श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें12/62–72 ] भण्डार, जो भक्तोंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, मैं उनकी वन्दना करता हूँ॥” 62 ॥ क्रु जलाभावे कृश शाखा शुकाइया मरे ॥ 69 ॥ (37) विजय, (38) श्रीराम पण्डित :- विजय पण्डित, आर पण्डित श्रीराम। असंख्य अद्वैत-शाखा कत लइब नाम ॥ 65 ॥ अनुवाद—विजय पण्डित और श्रीराम पण्डित भी श्रीअद्वैताचार्यकी शाखा हैं। श्रीअद्वैताचार्यकी असंख्य शाखाएँ हैं, मैं कितनोंका नाम उल्लेख करूँ ? ॥ 65 ॥ अनुभाष्य—‘श्रीराम पण्डित’—ये श्रीवास पण्डितके छोटे भाई हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 90वाँ श्लोक— “पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः। स रामपण्डितः श्रीमांस्तत् कनिष्ठसहोदरः ॥ 90 ॥” “श्रीनारदके अत्यन्त प्रिय श्रीपर्वत नामक श्रेष्ठ मुनि ही अब श्रीवास पण्डितके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान् राम पण्डित हैं।” चैःचः मध्यलीला, 13/39 संख्या द्रष्टव्य है॥ 65 ॥ श्रीगौरकृपाके बलपर सारग्राही-अद्वैतदासोंकी वृद्धि :- मालि-दत्त जल अद्वैत-स्कन्ध योगाय। सेइ जले जीये शाखा, —फुल, फल हय ॥ 66 ॥ अनुवाद—मूल माली श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा दिया गया जल श्रीअद्वैत स्कन्धके माध्यमसे उसकी शाखाओं तक पहुँचा, जिसके कारण वे फूल और फलोंसे लद गयीं ॥ 66 ॥ दुर्भाग्यसे असार अद्वैतदासाभिमानियोंके द्वारा ही श्रीगौर-विरोध और श्रीगौरकृपाके अभावसे उनका ध्वंस :- इहार मध्ये मालि-पाछे कोन शाखागण। ना माने चैतन्य-माली दुर्देव कारण ॥ 67 ॥ सृजाइल, जीयाइल, ताँरे ना मानिला। कृतघ्न हइला, ताँरे स्कन्ध क्रु अनुवाद—पहले श्रीअद्वैताचार्यके सभी शिष्य महाप्रभुको मानते थे, परन्तु महाप्रभुके अप्रकट होनेके बाद श्रीअद्वैताचार्यके कोई-कोई शिष्य अपने दुर्भाग्यके कारण उनके मार्गसे भटक गये। महाप्रभुरूपी जिस स्कन्धने उनको जन्म दिया और उनका पालन-पोषण किया, श्रीअद्वैताचार्यकी कुछ शाखाएँ (शिष्य) उसको न मानकर कृतघ्न हो गयीं, इस कारण स्कन्ध (श्रीअद्वैताचार्य) उनपर क्रोधित हो गये। क्रोधित होकर स्कन्धने उनमें जलका सञ्चार बन्द कर दिया। जलके अभावसे क्षीण वे शाखाएँ सूखकर मर गयीं ॥ 67–69 ॥ श्रीगौरकृष्णभक्त-यमके गुरु, श्रीगौरकृष्णविमुख-यमके द्वारा दण्डयोग्य :- चैतन्य-रहित देह—शुष्ककाष्ठ-सम। जीवितेइ मृत सेइ, मैले दण्डे यम ॥ 70 ॥ केवल ए गण-प्रति नहे एइ दण्ड। चैतन्य-विमुख येइ सेइ त’ पाषण्ड ॥ 71 ॥ कि पण्डित, कि तपस्वी, किवा गृही, यति। चैतन्य-विमुख येइ, तार एइ गति ॥ 72 ॥ अनुवाद—चेतनारहित देह जैसे सूखी लकड़ीके समान है, वैसे ही श्रीकृष्णभक्तिरहित मनुष्य जीवित होते हुए भी मृतके समान है और मरनेके बाद उसे यमराजका दण्ड भोगना पड़ता है। ऐसा दण्ड केवल भटके हुए श्रीअद्वैताचार्यके गणोंके लिये ही नहीं है, अपितु यह श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख सभी जीवोंके लिये है, क्योंकि वे सभी पाखण्डी हैं। क्या पण्डित, क्या तपस्वी, क्या गृहस्थ और क्या संन्यासी, जो भी श्रीचैतन्य महाप्रभुसे विमुख हैं, उनकी यही गति है ॥ 70-72 ॥ अनुभाष्य—(भाः 6/3/29) में जैसा यमराजजीने अपने दूतोंसे कहा— बारहवाँ अध्याय | 137