भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 685, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 685

13/18-25 ]

आदिलाके चार भाग :- बाल्य, पौगण्ड, कैशोर, यौवन,–चारिभेद। अतएव आदिखण्डे लीला चारि भेद॥18॥ अनुवाद—अवस्थाके अनुसार बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन-ये चार भेद हैं। इसलिये आदिखण्डमें लीलाके चार भेद हैं॥18॥ शुभ फाल्गुनी-पूर्णिमाकी वन्दना :- सर्वसद्गुणपूर्णां तां वन्दे फाल्गुनपूर्णिमम्। यस्यां श्रीकृष्णचैतन्योऽवतीर्णः कृष्णनामभिः॥19॥ अनुवाद-अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य- “वैवस्वतमनोरष्टाविंशतियुगसम्भवे। चतुर्दश-शताब्दे वै सप्तवर्षसमन्विते॥ भागीरथीपटे रम्ये शचीगर्भमहार्णवे। राहुग्रस्ते पूर्णिमायां गौराङ्गः प्रकटोऽभवत्॥” “अर्थात् वैवस्वत मन्वन्तरके अठाइसवें चतुर्युगमें कलियुगमें चौदह सौ सात (शक) वर्षमें भागीरथीके तटपर शचीमाताके गर्भरूप महासिन्धुसे राहुग्रस्त पूर्णिमा (चन्द्रग्रहणके समय) में श्रीगौराङ्गदेव प्रकट हुए।” उस सर्वसद्गुणोंसे पूर्ण फाल्गुन-पूर्णिमाकी मैं वन्दना करता हूँ, जिस पूर्णिमामें श्रीकृष्णनामके साथ श्रीकृष्णचैतन्य अवतीर्ण हुए थे॥19॥ अनुभाष्य-यस्यां (फाल्गुन-पौर्णमास्यां) कृष्णनामभिः [सह] श्रीकृष्णचैतन्यः (राधाकृष्णाभिन्नविग्रहः मूलावतारो गोलोकनाथः) [निजलोकतः गौरप्रकोष्ठात् प्रपञ्चे भौमनवद्वीपे] अवतीर्णः, तां सर्वसद्गुणपूर्णां फाल्गुन-पूर्णिमां (प्रापञ्चिक-कालावतीर्णाम् अप्राकृतां सेवापरां तिथिरूपां देवीम्) (अहं) वन्दे। श्लोक भावानुवाद-जिस फाल्गुनकी पूर्णिमामें श्रीकृष्णनामके साथ श्रीराधाकृष्णाभिन्न-विग्रह मूलावतारो गोलोकनाथ श्रीकृष्णचैतन्य अपने लोकके गौरप्रकोष्ठसे इस प्रपञ्चमें भौम नवद्वीपमें अवतरित हुए, उस सर्व-सद्गुणशाली (इस प्रपञ्चमें कालके रूपमें अवतीर्ण, अप्राकृत जगत्में सेवा-परायण तिथिरूपा देवी) फाल्गुन-पूर्णिमाकी मैं वन्दना करता हूँ॥19॥ चन्द्रग्रहण-छलसे जीवोंको हरिनामें प्रेरित करना :- फाल्गुनपूर्णिमा-सन्ध्याय प्रभुर जन्मॊदय। सेइ काले दैवयोगे चन्द्रेर ग्रहण हय॥20॥ 'हरि' 'हरि' बले लोक हरषित हञा। जन्मिला चैतन्यप्रभु 'नाम' जन्माइया॥21॥ अनुवाद—फाल्गुन पूर्णिमाकी सन्ध्यामें महाप्रभुका जन्म हुआ और दैववश उस समय चन्द्रग्रहण लगा हुआ था। सभी लोग हर्षसे 'हरि' 'हरि' बोल रहे थे। इस प्रकार हरिनामको जन्म देते हुए श्रीचैतन्य महाप्रभुने जन्म लिया॥20-21॥ आदिलीलामें सर्वत्र हरिनाम-प्रवर्तन :- जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर-युवाकाले। हरिनाम लओयाइला प्रभु नाना छले॥22॥ अनुवाद-उन्होंने जन्मके समय, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और युवाकालमें अनेक प्रकार युक्तियोंसे लोगोंसे हरिनाम करवाया॥21-22॥ नाम उच्चारण करानेके छलसे क्रन्दन और नाम लेनेपर ही शान्त होना :- बाल्यभाव-छले प्रभु करेन क्रन्दन। 'कृष्ण' 'हरि' नाम शुनि' रहये रोदन॥23॥ दर्शनके लिये आने वाले सभी व्यक्तियोंके द्वारा नाम-उच्चारण :- अतएव 'हरि' 'हरि' बले नारीगण। देखिते आइसे येवा सर्व बन्धुजन॥24॥ 'गौरहरि' नामकी आदि सूचना :- 'गौरहरि' बलि' तारे हासे सर्वनाी। अतएव हैल ताँर नाम 'गौरहरि'॥25॥ अनुवाद-महाप्रभु बाल्यभावके छलसे रोते थे और जब तक 'कृष्ण' या 'हरि' नाम नहीं सुनते थे, तब तक

तेरहवाँ अध्याय | 149