श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तरङ्ग भक्तोंके साथ विप्रलम्भ-रसास्वादनके द्वारा श्रीकृष्णचन्द्रने श्रीगौरसुन्दररूपमें अपनी वाञ्छा पूर्ण की थी। परमहंसकुल-शिरोमणि श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीराय रामानन्द जैसे अद्वितीय चिन्मय श्रीकृष्णरस-तत्त्ववेत्ताओंके साथ स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने इन तीन भक्तों (विद्यापति, चण्डीदास और जयदेव) के द्वारा रचित जिन अप्राकृत गीतोंका आस्वादन किया, वही अद्वितीय भोक्ता सच्चिदानन्दविग्रह श्रीनन्दनन्दनके प्रति 'कृष्णमयी' श्रीराधिकाके महाभाव-वैचित्र्यसमूहका विकास है। यह इस नश्वर स्थूल-सूक्ष्म जगत्के भोग और त्याग-इन दोनोंसे उदासीन, परममुक्त और निष्किञ्चन, राधादास्यके नित्य अभिलाषी, महासौभाग्यवान् व्यक्तियोंके ही नित्य अनुसरणका विषय है। प्राकृत काव्यरसके आमोदी, निरीश्वर साहित्य-प्रिय, इन्द्रिय विषय-भोगी व्यक्तियोंके द्वारा इन अप्राकृत गीतोंकी गवेषणाके कारण तथा प्राकृत सहजिया सम्प्रदायके लोगोंने अपनी जड़ेन्द्रियोंके भोगके लिये स्वयंमें 'रागानुगा' होनेका अभिमान करके चण्डीदास, विद्यापति और जयदेवके गीतोंकी जो आलोचना करनेकी धृष्टता दिखलायी है, उसके फलस्वरूप वह जगत्में नास्तिकता और व्यभिचारकी वृद्धि कराकर उनको नरकगामी बना रही है। उनकी इस आलोचना और व्याख्याको स्वीकारकर देहात्मबुद्धिवाले असत्-तृष्णामय, अनर्थयुक्त अनधिकारी लोग परममुक्त भक्तोंके आराध्य श्रीराधाकृष्णकी अलौकिक लीलाविलासको प्राकृत नायक-नायिकाके वैरस्यमय घृणित काम-क्रीड़ा-विलास अथवा उसके समान मानकर स्वयंकी इन्द्रियोंकी तृप्तिमें लग जाते हैं। वे श्रीराधाकृष्णकी अप्राकृत लीलाके वर्णनके अधिकारी नहीं हैं॥42॥ श्रीराधाकी कृष्णविरह-चेष्टासे उत्पन्न कृष्णप्रेमास्वादनके द्वारा अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :- कृष्णेर वियोगे यत प्रेम-चेष्टित। आस्वादिया पूर्ण कैल आपन वाञ्छित॥43॥
अनन्त चैतनलीला क्षुद्र जीव हञा। के वर्णिते पारे, ताहा विस्तार करिया॥44॥ स्वयं अनन्तदेव भी गौरलीलाका अन्त पानेमें असमर्थ :- सूत्र करि' गणे यदि आपने अनन्त। सहस्र-वदने तेँहो नाहि पाय अन्त॥45॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीमती राधिकाकी जो प्रेम-चेष्टाएँ थीं, उस प्रेम-वैचित्रीका आस्वादनकर महाप्रभुने अपनी इच्छाओंकी पूर्ति की। श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अनन्त लीलाएँ हैं, मैं एक क्षुद्र जीव होकर उनका विस्तारसे कैसे वर्णन कर सकता हूँ? यदि स्वयं अनन्त शेष भी सूत्र रूपसे उनका वर्णन करना चाहें, तो भी वे अपने हजारों मुखोंसे उनका वर्णन नहीं कर सकते॥43-45॥ मुरारिगुप्त और श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा रचित सूत्रमें आदि और शेषलीलाका लेखन :- दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त मुरारि। मुख्यमुख्यलीला सूत्रे लिखियाछे विचारि'॥46॥ उन्हीं सूत्रोंके अनुसार वृन्दावनदासके द्वारा गौरलीला-वर्णन :- सेइ अनुसारे लिखि लीला-सूत्रगण। विस्तारि' वर्णियाछेन ताहा दास-वृन्दावन॥47॥ श्रीवृन्दावनदासकी रचना-माधुर्य-वर्णन :- चैतन्य-लीलार व्यास,-दास वृन्दावन। मधुर करिया लीला करिला रचन॥48॥ ग्रन्थकारके द्वारा उनके द्वारा छोड़े गये अंशोंके वर्णनकी प्रतिज्ञा :- ग्रन्थ-विस्तार-भये छाड़िला ये ये स्थाने। सेइ सेइ स्थाने किछु करिब व्याख्याने॥49॥ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरको ग्रन्थकारके द्वारा मर्यादा-प्रदान :- प्रभुर लीलामृत तेँहो करिल स्वादन। ताँर भुक्त-शेष किछु करिये चर्वण॥50॥
तेरहवाँ अध्याय | 153