श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें13/61-68 ] साथ 'झाल-झपेटा' खेल खेलते थे। यह बकुलवृक्ष अति आश्चर्यजनक है, इस वृक्षकी शाखाएँ-प्रशाखाएँ ठीक सर्पकी भाँति मुख-फणादियुक्त हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अनन्तदेव श्रीनित्यानन्द प्रभुकी इच्छासे ही इस रूपमें प्रकाशित हैं। वृक्ष भी बहुत प्राचीन है। सुना जाता है कि इस वृक्षके दो डाल पहले अलग-अलग थे, खेलते समय सखाओंको एक डालसे दूसरे डालपर आने-जानेमें कष्ट होता देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने दोनों शाखाओंको एक साथ मिला दिया। 'हाँटुगाड़ा'-लोकमान्यता है कि श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त तीर्थोंको इस स्थानपर लाकर उनका समावेश किया था। आज भी इस धामके वासी गङ्गादि तीर्थोंमें न जाकर इस तीर्थमें ही स्नान करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुने इस स्थानपर दधि-चिड़ा-महोत्सव किया था। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने इस स्थानपर घुटनोंपर बैठकर दधि-चिड़ाका भोजन किया था और उनके इस प्रकार बैठनेके कारण यहाँ एक गढ्ढा बन गया था। इसलिये इस स्थानका नाम 'हाँटुगाड़ा' हो गया। वर्षमें बारह महीनों इस कुण्डमें जल रहता है। कार्तिक-मासमें गोष्ठके समय इस स्थानपर बड़ा मेला होता है। माघी शुक्ला त्रयोदशीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके जन्मोत्सवके समय भी वीरचन्द्रपुरमें विराट मेलेका आयोजन होता है। गौरगणोद्देशदीपिका 11 श्लोक- “भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः॥11(क)॥ बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः सङ्कर्षणो मतः॥58(ख)॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशेन स उच्यते॥59(क)॥" “जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। श्रीबलदेवके सङ्कर्षण व्यूहको विश्वरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभुके बड़े भाई) माना जाता है। वे सङ्कर्षण ही प्रकाशभेदसे अवधूत श्रीनित्यानन्द कहे जाते हैं।” यही व्रजके श्रीबलराम हैं। चैःचः आदिलीला, 3/93 संख्या द्रष्टव्य है॥61-62॥ महाप्रभुके पहले श्रीअद्वैताचार्य ही सभीके पूज्य और प्रधान :- प्रभुर आविर्भाव-पूर्वे यत वैष्णवगण। अद्वैत-आचार्येर स्थाने करेन गमन॥63॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी भक्ति-व्याख्या :- गीता-भागवत कहे आचार्य-गोसाञि। ज्ञान-कर्म निन्दि' करे भक्तिर बड़ाइ॥64॥ एकमात्र श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिधेयके रूपमें व्याख्या :- सर्वशास्त्रे कहे कृष्णभक्तिर व्याख्यान। ज्ञान, योग, तपो-धर्म नाहि माने आन॥65॥ उनको प्रधान-मानकर सभी वैष्णवोंके द्वारा श्रीकृष्णभजन :- ताँर सङ्गे ताते करे वैष्णवेर गण। कृष्णकथा, कृष्णपूजा, नामसङ्कीर्त्तन॥66॥ अनुवाद-महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे पहले सभी वैष्णव श्रीअद्वैताचार्यके घर एकत्रित हुआ करते थे। श्रीअद्वैताचार्य गीता और भागवतादिकी व्याख्या करते हुए कर्म-ज्ञान मार्गको तुच्छ बतलाकर भक्तिकी श्रेष्ठता स्थापित करते थे। वे शास्त्रोंकी आलोचना करके यही बतलाते थे कि सभी शास्त्र मुख्यरूपसे श्रीकृष्णभक्तिकी महिमाका ही गान करते हैं। ज्ञान, योग और तप मुख्य धर्म नहीं हैं। उनके साथ वैष्णव लोग श्रीकृष्णकथा, श्रीकृष्णपूजा और कृष्णनामका सङ्कीर्तन करते हुए आनन्दित होते थे॥63-66॥ प्रकट होकर आचार्यको जीवोंकी इन्द्रियसुखमें तत्परताको देखकर दुःखकी प्राप्ति :- किन्तु सर्वलोक देखि' कृष्णबहिर्मुख। विषये निमग्न लोक, देखि' पाइल दुःख॥67॥ लोगोंके उद्धारके लिये आचार्यकी गम्भीर चिन्ता :- लोकेर निस्तार-हेतु करेन चिन्तन। केमने ए सर्वलोकेर हइबे तारण॥68॥ तेरहवाँ अध्याय | 157