श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 13/23-30 रोते रहते। इसलिये जब महाप्रभु रोने लगते, तब उनको देखने आनेवाली महिलाएँ और सभी बन्धु-बान्धव 'हरि' 'हरि' बोलते। महिलाएँ आनन्दसे 'गौरहरि' बोलकर उन्हें हँसाती, इसलिये महाप्रभुका एक नाम 'गौरहरि' हो गया॥ 23-25 ॥ आयु वृद्धिके साथ सब समय जीवोंको नाममें प्रवर्तन :- बाल्य वयस—यावत् हाते खड़ि दिल। पौगण्ड वयस—यावत् विवाह ना कैल॥ 26 ॥ विवाह करिले हैल नवीन यौवन। सर्वत्र लओयाइल प्रभु नाम-सङ्कीर्त्तन॥ 27 ॥ अनुवाद—जन्मसे विद्या आरम्भ करने तक उनकी बाल्यावस्था है, इसके बाद उनके विवाह तक पौगण्ड अवस्था है। विवाह करनेके समयसे उनका नवयौवन आरम्भ होता है। इस अवस्थामें महाप्रभुने सर्वत्र नाम-सङ्कीर्त्तनका प्रचार किया॥ 26-27 ॥ पौगण्डमें अध्ययन-अध्यापना करते समय प्रत्येक विषयमें श्रीकृष्णनाम-व्याख्या और प्रेरणा :- पौगण्ड-वयसे पड़ेन, पड़ान शिष्यगणे। सर्वत्र करेन कृष्णनामेर व्याख्याने॥ 28 ॥ सूत्र-वृत्ति-टीकाय कृष्णनामेर तात्पर्य। शिष्येर प्रतीत हय, —सबार आश्चर्य॥ 29 ॥ अनुवाद—पौगण्ड अवस्थामें उन्होंने स्वयं विद्याध्ययन किया और बादमें शिष्योंको पढ़ानेका कार्य आरम्भ किया तथा वे सर्वत्र ही श्रीकृष्णनामकी व्याख्या करते। वे सूत्रों, वृत्तियों और टीकाओंकी ऐसी व्याख्या करते कि सबका तात्पर्य श्रीकृष्णनाम ही है तथा उसे श्रवणकर उनके शिष्योंको उसकी अनुभूति भी होती—ऐसा देखकर सभीको आश्चर्य होता॥ 28-29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्याकरण-सूत्र, उसकी वृत्ति और टीका शिष्योंको पढ़ाते समय महाप्रभु श्रीकृष्णनाम तात्पर्यके द्वारा शिष्योंको शिक्षा देते। उस शिक्षाका अवलम्बन करके श्रीजीव गोस्वामीने बादमें 'लघु' और 'बृहत्', इन दो 'हरिनामामृत-व्याकरण' की रचना की। इन दोनों व्याकरणोंका पाठ करनेसे जीवोंमें शब्द-ज्ञान और श्रीकृष्णभक्तिका उदय होता है॥ 29 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः मध्यखण्ड, पहला अध्याय)— “आविष्ट हइया प्रभु करये व्याख्यान। सूत्रवृत्ति-टीकाय सकले हरिनाम्॥ 147 ॥ प्रभु बले,—सर्वकाल सत्य कृष्णनाम। सर्वशास्त्रे कृष्ण बइ ना बलये आन॥ 148 ॥ कृष्णेर चरण छोड़ि’ ये आर बाखाने। व्यर्थ जन्म याय तार अकथ्य कथने॥ 150 ॥ कृष्णेर भजन छोड़ि’ ये शास्त्र बाखाने। से अधम कभु शास्त्रमर्म नाहि जाने॥ 157 ॥ शास्त्रेर ना जाने मर्म, अध्यापना करे। गर्दभेर प्राय मात्र शास्त्र बहि’ मरे॥ 158 ॥” “महाप्रभु आविष्ट होकर सूत्र, वृत्ति और टीका सभीकी हरिनाामसे व्याख्या करते थे। महाप्रभुने कहा,—'श्रीकृष्णनाम सब कालमें सत्य है। सभी शास्त्र श्रीकृष्णके विषयमें ही कहते हैं और उन्हें छोड़कर अन्य कुछ नहीं कहते। श्रीकृष्णके चरणोंको छोड़कर जो शास्त्रोंकी व्याख्या करता है, वह अकथ्य है अर्थात् जो कहने योग्य नहीं है, ऐसा व्याख्यान करनेसे उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है। जो श्रीकृष्णके भजनके अतिरिक्त अन्य-अन्य रूपोंमें शास्त्रका व्याख्यान करता है, वह अधम व्यक्ति शास्त्रके वास्तविक अर्थको नहीं जानता। जो शास्त्रके मर्मको नहीं जानता और उसका अध्यापन करता है, उसका बोलना गधेके रेंकनेके समान ही व्यर्थ है और वह शास्त्रको जाने बिना ही मर जाता है।'” 28-29 ॥ सभीको श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनमें प्रवर्तन :- यारे देखे, तारे कहे, —कह कृष्णनाम। कृष्णनामे भासाइल नवद्वीप-ग्राम॥ 30 ॥ 150 | श्रीचैतन्यचरितामृत