भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 695

13/74-79 ] श्रीवासुदेवको श्रीशचीनन्दन माना जाता है। श्रीबलदेवके सङ्कर्षण व्यूहको ही विश्वरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभुके बड़े भाई) माना जाता है। वे सङ्कर्षण ही प्रकाशभेदसे अवधूत श्रीनित्यानन्द कहे जाते हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटकके प्रथम अङ्कके अड़तीसवें तथा इकत्तीसवें श्लोकमें धर्मके प्रति कलिने इस प्रकार कहा है—‘जगत्में श्रीविश्वरूपके नामसे विख्यात श्रीगौरहरिके अग्रज (बड़े भाई) साक्षात् सङ्कर्षण हैं। इन्होंने विवाहसे पूर्व ही संन्यास ग्रहण किया था तथा तीर्थ भ्रमण करते समय अपने तेजको श्रीपरमानन्द पुरीमें (धरोहरकी भाँति) स्थापित करके अन्तर्द्धान हो गये।' और "ब्रह्मादिके द्वारा पूजित महातेजोमय श्रीसङ्कर्षण ही अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं।' इसलिये अपने अन्तर्धानके समय सनातन श्रीविश्वरूप श्रीनित्यानन्द अवधूतसे मिलकर उनके शरीरमें विराजमान हो गये॥" 74॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 77॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अनन्त भगवान् जगदीश्वरमें यह कुछ भी आश्चर्यका विषय नहीं है, क्योंकि उनमें यह विश्व वस्त्रके सूतकी भाँति ओत-प्रोतरूपमें प्रतीत होता है॥ 77॥ अनुभाष्य—श्रीबलदेवके द्वारा धेनुकासुर-वध-लीलाको लक्षित करके शुकदेव गोस्वामीने राजा परीक्षितसे कहा— हे अङ्ग (राजन्), यस्मिन् इदं विश्वं तन्तुषु पटः (वसनं) यथा ओतं प्रोतं (मिथः सम्मिलितं) [तथा] अनन्ते (अपरिविच्छित्रे) जगदीश्वरे [तस्मिन्] भगवति (विष्णौ) एतत् (असुर-निधनादिकं) चित्रम् (आश्चर्यं) न हि भवति। श्लोक भावानुवाद—हे राजन्! जिनके द्वारा यह जगत् वस्त्रमें धागेके समान ओत-प्रोत है, उन अनन्त जगदीश्वर भगवान् विष्णुके द्वारा इस असुरका मारा जाना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है॥ 77॥ विश्वरूप ही वैकुण्ठके महासङ्कर्षण :— बलदेव-प्रकाश—परव्योमे 'सङ्कर्षण'। तेंह—विश्वेर उपादान-निमित्त-कारण॥ 75॥ महाप्रभुका विश्वरूपको 'बड़ा भाई' कहना :— अतएव प्रभु ताँरे बले, 'बड़ भाई'। कृष्ण-बलराम दुइ—चैतन्य-निताइ॥ 78॥ अनुवाद—महासङ्कर्षण वैकुण्ठमें श्रीबलदेव प्रभुके प्रकाश हैं और वे जगत्की सृष्टिके उपादान और निमित्त कारण हैं॥ 75॥ अनुवाद—(श्रीबलरामजी ही विश्वरूप हुए हैं) इसलिये महाप्रभु उन्हें अपना बड़ा भाई कहते हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीबलरामजी अब श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु हुए हैं॥ 78॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'विश्वरूप'—परव्योममें स्थित महासङ्कर्षणके अवतार हैं॥ 75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—क्योंकि महासङ्कर्षण 'उपादान' और 'निमित्त' कारणरूपमें विश्वमें ओत-प्रोत होकर विराजमान हैं, इसलिये उनको महाप्रभुके 'बड़े भाई' कहकर कहा जाता है। परन्तु श्रीकृष्णलोकमें जो श्रीकृष्ण और श्रीबलराम हैं, वे ही श्रीचैतन्य-निताइ हैं। इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभु—मूल सङ्कर्षण अर्थात् श्रीबलदेव प्रभु हैं॥ 78॥ ताँहा बइ विश्वे किछु नाहि देखि आर। अतएव 'विश्वरूप' नाम ये ताँहार॥ 76॥ अनुवाद—यह समस्त विश्व उनका ही रूप है और उनके अतिरिक्त जगत्में कुछ भी नहीं दिखायी देता है, इसलिये उनका नाम 'विश्वरूप' है॥ 76॥ श्रीमद्भागवत (10/15/35)— नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्वरे। ओतं प्रोतमिदं यस्मिन् तन्तुष्वङ्ग यथा पटः॥ 77॥ पुत्र-प्राप्तिसे मिश्र-शचीको आनन्द :— पुत्र पाञा दम्पति हैला आनन्दित मन। विशेषे सेवन करे गोविन्दचरण॥ 79॥ तेरहवाँ अध्याय | 159

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