श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 687, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें13/30-39 ] कैशोरमें स्वयं कीर्तन करके सभीको नाममें प्रवर्तन :- किशोर-वयसे आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। रात्र-दिने प्रेमे नृत्य, सङ्गे भक्तगण॥ 31 ॥ नगरे नगरे भ्रमे कीर्त्तन करिया। भासाइल त्रिभुवन प्रेमभक्ति दिया॥ 32 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जिसे भी देखते, उसे ही श्रीकृष्णनाम उच्चारण करनेके लिये कहते। इस प्रकार महाप्रभुने नवद्वीपको श्रीकृष्णनाममें निमग्न करवाया। कैशोर अवस्थामें महाप्रभुने सङ्कीर्तन आरम्भ किया और वे रात-दिन भक्तोंके साथ प्रेममें विभोर होकर नृत्य करते। वे नगर-नगरमें भ्रमणकर कीर्तन करते। इस प्रकार उन्होंने तीनों लोकोंको प्रेमभक्ति प्रदानकर उसमें निमग्न कर दिया॥ 30-32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘श्रीनवद्वीपधाम’-जाह्नवी (गङ्गा) नदीसे वेष्टित (घिरे हुए) सोलह कोसकी परिधिके भीतर श्रीनवद्वीपधाम है। उसमें नवधा भक्तिके पीठस्वरूप ‘अन्तः’, ‘सीमन्त’, ‘गोद्रुम’, ‘मध्य’, ‘कोल’, ‘ऋतु’, ‘जह्नु’, ‘मोद्रुम’ और ‘रुद्र’-ये नौ द्वीप विराजमान हैं। उनमेंसे अन्तर्द्दीपके मध्यभागमें श्रीमायापुर-ग्राममें श्रीजगन्नाथ मिश्रका निवास-स्थान है। इन सब नगर-नगरमें कीर्तन करके महाप्रभुने प्रेमभक्तिके द्वारा तीनों लोकोंको आप्लावित किया॥ 32 ॥ नवद्वीपमें पूर्ण चौबीस वर्ष ही जीवोंको नाममें प्रवर्तनः- चब्बिश वत्सर ऐछे नवद्वीप-ग्रामे। लओयाइल सर्वलोके कृष्णप्रेम-नामे॥ 33 ॥ अनुवाद-चौबीस वर्षकी अवस्था तक महाप्रभुने नवद्वीप-ग्राममें सबसे श्रीकृष्णनाम बुलवाकर श्रीकृष्णप्रेम प्रदान किया॥ 33 ॥ नीलाचलमें शेष चौबीस वर्षोंमेंसे छह वर्ष समुद्रसे हिमाचलतक नाम प्रेम-प्रचार :- चब्बिश वत्सर छिला करिया संन्यास। भक्तगण लञा कैला नीलाचले वास॥ 34 ॥ तार मध्ये नीलाचले छय वत्सर। नृत्य, गीत, प्रेमभक्ति-दान निरन्तर॥ 35 ॥ सेतुबन्ध, आर गौड़-व्यापि वृन्दावन। प्रेम-नाम प्रचारिया करिल भ्रमण॥ 36 ॥ ये छह वर्ष ही-मध्यलीला और केवल नामप्रचारमय :- एइ ‘मध्यलीला’-नाम लीला-मुख्यधाम। शेष अष्टादश वर्ष-‘अन्त्यलीला’ नाम॥ 37 ॥ अनुवाद-चौबीस वर्षकी आयुमें उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करने लगे। प्रथम छह वर्षोंमें नीलाचलमें नृत्य और गान करते हुए उन्होंने निरन्तर प्रेमभक्तिका दान किया। इसी समय कन्याकुमारीसे लेकर सम्पूर्ण गौड़देश और वृन्दावन तक सम्पूर्ण भारतका भ्रमण करके उन्होंने नाम-कीर्तन करते हुए सर्वत्र प्रेमका दान किया। यही छह वर्षोंकी ‘मध्यलीला’ की मुख्य लीलाएँ हैं। शेष अठारह वर्षोंकी लीलाका नाम ‘अन्त्यलीला’ है॥ 34-37 ॥ अवशिष्ट अठारह वर्षोंमें छह वर्ष केवल कीर्तन-नृत्य द्वारा प्रेम-प्रचार :- तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे। प्रेमभक्ति लओयाइल नृत्य-गीत-रङ्गे॥ 38 ॥ शेष बारह वर्ष केवल स्वयं श्रीकृष्णविरहमें अनुक्षण श्रीकृष्णप्रेमका आस्वादन और प्रेमावस्था-प्रदर्शन :- द्वादश वत्सर शेष रहिला नीलाचले। प्रेमावस्था शिखाइला आस्वादन-छले॥ 39 ॥ अनुवाद-उन अठारह वर्षोंमेंसे प्रथम छह वर्ष भक्तोंके सङ्गमें आनन्दके साथ नृत्य-गीत करते हुए सबको प्रेमभक्ति प्रदान की। शेष बारह वर्ष वे नीलाचलमें ही रहे। स्वयं प्रेमास्वादन करते हुए उन्होंने प्रेमकी विभिन्न अवस्थाओंको जगत्को भी सिखलाया॥ 38-39 ॥ अनुभाष्य-जातप्रेम-व्यक्ति सम्भोगके पुष्टिकारक तेरहवाँ अध्याय | 151