भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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“भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः। आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥” इस श्लोककी श्रीधरस्वामीकी टीका— 'मन आविवेश' मनस्याविर्बभूव—जीवानामिव न धातुसम्बन्ध इत्यर्थः। “श्रीभगवान्ने श्रीवसुदेवजीके मनमें प्रवेश किया। जीवोंका जन्म ग्रहण पिता-माताके शुक्र-शोणितके सम्पर्कसे होता है, परन्तु भगवान्का स्वरूप सच्चिदानन्दघन है, उन्हें ऐसे पञ्चभौतिक देहकी कोई आवश्यकता नहीं होती।” इस प्रसङ्गमें भाः 10/2/18-19 श्लोक भी द्रष्टव्य हैं। इस सम्बन्धमें श्रील रूपगोस्वामीके रचित लघुभागवतामृतमें 160-165 श्लोकका मर्मानुवाद— भाः 10/2/16 श्लोकमें वर्णित प्रकटलीला आविर्भावके प्रसङ्गमें 'आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः'—इस वचनके अनुसार श्रीकृष्ण पहले आनक-दुन्दुभि (वसुदेव महाराज) के हृदयमें प्रकट हुए। तत्पश्चात् आनकदुन्दुभिके हृदयसे देवकीके हृदयमें प्रकट हुये। देवकीके वात्सल्यरूप प्रेमानन्दमृतके द्वारा पालित होकर श्रीकृष्णने उन देवकीके हृदयमें चन्द्रकी भाँति उत्तरोत्तर अपनी वृद्धिका प्रदर्शन किया। तदनन्तर देवकीके हृदयसे निकलकर श्रीकृष्ण कंसके कारागारमें स्थित सूतिकाघरमें देवकीकी शय्यापर आविर्भूत हुए। योगमायाके प्रभावसे देवकीने यही अनुभव किया कि लौकिक रीतिके अनुसार ही शिशुने परमसुखसे जन्म ग्रहण किया है (भक्त और भगवान्की नरलीला-अनुरूप सम्बन्धके अनुसार परस्पर जो अप्राकृत भावसमूह उदित होते हैं, वे परम श्रेष्ठ हैं। ये सभी भाव प्रकाशित होकर परम चमत्कारमय चिद्-लीला विलासमें सहायक होते हैं, भक्त और भगवान् दोनों ही इसका आस्वादन करते हैं। किन्तु दूसरी ओर ये मायासे मुग्ध महाविद्वान व्यक्तियोंको भी विमोहितकर भ्रमित कर देते हैं। इन्हीं परम आस्वादनीय अप्राकृत भाव वैचित्रीके कारण परव्योम-वैकुण्ठसे भी मथुरा धामकी श्रेष्ठता प्रमाणित होती है।)। श्रीकृष्ण नित्यकाल नित्य यशोदाके नित्यपुत्रके रूपमें विराजमान होकर अनन्त अप्रकट-लीलाओंमें भी इसी प्रकार विलास कर रहे हैं। प्रियतम भक्तोंके लिये आनन्ददायक और स्वयंके लिये भी चमत्कारिक इस प्रकारकी लीलाओंके उल्लासके द्वारा लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण नित्यकाल व्रजमें विलास करते हैं। अप्राकृत नन्द-यशोदाके अप्राकृत असमोर्द्ध-वात्सल्यके वशमें भगवान् नित्य ही स्वयंको उनके नित्य पुत्रके रूपमें जानते हैं। श्रीभागवत (10/5/1) में—“पुत्रके उत्पन्न होनेपर महात्मा श्रीनन्द अत्यन्त आनन्दित हुए।” श्रीभागवत (10/6/43) में— “उदार हृदय श्रीनन्दने विदेश (मथुरा) से लौटकर निजपुत्र श्रीकृष्णको गोदमें उठाकर उसका मस्तक सूँघकर परम आनन्दको प्राप्त किया।” फिर (10/9/21) में—“ये भगवान् गोपिका-सुत (श्रीकृष्ण) भक्तोंके लिये जिस प्रकार सुलभ हैं, देहात्मवादी, तपस्वी अथवा आत्मदर्शी ज्ञानियोंके लिये कभी भी उस प्रकार सुलभ नहीं है।” श्रीपाद बलदेव विद्याभूषण— “तदिदमानकदुन्दुभेर्हृदयस्थेन स्वयंभगवता रूपेण कृष्णेण सहैक्यं प्राप्य देवकीहृदि प्राकट्यं गच्छेत्—ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं समाहितं ('सम्यग्भूतमेवाहितं वैधदीक्षया अर्पितम्' इति स्वामिचरणाः)। शूरसुतेन देवी ('शुद्धसत्त्वेत्यर्थः' इति स्वामिचरणाः।) दधार सर्वात्मकमात्मभूतं काष्ठा यथानन्दकरं मनस्तः॥” (भाः 10/2/18) इति शुकोक्तेः। यद्यपि देवकीहृदीत्युक्तं, तथापि तद्गर्भस्थितिबोध्या, - 'दिष्ट्याम्ब, ते कुक्षिगतः परः पुमान्' (भाः 10/2/41) इति देवस्तोत्रात्। जन्मप्रकरणे—'देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः। अविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥' (भाः 10/3/8) इति”। “अनन्तर पूर्व दिशा जिस प्रकार चन्द्रके उदयको व्यक्त करती है, उसी प्रकार शुद्धसत्त्वमयी देवकीने शूरसुत वसुदेवके द्वारा कृष्णदीक्षा प्राप्तकर जगत्के मङ्गलस्वरूप सर्वात्मा और परमात्मा श्रीअच्युतको हृदयमें धारण किया, -श्रीमद्भागवतके इस वाक्यसे जाना जाता है कि श्रीआनकदुन्दुभिके (वसुदेवके) हृदयसे स्वयं भगवान् देवकीके हृदयमें प्रकट हुए। इस स्थानपर यद्यपि 'देवकीके हृदयमें' कहा गया है, तथापि इसके

तेरहवाँ अध्याय | 161