भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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प्रदान करूँगा। मैं देखना चाहता हूँ कि आज कैसे वह ज्ञानयोगको बचाये रखता है?” श्रीअद्वैताचार्यने जब यह जाना कि 'क्रोधित होकर महाप्रभु आ रहे हैं, तब वे और अधिक मत्त होकर ज्ञानयोगकी व्याख्या करने लगे। चैतन्य-भक्तकी लीला कौन समझ सकता है? क्रु साथ जाकर देखा कि श्रीअद्वैताचार्य ज्ञानचर्चाके आनन्दमें झूम रहे हैं। महाप्रभुको देखकर हरिदासने दण्डवत् प्रणाम किया, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र अच्युतने भी प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नीने मन-ही-मन उन्हें नमस्कार किया और महाप्रभुको क्रोधित देखकर वे हृदयमें चिन्तित हो गयीं। कोटि-सूर्यकी भाँति महाप्रभुका तेज प्रकाशित हो रहा था। यह देखकर सभीके चित्तमें भय छा गया। महाप्रभु क्रोधित होकर बोले,—“अरे! अरे नाड़ा! बताओ ज्ञान और भक्तिमें कौन श्रेष्ठ है?” उत्तरमें श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“ज्ञान सब समय श्रेष्ठ है। जिनको ज्ञान नहीं है, उन्हें भक्तिसे क्या प्रयोजन?” 'ज्ञान श्रेष्ठ हैं',—श्रीअद्वैताचार्यके ये वचन सुनकर क्रोधके कारण शचीनन्दन बाहरी सुधबुध भूल गये। श्रीअद्वैताचार्य अपने चबूतरेपर बैठे हुए थे। महाप्रभुने उन्हें वहाँसे उठाया और आँगनमें ले आये। फिर आँगनमें नीचे गिराकर वे अपने हाथोंसे उन्हें मारने लगे। जगन्माता-स्वरूपिणी श्रीअद्वैताचार्यकी पतिव्रता गृहिणी सब तत्त्व जानते हुए भी व्याकुल हो गयीं और कहने लगीं,—“यह वृद्ध ब्राह्मण है, यह वृद्ध ब्राह्मण है, इनके प्राणोंकी रक्षा कीजिये। किसके सिखानेसे आप इनका इतना अपमान कर रहे हैं? इतने बूढ़े ब्राह्मणके साथ और क्या-क्या करेंगे?” पतिव्रता पत्नीकी बात सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु हँसने लगे और हरिदास ठाकुर भयके कारण श्रीकृष्णका स्मरण करने लगे। क्रोधमें महाप्रभुने पतिव्रताकी बातको नहीं सुना। दम्भ प्रकाश करते हुए महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यके प्रति तर्जन-गर्जन करते रहे। महाप्रभुने कहा,—“अरे नाड़ा, मैं तो क्षीरसागरमें सो रहा था। तुमने मेरी निद्रा भङ्ग कर दी। तुमने भक्तिको प्रकाशित करनेके लिये मुझे यहाँ बुला लिया। अब भक्तिको छिपाकर ज्ञानकी व्याख्या कर रहे हो। यदि तुम्हारे मनमें भक्तिको छिपाये रखनेकी इच्छा थी, तो किस प्रयोजनके लिये तुमने मुझे प्रकाशित किया? तुम्हारे सङ्कल्पको मैं कभी व्यर्थ नहीं होने देता, परन्तु तुम मुझे सदैव विडम्बनामें डालते रहते हो।” इसके बाद श्रीअद्वैताचार्यको छोड़कर महाप्रभु द्वारमें आकर बैठ गये और हुँकार करते हुये निज तत्त्वको प्रकाश करने लगे। महाप्रभुने कहा,—“अरे अरे! जिसने कंसको मारा था, मैं वही हूँ। अरे ओ नाड़ा! तुम सब जानते हो, देख लो। अज, भव, शेष, रमा—ये सब मेरी सेवा करते हैं। मेरे सुदर्शन चक्रने शृगाल-वासुदेव (पौण्ड्र को मार गिराया था। मेरे सुदर्शन चक्रने सारे वाराणसी नगरको जला डाला था। मेरे बाणोंने महाबली रावणका संहार किया था। मेरे चक्रने बाणासुरकी भुजाओंको काटा था। मेरे चक्रने नरकासुरका वध किया था। बाँये हाथपर मैंने ही (गोवर्धन) पर्वतको धारण किया था। स्वर्गसे पारिजात भी मैं ही लाया था। मैंने ही बलिको छला था, फिर उसपर कृपा भी मैंने ही की थी। मैंने हिरण्यकशिपुको मारकर प्रह्लादको बचाया था।” इस प्रकारसे महाप्रभु अपना ऐश्वर्य प्रकाशित करते रहे और उसे सुनकर श्रीअद्वैताचार्य प्रेमसागरमें बहते रहे। दण्ड प्राप्त करके श्रीअद्वैताचार्य परम आनन्दित हुये और हाथोंसे ताली बजा-बजाकर विनीतभावसे नृत्य करने लगे। श्रीअद्वैताचार्य बोले,—“अपराधके अनुरूप ही मुझे दण्ड मिला है। हे प्रभु! इससे भृत्यके हृदयमें बल मिला है।” इतना कहकर श्रीअद्वैताचार्य आनन्दसे नृत्य करने लगे। श्रीअद्वैताचार्य सारे आङ्गनमें आनन्द-सहित नृत्य कर रहे थे और भौंवें नचा-नचाकर महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन कर रहे थे,—“मेरे प्रति आपकी वह स्तुति अब कहाँ गयी? कहाँ गये अब आपके वे सारे ढङ्ग? मैं दुर्वासा नहीं हूँ, जिसका आप तिरस्कार कर देंगे, जिनके अवशिष्ट अन्नका आप सारे शरीरमें लेपन कर लेंगे। मैं भृगुमुनि भी नहीं हूँ, जिनकी पदधूलिको

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