श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/39-42
अप्राकृत विप्रलम्भरसमें अवस्थित होते हैं। श्रीगौरसुन्दरने उसी प्रेमावस्थाको स्वयं आस्वादन करनेकी इच्छाके द्वारा जगत्के जीवोंको सिखलाया कि विप्रलम्भके बिना सम्भोगकी पुष्टि नहीं होती॥39॥ रात्रि-दिवसे कृष्णविरह-स्फुरण। उन्मादेर चेष्टा करे प्रलाप-वचन॥40॥ उद्धवके द्वारा दृष्ट श्रीराधाके समान महाप्रभुका महाभाव :- श्रीराधार प्रलाप यैछे उद्धव-दर्शने। सेइमत उन्माद-प्रलाप करे रात्रिदिने॥41॥ अनुवाद—रात-दिन उन्हें श्रीकृष्णके विरहकी अनुभूति होती थी, इसके फलस्वरूप वे उन्माद-ग्रस्त जैसा आचरण करते और प्रलाप करने लगते। श्रीमती राधिकाके जैसे प्रलापका उद्धवजीने दर्शन किया था, वैसे ही महाप्रभु रात-दिन उन्माद अवस्थामें प्रलाप करते थे॥41॥ अनुभाष्य—उद्धवजीने वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिकाका जिस 'चित्रजल्प' भावमय अवस्थाका दर्शन किया था, वैसे ही भावमय श्रीगौरसुन्दर सुदीर्घ विप्रलम्भरसके मूर्तिमान आदर्श हैं। असूया, ईर्ष्या और मदयुक्त अवज्ञामुद्राके द्वारा श्रीमती राधिकाने भ्रमरको उपलक्ष्य करके श्रीकृष्णकी अपटुता प्रकाश करते हुए जो प्रजल्प किया था, उन सब भावोंमें श्रीगौरसुन्दर निमग्न रहते थे। चैःचः आदिलीला, 4/107-108 संख्या द्रष्टव्य है॥41॥ स्वरूप और रायके साथ चण्डीदास, विद्यापति और गीतगोविन्दकी आलोचना :- विद्यापति, जयदेव, चण्डीदासेर गीत। आस्वादेन रामानन्द-स्वरूप-सहित॥42॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीराय रामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदरके साथ विद्यापति, जयदेव और चण्डीदासके गीतोंका आस्वादन करते थे॥42॥ अनुभाष्य—'विद्यापति'—ये ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न मिथिलामें रहनेवाले एक वैष्णव कवि थे। राजा शिवसिंह और रानी लछिमादेवीके राज्यकालमें श्रीमन्महाप्रभुके प्रकटकालसे प्रायः एक सौ वर्ष पूर्व इनका जन्म हुआ था। चौदह सौ शक शताब्दीके प्रथम भागमें इन्होंने गीतोंकी रचना की। इनके द्वारा रचित श्रीकृष्ण गीतोंमें प्रचुर अप्राकृत विप्रलम्भ-रसका आदर्श प्राप्त होता है। इनके ऐसे भाव श्रीमन्महाप्रभुके आस्वादनीय थे। 'जयदेव'—बङ्गालके राजा 'लक्ष्मणसेन' के राज्यकालमें ये भोजदेवके द्वारा वामादेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। किसी-किसीके मतसे इनका जन्मकाल ग्यारहवीं अथवा बारहवीं शक शताब्दी है। बङ्गालकी राजधानी नवद्वीप-नगरमें इन्होंने बहुत समय तक वास किया। किसीके मतके अनुसार वीरभूम जिलाके 'केन्दुबिल्व' ग्राममें अथवा अन्य किसीके मतानुसार उत्कलदेशमें अथवा अन्य किसीके मतमें दक्षिणदेशमें इनका जन्म हुआ। इन्होंने नवद्वीपमें बहुत समय रहनेके बाद जीवनका शेष समय श्रीजगन्नाथक्षेत्रमें व्यतीत किया। इनके कविता-ग्रन्थका नाम 'गीत-गोविन्द' अथवा 'अष्टपदी' है। इस ग्रन्थमें प्रचुर अप्राकृत विप्रलम्भ-रसका समावेश देखा जाता है। श्रीभागवतमें वर्णित रासस्थलीसे व्रजराजकुमारके गोपियोंको छोड़कर जानेसे सम्भोगरसके पुष्टिकारक विप्रलम्भ-रसकी अवतारणा इस ग्रन्थमें वर्णित है। अष्टपदीकी टीका और टीकाकारोंके नाम 'वैष्णव-मञ्जूषा' (प्रथम संख्या) में द्रष्टव्य हैं। 'चण्डीदास'—इन्होंने वीरभूम जिलाके अन्तर्गत 'नान्नुर' ग्राममें ब्राह्मण कुलमें चौदह सौ शक शताब्दीके प्रथम भागके अन्त होनेके बाद जन्म ग्रहण किया। सम्भवतः विद्यापति ठाकुरके साथ इनका बन्धुत्व था। इनकी लेखनीमें अप्राकृत विप्रलम्भरसकी प्रचुरता है। चण्डीदासादि भक्तोंकी प्रस्फुटित भावावली श्रीमन्महाप्रभुकी परमप्रिय आस्वादनीय वस्तु थी। श्रीराधाभावमें ही विभावित होकर, श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीरामानन्दराय—इन दो
152 | श्रीचैतन्यचरितामृत