श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 666, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/38-43 था, जिस दण्ड (कृपा) को पानेवाला उनसे अधिक भाग्यशाली जगत्में और कौन है?" यह कहकर श्रीअद्वैताचार्यने उसे आश्वासन दिया और वे आनन्दित होकर महाप्रभुके पास आये॥ 38-43 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—योगवाशिष्ठकी व्याख्या करते करते किसी छलसे श्रीअद्वैतप्रभुने भक्तिकी अपेक्षा मुक्तिको श्रेष्ठ बतलाया ॥ 40 ॥ अनुभाष्य—'वशिष्ठ' अर्थात् योगवाशिष्ठ रामायण। यह ग्रन्थ विष्णुभक्ति विरोधी मायावादका प्रतिपादक है, इसलिये शुद्धभक्तोंको इसे नहीं पढ़ना चाहिये। अद्वैतदण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, उन्नीसवाँ अध्याय), मुकुन्ददण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय) और शचीमाताके दण्डके लिये (चैःभाः मध्यखण्ड, बाइसवाँ अध्याय) द्रष्टव्य है॥ 40-42 ॥ अमृताणुकणिका—'श्रीअद्वैत-दण्ड'—नवद्वीपमें महाप्रभु विश्वम्भरने जो क्रीड़ा की, उसे सभी लोग नहीं देख पाते थे। वे श्रीनित्यानन्द और श्रीगदाधरको साथ लेकर अपने भक्तोंके घर-घरमें विहार करने लगे। महाप्रभुको आनन्दमें मग्न देखकर भागवतगण भी परिपूर्ण आनन्दमें डूब गये। सभीने देखा कि सम्पूर्ण भुवन श्रीकृष्णसे परिपूर्ण हैं। निरन्तर भावावेशमें रहनेके कारण किसीको भी बाहरी दुनियाकी सुधबुध न रही। एक सङ्कीर्तनके अतिरिक्त उनके लिये और कोई कार्य नहीं रह गया था। सबसे अधिक मत्त थे—आचार्य गोसाईं। ऐसा कोई नहीं था जो उनके अगाध चरित्रको समझ सके। श्रीचैतन्यकी कृपासे केवल कोई-कोई ही उन्हें जान पाये थे कि अद्वैताचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके महाभक्त हैं। बाह्य जगत्का बोध होनेपर विश्वम्भर सभी वैष्णवोंके प्रति, विशेष करके श्रीअद्वैतके प्रति महाभक्ति प्रदर्शित करते थे। इससे श्रीअद्वैताचार्यको बड़ा ही दुःख होता था। वे मन-ही-मन चिन्तन करने लगे,—"निरन्तर ये चोर (गौराङ्ग महाप्रभु) मुझे विडम्बनामें डालते रहते हैं। प्रभुताको छोड़कर वे मेरे चरण पकड़ते हैं। महाबली प्रभुके साथ शक्तिसे मैं निपट नहीं सकता हूँ, मुझे पकड़कर भी वे बलात् मेरे चरणोंकी धूल ले लेते हैं। बस, एक ही उपाय है, और वह है मेरा भक्तिबल। क्योंकि, भक्तिके बिना विश्वम्भरको पहचानना सम्भव नहीं है। मायाको जब मैं पूरी तरहसे मिटा पाऊँगा, तभी लोगोंको पता चलेगा कि मैं सचमुच ही 'अद्वैत-सिंह' हूँ। भृगुको जीतकर 'चोर' का साहस बढ़ गया है, अर्थात् भृगुकी लात खाकर भी उन्होंने क्रोधके स्थानपर दैन्य प्रकाश किया था। भृगु-जैसे मेरे सैकड़ों शिष्य हैं। प्रभुके शरीरमें ऐसा क्रोध उत्पन्न करूँगा कि प्रभु अपने ही हाथोंसे मुझे दण्ड प्रदान करेंगे। जिस भक्तिके प्रचारके लिये प्रभुका अवतार हुआ है, मैं उस भक्तिको स्वीकार नहीं करूँगा—बस, यही सार सिद्धान्त है। भक्तिको न माननेसे प्रभु क्रोधित होकर अपने आपको भूल जायेंगे और मेरे केश पकड़कर मुझे दण्ड प्रदान करेंगे।" ऐसा सोचकर अद्वैताचार्य प्रभुने हरिदासके साथ आनन्द-सहित महाप्रभुसे विदा ली। वे अपने घर शान्तिपुर आये और आकर सभीको 'ज्ञान' की प्रधानता-प्रकाश-पूर्वक वाशिष्ठ-शास्त्रकी व्याख्या करने लगे,—"बिना 'ज्ञान' के विष्णु-भक्तिमें कोई शक्ति है क्या? इसलिये ज्ञान ही सबका प्राणस्वरूप है, ज्ञानमें ही सर्वशक्ति है। इस ज्ञानको बिना समझे कोई-कोई व्यक्ति अपने घरमें ही निज धनको खोकर वन-वनमें ढूँढता रहते हैं। विष्णु-भक्ति दर्पण-स्वरूप होती है और नेत्र होते हैं—'ज्ञान'। बिना नेत्रोंके दर्पण किस कामका? सभी शास्त्रोंका मैंने आदिसे अन्त तक अध्ययन किया है और देखा है कि केवल 'ज्ञान' ही इन सबका एकमात्र अभिप्राय है।" उधर महाप्रभु विश्वम्भर बारम्बार हुँकार करने लगे और कहने लगे,—"मैं वही हूँ, मैं वही हूँ। नींदसे उठाकर मुझे नाड़ा यहाँ ले आया है, और अब यहाँ भक्तिको छिपाकर वह 'ज्ञान' की व्याख्या कर रहा है। देख लेना, इसी कारण आज मैं उसे प्रत्यक्षरूपसे दण्ड 130 | श्रीचैतन्यचरितामृत