तवमें ईश्वर ॥ 34 ॥ अनुभाष्य—'ईश्वरेर दैन्य करि'—ईश्वरको दीन बनाकर ॥ 35 ॥ पागलको दण्ड :- गोविन्देरे आज्ञा दिल,—“इँहा आजि हैते। बाउलिया 'विश्वासें' एथा ना दिबे आसिते ॥" 36 ॥ दण्ड शुनि' 'विश्वास' हइल परम दुःखित। शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य हर्षित ॥ 37 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने गोविन्दको आज्ञा दी—“आजसे इस पागल 'विश्वास' को यहाँपर आने मत देना।” दण्डको सुनकर 'विश्वास' बड़े दुःखी हो गये, परन्तु श्रीअद्वैताचार्य सुनकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ 36-37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बाउलिया विश्वास'—कमलाकान्त विश्वासके सिद्धान्तको बाउलके (पागलके) जैसा कहकर उसको 'बाउलिया विश्वास' कहा है ॥ 36 ॥ अनुभाष्य—'विश्वासे'—अर्थात् कमलाकान्त विश्वासको ॥ 36 ॥ श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा उसको सान्त्वना-दान :- विश्वासेरे कहे,—“तुमि बड़ भाग्यवान्। तोमारे करिल दण्ड प्रभु भगवान् ॥ 38 ॥ पूर्वे महाप्रभु मोरे करेन सम्मान। दुःख पाइ' मने आमि कैलुँ अनुमान ॥ 39 ॥ मुक्ति-श्रेष्ठ करि' कैनु वशिष्ठ व्याख्यान। क्रु दण्ड पाञा हैल मोर परम आनन्द। ये दण्ड पाइल भाग्यवान् मुकुन्द ॥ 41 ॥ ये दण्ड पाइल श्रीशची भाग्यवती। से दण्डप्रसाद आर लोके पाबे कति ॥" 42 ॥ एत कहि आचार्य ताँरे करिया आश्वास। आनन्दित हइया आइल महाप्रभु-पाश ॥ 43 ॥ अनुवाद—कमलकान्त विश्वासको दुःखी देखकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा—“तुम बड़े भाग्यशाली हो कि तुम्हें महाप्रभुने दण्ड प्रदान किया है, अर्थात् अपना माना है। पहले महाप्रभु मेरा सम्मान करते थे, जिससे मुझे बहुत दुःख होता था। तब मैंने मनमें विचार करके योग-वाशिष्ठकी व्याख्या करते हुए मुक्तिको भक्तिसे श्रेष्ठ बतलाना आरम्भ किया। इसे सुनकर महाप्रभुने क्रोधित होकर मुझपर शासन किया। उस दण्डको पाकर मुझे परम आनन्द हुआ। ऐसा ही दण्ड महाप्रभुने मुकुन्दको दिया था। शची माताको भी ऐसा दण्ड मिला बारहवाँ अध्याय | 129