श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 692, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/61-62 कहना है कि श्रीबङ्किमरायमें श्रीनित्यानन्द प्रभु प्रवेश कर गये थे और उस समयके बाद श्रीबङ्किमरायके दायेंमें जाह्नवा-माताका विग्रह स्थापित हुआ था। बादमें और भी अन्यान्य श्रीविग्रह स्थापित हुए। श्रीमन्दिरमें एक और सिंहासनपर 'मुरलीधर' और 'राधामाधव' श्रीविग्रह विराजमान हैं। एक अन्य पृथक् सिंहासनपर मुर्शिदाबाद जिलाकी विप्रघाटी-गद्दीके श्रीमनोमोहन, श्रीवृन्दावनचन्द्र और श्रीनिताइ-गौरविग्रह लाये गये हैं। एकमात्र श्रीबङ्किमराय ही प्राचीन और श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रतिष्ठित विग्रह हैं। लोकमान्यता है कि श्रीमन्दिरकी पूर्व दिशामें कदम्बखण्डीके घाटपर यमुनाजलमें श्रीबङ्किमराय-विग्रह तैर रहे थे; श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस विग्रहको जलसे उठाकर सेवाके लिये प्रतिष्ठित किया। और वीरचन्द्रपुरसे आधा मील पश्चिममें 'भड़ापुर' नामक स्थानमें नीमके वृक्षके नीचे श्रीमती राधिका प्रकाशित हुईं थीं। इसलिये बहुत पहले श्रीबङ्किमरायकी श्रीमतीको 'भड़ापुरकी ठाकुराणी' के नामसे बुलाते थे। श्रीमन्दिरमें अन्य एक सिंहासनपर श्रीबाँकारायके दाहिनी ओर 'योगमाया' विराजमान हैं। श्रीमन्दिर और जगमोहन ऊँचे पक्के चबूतरेके ऊपर स्थित हैं। सामने ही छोटा नाट्य मन्दिर है। सुना जाता है कि श्रीबाँकारायके मन्दिरकी उत्तरी दिशाकी ओर 'भाण्डीश्वर' शिव अधिष्ठित थे और हाड़ाइ पण्डित उन वैष्णवराज शिवकी आराधना करते थे। अभी वह शिवलिङ्ग अन्तर्धान हो चुका है और उस स्थानपर श्रीजगन्नाथ विग्रह प्रतिष्ठित हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने किसी मन्दिरादिका निर्माण नहीं किया था। वीरभद्र प्रभुके समयका मन्दिर 1298 (बङ्गाब्द) में टूट जानेपर 'शिवानन्द स्वामी' नामक एक ब्रह्मचारीने उस मन्दिरका संस्कार किया। यहाँपर सेवायेत 'गोस्वामी' लोग श्रीनित्यानन्दकी शाखा श्रीगोपीजन-वल्लभानन्दकी शाखाके वंशज हैं। मन्दिरसे कुछ दूर 'विश्रामतला' नामक स्थान है। कहा जाता है कि इसी स्थानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु बाल्यकालमें सखाओंके साथ नाना प्रकारकी व्रजलीला और रासलीलाका अभिनय किया करते थे। 'आमलीतला' नामक स्थानपर एक बड़ा इमलीका वृक्ष विराजित है। नेड़ादि सम्प्रदायके लोगोंने इस स्थानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी मन-गड़न्त कहानियाँ बनायी हैं। वे कहते हैं कि 'श्वेतगङ्गा' नामक एक सरोवरकी खुदाई वीरभद्र प्रभुके अनुगत 1200 नेड़ाओंने की थी। कुछ ही दूर गोस्वामियोंका समाधि-स्तम्भ है; मौड़ेश्वरसे द्वारकेश्वर नद तक उत्तरकी ओर बहनेवाली यमुनाको पार करके आधे मीलके भीतर श्रीनित्यानन्द प्रभुका सूतिका-मन्दिर (जन्मस्थान) है। सूतिका-मन्दिरके सामने एक प्राचीन नाट-मन्दिर था, अब वह टूटकर एक बड़े वटवृक्षके द्वारा आच्छादित हो चुका है। बादमें उस प्राङ्गणमें एक भव्य मन्दिरका निर्माण हुआ था—इसमें श्रीगौरनित्यानन्द-विग्रह विराजमान हैं। जगमोहनके पत्थरके पटलपर स्वर्गीय प्रसन्नकुमार कारफरमाकी स्मृतिकी रक्षाके लिये 1323 वर्ष, वैशाख मासमें इस मन्दिरके संस्कारका उल्लेख है। जिस स्थानपर सूतिका-मन्दिर अवस्थित है, उस स्थानको 'गर्भवास' नामसे कहा जाता है। गर्भवासके निकट हाड़ाइ पण्डितकी संस्कृत व्याकरणकी पाठशाला थी। उस स्थानके सेवायेतोंके नाम—(1) श्रीराघव-चन्द्र गोस्वामी (गौरगणोद्देश-दीपिका 162 श्लोक—व्रजमें जो श्रीराधाकी प्राणस्वरूपा श्रीचम्पकलता सखी थीं, वे ही अब श्रीराघव गोस्वामी हैं। ये वही राघव गोस्वामी हैं, जिन्होंने श्रीगोवर्धनको अपना निवास स्थान बनाया तथा 'भक्तिरत्न-प्रकाश' नामक ग्रन्थकी रचना की (?) तिरोभाव-तिथि—ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी), (2) जगदानन्ददास (तिरोभाव-तिथि—श्रीराधाष्टमी), (3) कृष्णदास (चिड़िया-कुञ्जके, तिरोभाव-तिथि—श्रीकृष्णजन्माष्टमी, (4) नित्यानन्ददास, (5) रामदास, (6) ब्रजमोहनदास, (7) कानाइ दास, (8) गौरदास, (9) शिवानन्द दास, (10) हरिदास। गर्भवास अथवा सूतिका-मन्दिरसे कुछ ही दूरीपर बकुलतला है। इस स्थानपर श्रीनित्यानन्द प्रभु सखाओंके 156 | श्रीचैतन्यचरितामृत