भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 690, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 690

[ 13/46-58 अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीमुरारिगुप्तने भी केवल मुख्य-मुख्य लीलाएँ ही सूत्ररूपमें विचारपूर्वक लिखी हैं। उन्हींके अनुसार मैं उन लीलाओंको सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ, जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे वर्णन किया है। श्रीचैतन्यलीलाके व्यास श्रीवृन्दावनदास हैं। उन्होंने लीलाओंका इस प्रकारसे वर्णन किया है कि वे और भी सरस और मधुर हो गयी हैं। ग्रन्थके विस्तारके भयसे उन्होंने जिस-जिस स्थानपर कुछ लीलाओंको छोड़ा है, मैं उन-उन स्थानोंपर उन लीलाओंका कुछ विस्तारसे वर्णन करनेका प्रयास करूँगा। महाप्रभुके लीलामृतका उन्होंने आस्वादन किया है, मैं तो केवल उनके उच्छिष्टका कुछ चर्वण करूँगा ॥ 46-50 ॥

आदिलीला-सूत्रारम्भ :- आदिलीला-सूत्र लिखि, शुन, भक्तगण। संक्षेपे लिखिये सम्यक् ना याय लिखन ॥ 51 ॥

अनुवाद—हे भक्तगण! सुनिये, मैं आदिलीलाको सूत्ररूपमें लिख रहा हूँ। मैं लीलाओंको संक्षेपमें लिख रहा हूँ, क्योंकि समस्त लीलाओंको लिखना सम्भव नहीं है ॥ 51 ॥

तीन इच्छाओंकी पूर्तिके लिये श्रीकृष्णका गौररूपमें अवतार :- कोन वाञ्छा पूरण लागि' व्रजेन्द्रकुमार। अवतीर्ण हैते मने करिला विचार ॥ 52 ॥

अनुवाद—किसी इच्छाकी पूर्तिके लिये मनमें विचार करके व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेका निश्चय किया ॥ 52 ॥

श्रीकृष्णके गुरुजनोंका अवतार :- आगे अवतारिल ये गुरु-परिवार। संक्षेपे कहिये, कहा ना याय विस्तार ॥ 53 ॥

अनुवाद—पहले उन्होंने अपने जिन गुरुवर्ग और परिवारको अवतीर्ण करवाया, उनका मैं संक्षेपमें वर्णन करूँगा, क्योंकि विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं है ॥ 53 ॥

गुरुवर्गके नाम :- श्रीशची-जगन्नाथ, श्रीमाधवपुरी। केशव भारती, आर श्रीईश्वरपुरी ॥ 54 ॥ अद्वैत आचार्य, आर पण्डित श्रीवास। आचार्यरत्न, विद्यानिधि, ठाकुर हरिदास ॥ 55 ॥

अनुवाद—श्रीकृष्णने श्रीशचीदेवी, श्रीजगन्नाथ मिश्र, श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीकेशव भारती, श्रीईश्वरपुरी, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीवास पण्डित, आचार्यरत्न, विद्यानिधि और श्रीहरिदास ठाकुरको पहले अवतीर्ण करवाया ॥ 54-55 ॥

श्रीहट्ट-निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र-नाम। वैष्णव, पण्डित, धनी, सद्गुण-प्रधान ॥ 56 ॥

अनुवाद—श्रीहट्टके निवासी श्रीउपेन्द्रमिश्र भी पहले अवतरित हुए। वे परम वैष्णव, विद्वान, धनी और सद्गुण सम्पन्न थे ॥ 56 ॥

अनुभाष्य— 'श्रीउपेन्द्रमिश्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 35वाँ श्लोक)— “पर्जन्यो नाम गोपाल आसीत् कृष्णपितामहः। उपेन्द्रमिश्रः सञ्जातः श्रीहट्टे सप्त पुत्रवान्॥ 35॥” “व्रजमें जो पर्जन्य नामक गोप श्रीकृष्णके पितामह (दादा) थे, उन्होंने ही श्रीहट्टमें श्रीउपेन्द्र मिश्रके रूपमें जन्म ग्रहण किया है।” श्रीहट्ट जिलाके अन्तर्गत 'ढाका-दक्षिण' ग्राम इनका वासस्थान था ॥ 56 ॥

उपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र :- सप्त मिश्र ताँर पुत्र-सप्त ऋषीश्वर। कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर ॥ 57 ॥ जगन्नाथ, जनार्द्दन, त्रैलोक्यनाथ। नदीयाते गङ्गावास कैल जगन्नाथ ॥ 58 ॥

154 | श्रीचैतन्यचरितामृत