श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 670, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 12/46-53 महाप्रभुकी हँसी और कृपा :- एत शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला। बोलाइला कमलाकान्ते प्रसन्न हइला ॥ 46 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु हँसने लगे और प्रसन्न होकर कमलाकान्तको बुलाया ॥ 46 ॥ श्रीअद्वैतकी उक्ति :- आचार्य कहे,—“इहाके केने दिले दरशन। दुइ प्रकारेते करे मोरे विड़म्बन ॥" 47 ॥ अनुवाद—यह देखकर श्रीअद्वैताचार्यने कहा—“आपने इसे बुलाकर दर्शन क्यों दिये हैं? इसने मुझे दो प्रकारसे छला है ॥” 47 ॥ अनुभाष्य—(दो प्रकारकी छलना)—(1) यह मुखसे तो मुझे अप्राकृत नारायण भी कहता है और (2) कार्यकलापसे मुझे प्राकृत धनकी भिक्षा करनेवाला दरिद्र मानता है ॥ 47 ॥ शुनिया प्रभुर मन प्रसन्न हइल। दुँहार अन्तर-कथा दुँहे से जानिल ॥ 48 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुका मन प्रसन्न हो गया। वे दोनों ही एक दूसरेके मनके भावोंको समझते हैं ॥ 48 ॥ पागलके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :- प्रभु कहे,—“बाउलिया, ऐछे केने कर। आचार्येर लज्जा-धर्म-हानि से आचर ॥ 49 ॥ महाप्रभुके द्वारा वैष्णव-आचार्यका कर्त्तव्य निर्णय :- प्रतिग्रह कभु ना करिबे राजधन। विषयीर अन्न खाइले दुष्ट हय मन ॥ 50 ॥ मन दुष्ट हइले नहे कृष्णेर स्मरण। कृष्णस्मृति बिना हय निष्फल जीवन ॥ 51 ॥ लोक लज्जा हय, धर्म-कीर्ति हय हानि। ऐछे कर्म ना करिह कभु इहा जानि' ॥" 52 ॥ एइ शिक्षा सबाकारे, सबे मने कैल। आचार्य-गोसाञि मने आनन्द पाइल ॥ 53 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कमलाकान्तसे कहा—“हे पागल ! तुम ऐसा क्यों करते हो? तुम्हारे ऐसे आचरणसे आचार्यकी लज्जा-धर्मकी हानि हुई है। कभी भी राजासे धनकी भिक्षा मत करना, क्योंकि विषयीके अन्नको खानेसे मन दूषित हो जाता है। मनके दूषित होनेसे श्रीकृष्णका स्मरण नहीं होता है और श्रीकृष्णके स्मरणके बिना जीवन निष्फल है। इससे न केवल लोक-समाजमें निन्दा होती है, अपितु धर्म और कीर्तिकी भी हानि होती है। इसलिये यह सब जानकर कभी भी ऐसा कर्म नहीं करना।” महाप्रभुकी यह शिक्षा सभीके लिये है और इस शिक्षाको सभीने अपने मनमें धारण कर लिया। यह देखकर श्रीअद्वैताचार्यके मनमें आनन्द हुआ ॥ 49-53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कमलाकान्तने श्रीअद्वैताचार्यको 'ईश्वर' कहकर स्थापित करके राजासे धनके लिये याचना की थी। उसके इस प्रकारके कार्यसे महाप्रभु अत्यन्त असन्तुष्ट हुए। श्रीअद्वैताचार्य 'ईश्वर' होनेपर भी उनकी जगत्के शिक्षक रूपमें मानवलीला प्रसिद्ध है। ऋणग्रस्त होकर राजासे धनकी याचना करना आचार्यके लिये बड़ा लज्जाजनक व्यवहार है। धनकी लालसा तो सब प्रकारसे परित्यज्य है और उसपर विदेशी राजासे ऋणके परिशोधनके लिये धनकी लालसाको प्रकट करनेसे धर्मकी हानि होती है। राजा तो स्वभावतः ही विषयी होते हैं। विषयीका अन्न खानेसे चित्त दूषित होता है; चित्तके दूषित होनेसे श्रीकृष्णकी स्मृतिके अभावमें जीवन निष्फल हो जाता है। सभी लोगोंके लिये ऐसा करना निषिद्ध है और विशेषतः धर्माचार्योंके लिये यह विशेष रूपसे निषिद्ध है। आचार्यका कर्त्तव्य केवल नामोपदेश करना है। किन्तु धन लेकर जो नामका उपदेश करते हैं, वे 'नामोपदेशक' पदके योग्य नहीं हैं, अपितु वे नामापराधी हैं। ऐसा कार्य 134 | श्रीचैतन्यचरितामृत