श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 694, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/67-74 स्वयं श्रीकृष्णके अवतार द्वारा ही लोगोंका उद्धार सम्भवपर :- कृष्ण अवतरि' करेन भक्तिर विस्तार। तबे त' सकल लोकेर हइबे निस्तार॥ 69॥ अनुवाद-किन्तु सभी लोगोंको कृष्णबहिर्मुख और केवल विषयोंमें ही निमग्न देखकर श्रीअद्वैताचार्यके मनमें बहुत दुःख होता। वे लोगोंके कल्याणके लिये विचार करने लगे। वे चिन्तन करने लगे कि इन सब लोगोंका उद्धार कैसे होगा? तब उन्होंने सोचा कि यदि स्वयं श्रीकृष्ण अवतरित होकर अपनी भक्तिका प्रचार करेंगे, तभी सब लोगोंका उद्धार होगा॥ 67-69॥ स्वयं श्रीकृष्णको अवतरित करानेके लिये श्रीकृष्णपूजा :- कृष्ण अवतारिते आचार्य प्रतिज्ञा करिया। कृष्णपूजा करे तुलसी-गङ्गाजल दिया॥ 70॥ श्रीकृष्णका आह्वान और श्रीकृष्णका आकर्षण :- कृष्णेर आह्वान करे सघन हुङ्कार। हुङ्कारे आकृष्ट हैला व्रजेन्द्रकुमार॥ 71॥ अनुवाद-इसलिये उन्होंने श्रीकृष्णको अवतीर्ण करानेकी प्रतिज्ञा की और तुलसीदल और गङ्गाजलसे श्रीकृष्णकी पूजा करने लगे। वे सघन हुङ्कार करके श्रीकृष्णका आह्वान करने लगे, जिसे सुनकर श्रीव्रजेन्द्रकुमार उनकी ओर आकृष्ट हुए॥ 70-71॥ अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 3/95-109 संख्या और चैःभाः आदिखण्ड, द्वितीय अध्याय द्रष्टव्य हैं॥ 67-71॥ गौरावतारसे पहले मिश्र और शचीकी आठ कन्याओंकी मृत्यु :- जगन्नाथमिश्र-पत्नी शचीर उदरे। अष्ट कन्या क्रमे हैल, जन्मि' जन्मि' मरे॥ 72॥ मिश्रका दुःख और पुत्र प्राप्तिके लिये विष्णुकी आराधना :- अपत्य-विरहे मिश्रेर दुःखी हैल मन। पुत्र लागि' आराधिल विष्णुर चरण॥ 73॥ उनकी नवम सन्तान-विश्वरूप :- तबे पुत्र जनमिल 'विश्वरूप' नाम। महा-गुणवान् तेँह-'बलदेव'-धाम॥ 74॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्रकी पत्नी शचीदेवीके गर्भसे एक-एक करके आठ कन्याएँ उत्पन्न हुईं, परन्तु वे जन्मके बाद ही मर गयीं। सन्तानके विरहमें श्रीजगन्नाथमिश्र और शचीदेवीका मन बड़ा दुःखी हो गया और वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे भगवान् विष्णुकी आराधना करने लगे। तब उनके घर एक पुत्रका जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने 'विश्वरूप' रखा। विश्वरूपमें महान् गुण थे, क्योंकि वे श्रीबलदेव प्रभुके अवतार थे॥ 72-74॥ अनुभाष्य-'विश्वरूप'—श्रीगौरहरिके बड़े भाई थे। विवाहसे पहले ही इन्होंने गृह त्यागकर संन्यास ग्रहण किया और इनका नाम 'शङ्करारण्य' हुआ। विश्वरूप 1431 शाकाब्दमें महाराष्ट्र 'पाण्डेरपुर' में अप्रकट हुए। वे विश्वके 'उपादान' और 'निमित्त'-दोनों कारणस्वरूप हैं। गौरगणोद्देशदीपिका 58-62 श्लोक- “अंश-अंशिनोरभेदेन व्यूह आद्यः शचीसुतः। बलदेवो विश्वरूपो व्यूहः सङ्कर्षणो मतः॥ 58॥ नित्यानन्दावधूतश्च प्रकाशेन स उच्यते। गौरचन्द्रोदये धर्मं प्रति वाक्यं कलेर्यथा-॥ 59॥ 'अस्याग्रजस्त्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्षणः स भगवान् भुवि विश्वरूपः। स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा पूर्वं परिव्रजित एव तिरोबभूव॥' इति॥ 60॥ 'नित्यानन्दावधूतो मह इति महितम् हन्त सङ्कर्षणं यः।' इति च॥ 61॥ यदा विश्वरूपोऽयं तिरोभूतः सनातनः। नित्यानन्दावधूतेन मिलित्वापि तदा स्थितः॥ 62॥" “अंश और अंशीमें अभेद होनेके कारण आद्यव्यूह 158 | श्रीचैतन्यचरितामृत