भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 696

[ 13/79-86 अनुवाद—पुत्रको प्राप्त करके दोनों पति-पत्नीका मन आनन्दित हो गया और वे श्रीगोविन्दके चरणोंकी विशेषभावसे सेवा करने लगे॥79॥ प्रकट होनेसे तेरह मास पूर्व श्रीकृष्णका शचीदेवीके गर्भमें प्रवेश :— चौद्दशत छय शके शेष माघ मासे। जगन्नाथ-शचीर देहे कृष्णेर प्रवेशे॥80॥ अनुवाद—शकाब्द चौदह सौ छहके माघ मासके अन्तमें श्रीकृष्णने जगन्नाथ मिश्र और शचीदेवीके शरीरमें प्रवेश किया॥80॥ शचीकी आलौकिक अवस्थाको देखकर मिश्रका विस्मित होना :— मिश्र कहे शचीस्थाने,—"देखि अन्य रीत। ज्योतिर्मय देह, गेह लक्ष्मी-अधिष्ठित॥81॥ याँहा ताँहा सर्वलोक करये सम्मान। घरे पाठाइया देय धन, वस्त्र, धान॥"82॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने शचीदेवीसे कहा—"मैं आश्चर्य देख रहा हूँ। तुम्हारी देहसे ज्योति निकल रही है और ऐसा लगता है कि घरमें लक्ष्मीदेवी निवास कर रही हैं। मैं जहाँ भी जाता हूँ, लोग मेरा सम्मान करते हैं और बिना कहे ही वे हमारे घर धन, वस्त्र, धानादि भिजवा देते हैं॥"81-82॥ देवताओंको स्तुति करते हुए देखकर शचीका विस्मित होना :— शची कहे,—"मुञि देखों आकाश-उपरे। दिव्यमूर्त्ति लोक आसि' स्तुति येन करे॥"83॥ अनुवाद—शचीमाताने कहा—"मैं भी देखती हूँ कि ऊपर आकाशमें दिव्य शरीरवाले लोग आकर मानों स्तुति कर रहे हों॥"83॥ श्रीकृष्णका पहले मिश्रके हृदयमें प्रवेश, बादमें शचीके हृदयमें प्रवेश :— जगन्नाथ मिश्र कहे,—"स्वप्न ये देखिल। ज्योतिर्मय-धाम मोर हृदये पशिल॥84॥ किसी महापुरुषके आविर्भावकी सम्भावना :— आमार हृदय हैते गेला तोमार हृदये। हेन बुझि, जन्मिबेन कोन महाशये॥"85॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा—"मैंने स्वप्नमें देखा कि एक ज्योतिर्मय-धाम मेरे हृदयमें प्रवेश कर गया और वह मेरे हृदयसे तुम्हारे हृदयमें चला गया। मैं समझता हूँ कि तुम्हारे गर्भसे किसी महापुरुषका जन्म होगा॥"84-85॥ दोनोंके द्वारा विशेष रूपसे नारायण-सेवा :— एत बलि' दुँहे रहे हरषित हञा। शालग्राम सेवा करे विशेष करिया॥86॥ अनुवाद—यह कहकर वे दोनों बड़े आनन्दसे रहने लगे और शालग्रामकी सेवा विशेष मनोयोगसे करने लगे॥86॥ अनुभाष्य—सिद्धान्त यह है कि श्रीजगन्नाथ और श्रीशची नित्यसिद्ध परिकर हैं, इस कारण उनका हृदय और शरीर शुद्धसत्त्वमय है, वह साधारण प्राकृत जीवकी भाँति पञ्च-भौतिक नहीं है। विशुद्धसत्त्वका नाम 'वसुदेव' है; वसुदेवमें ही चिद्विलासी वासुदेव प्रकट होते हैं (भा: 4/3/23 श्लोकके गौड़ीय भाष्यके अन्तर्गत 'विवृति' द्रष्टव्य है)। जड़ेन्द्रियोंके भोगके लिये प्राकृत रक्त-मांसके शरीरवाले स्त्री-पुरुषकी कामक्रीड़ा एवं गर्भधारणकी भाँति श्रीजगन्नाथ और श्रीशचीदेवीका मिलन तथा गर्भ-सञ्चार नहीं हुआ; इसलिये मनमें भी इस प्रकार चिन्तन करना अपराध है। भगवत् सेवोन्मुख चित्तमें विचार करनेसे शुद्ध-सत्त्वमयी श्रीशचीदेवीकी अप्राकृत-गर्भ-महिमा हृदयङ्गम होगी। भा: 10/2/16 श्लोक— 160 | श्रीचैतन्यचरितामृत