श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें13/57-62 ]
अनुवाद—श्रीउपेन्द्र मिश्रके सात पुत्र थे—कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर, जगन्नाथ, जनार्दन और त्रैलोक्यनाथ—ये सातों ऋषियोंके समान बड़े प्रभावशाली थे। इनमेंसे श्रीजगन्नाथ मिश्रने गङ्गाके तटपर वास करनेके उद्देश्यसे नदियामें अपना निवास स्थान बनाया॥ 57-58 ॥
श्रीकृष्णावतारमें जगन्नाथका परिचय :— जगन्नाथ मिश्रवर—पदवी 'पुरन्दर'। नन्द-वसुदेव पूर्वे सद्गुण-सागर ॥ 59 ॥
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रजीकी 'पुरन्दर' पदवी (उपाधि) थी। वे पूर्वमें नन्द महाराज और श्रीवसुदेव थे और सद्गुणोंके सागर थे॥ 59 ॥
शची और नीलाम्बर चक्रवर्ती :— ताँर पत्नी 'शची'-नाम, पतिव्रता सती। याँर पिता 'नीलाम्बर' नाम चक्रवर्त्ती ॥ 60 ॥
अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रकी पत्नीका नाम शचीदेवी था और वे पतिव्रता सती नारी थीं; शचीदेवीके पिता नीलाम्बर चक्रवर्त्ती थे॥ 60 ॥
अनुभाष्य—'नीलाम्बर चक्रवर्त्ती'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका श्लोक 104-105)— “नीलाम्बरश्चक्रवर्त्ती गौरस्य भावि जन्म यत्। सभायां कथयामास तेनासौ गर्ग उच्यते ॥ 104 ॥ श्रीशच्या जनकत्वेन सुमुखो वल्लवो मतः ॥ 105(क) ॥" “सभामें श्रीगौरहरिके भावी जन्मका अर्थात् श्रीगौरहरिके जन्म होनेके उपरान्त उनके भविष्यका वर्णन करनेवाले श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीको गर्गाचार्य कहा जाता है। श्रीशचीदेवीके पिता होनेके कारण श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीको (श्रीयशोदाके पिता) सुमुख गोप माना जाता है।” इनके वंशधर फरिदपुर जिलामें मग्डोबा ग्राममें हैं। इनके भतीजे जगन्नाथ चक्रवर्ती अथवा 'मामुठाकुर' श्रीगदाधर पण्डितके शिष्यरूपमें श्रीक्षेत्रमें टोटा-गोपीनाथके सेवक थे। 'प्रेम-विलास' ग्रन्थके अनुसार नीलाम्बर चक्रवर्तीका नवद्वीपमें वासस्थान 'बेलपुकुरिया' में था। और काजीपाड़ामें इनका वासस्थान होनेसे ग्राम-सम्बन्धसे काजीने स्वयंको महाप्रभुका मामा कहा था (चैःचः आदिलीला, 17/148-149 संख्या द्रष्टव्य है)। काजीके घर और समाधिके तितर-बितर (पृथक्-पृथक्) होनेकी सम्भावना नहीं होनेके कारण पूर्वकथित 'बेलपुकुरिया' मुहल्ला ही वर्तमानमें 'वामनपुकुर'-नामक मुहल्ला है—ऐसा जाना जाता है, क्योंकि काजीकी समाधि अभी भी 'वामनपुकुर'में है॥ 60 ॥
श्रीनित्यानन्द, गङ्गादास, मुरारि, मुकुन्द :— राढ़देशे जन्मिला ठाकुर नित्यानन्द। गङ्गादास पण्डित, गुप्त मुरारि, मुकुन्द ॥ 61 ॥
सबके बादमें स्वयं अवतीर्ण :— असंख्य भक्तेर कराइला अवतार। शेषे अवतीर्ण हैला व्रजेन्द्रकुमार ॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु राढ़देशमें अवतीर्ण हुए। गङ्गादास पण्डित, मुरारि गुप्त और मुकुन्दादि असंख्य भक्तोंको अवतीर्ण करवाकर तब स्वयं श्रीकृष्ण अवतरित हुए॥ 61-62 ॥
अनुभाष्य—'राढ़देशमें'—वीरभूम जिलाके अन्तर्गत एकचक्रा-ग्राममें। एकचक्रा ग्राम उत्तर-दक्षिण दिशामें चार कोस लम्बा है। 'वीरचन्द्रपुर' अथवा 'वीरभद्रपुर' एकचक्रा-ग्रामकी सीमामें ही स्थित है। वीरभद्र प्रभुके नामपर ही इस स्थानका नाम वीरचन्द्रपुर अथवा वीरभद्रपुर हुआ है। 1331 बङ्गाब्दके आषाढ़ मासमें बिजली गिरनेसे मन्दिरका चूड़ा टूट गया था और मन्दिरको भी बहुत क्षति पहुँची थी। इसके पूर्व कभी भी श्रीमन्दिरके ऊपर इस प्रकारका दैविक प्रकोप नहीं हुआ था। मन्दिरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण-विग्रह हैं,—जिनका नाम श्रीबङ्किमराय अथवा 'बाँका-राय' है। श्रीबङ्किमरायके दाहिने ओर श्रीजाह्नवा और बायीं ओर श्रीमती राधिका हैं। सेवायेत लोगोंका
तेरहवाँ अध्याय | 155