श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 698, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/86-90 [बायाँ स्तम्भ] द्वारा 'देवकीके गर्भमें स्थित' ही समझना चाहिये। क्योंकि श्रीमद्भागवतमें “हे माता! आपके गर्भमें परम पुरुष अधिष्ठित हैं”—यह देवस्तुति देखी जाती है। भगवान्के जन्म-प्रकरणमें भी—“पूर्णचन्द्र जिस प्रकार पूर्वदिशामें उदित होता है, उसी प्रकार सर्वगुहाशय (सर्वान्तर्यामी) विष्णु देवकीके हृदयसे आविर्भूत हुए”—यह भागवत-वाक्य विशेषरूपसे द्रष्टव्य है। यहाँ (79 पयार में) “विशेषे सेवन करे गोविन्द चरण” इस वाक्यसे श्रीजगन्नाथ मिश्र और शचीमाताके नित्य श्रीगोविन्दचरणसेवा-निमग्न हृदयमें ही श्रीगौरसुन्दर आविर्भूत हुए, ऐसा जानना चाहिये॥86॥ तेरह मासमें भी अवतरित होनेकी असम्भावना :- हैते हैते हैल गर्भ त्रयोदश मास। तथापि भूमिष्ठ নহে,—मिश्रेर हैल त्रास ॥ 87 ॥ नीलाम्बर चक्रवर्तीकी गणना :- नीलाम्बर चक्रवर्त्ती कहिल गणिया। एइ मासे पुत्र हबे शुभक्षण पाञा ॥ 88 ॥ महाप्रभुका अवतरण :- चौद्दशत सात शके मास ये फाल्गुन। पौर्णमासीर सन्ध्याकाले हैले शुभक्षण ॥ 89 ॥ सिंह-राशि, सिंह-लग्न, उच्च ग्रहगण। षड्वर्ग, अष्टवर्ग, सर्व सुलक्षण ॥ 90 ॥ अनुवाद—इस प्रकार होते-होते तेरह मासका गर्भ हो गया, परन्तु सन्तानका जन्म नहीं हुआ, इसलिये जगन्नाथ मिश्रको बहुत भय लगने लगा। तब नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने ज्योतिष गणना करके बतलाया कि इस मासमें शुभ क्षणमें एक पुत्रका जन्म होगा। वह शुभ क्षण शकाब्द चौदह सौ सातमें फाल्गुन मासकी पूर्णिमाकी सन्ध्याके समय आया। उस समय सिंह-राशि और सिंह-लग्न होनेके कारण षड्वर्ग और अष्टवर्गके प्रभावमें ग्रह उच्च अवस्थामें थे, इसलिये वह क्षण सभी सुलक्षणोंसे युक्त था॥87-90॥ [दायाँ स्तम्भ] अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुकी जन्मपत्री इस प्रकार है— शक 1407/10/22/28/48 दिनं 7 11 8 15 54 38 40 37 40 13 6 23 महाप्रभुके जन्मकालमें—मेषमें शुक्र अश्विनी-नक्षत्रमें, सिंहमें केतु उत्तरफाल्गुनी-नक्षत्रमें और चन्द्र पूर्वफाल्गुनी-नक्षत्रमें, वृश्चिकमें शनि ज्येष्ठा-नक्षत्रमें, धनुमें बृहस्पति पूर्वाषाढ़ा-नक्षत्रमें, मकरमें मङ्गल श्रवणा-नक्षत्रमें, कुम्भमें रवि पूर्वभाद्रपदमें और राहु पूर्वभाद्रपद-नक्षत्रमें तथा मीनमें बुध उत्तरभाद्रपद-नक्षत्रमें मेष-लग्न। नवमाधिपति मङ्गल उच्च, शुक्र और शनि उच्चप्राय, बृहस्पति अपने गृहमें धर्मस्थानपर शुक्रपर दृष्टिपात करते हुए; दशमाधिपति गुरु-दृष्ट शुक्र नवम गृहमें॥89॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकके अन्तमें— “शाके चतुर्दशशत रविवाजियुक्ते गौरो हरिर्धरणीमण्डल आविरासीत्।” अनेक घटनाओं और निर्दिष्ट कालके साथ इस शकाब्दमें श्रीमहाप्रभुके उदय-कालका सामञ्जस्य नहीं होता, ऐसा कहकर किसी-किसीके मतानुसार 1426 अथवा अन्य शकाब्द ही शुद्ध होगा, वे ऐसा मानते हैं॥89॥ षड्वर्ग—क्षेत्र, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांश और त्रिंशांश, इन छहको 'षड्वर्ग' कहते हैं। लग्नके स्पष्ट अंशके अनुसारसे कथित षड्वर्गके अधिपतिका विचार करके सुलक्षण स्थिर किया। अष्टवर्ग—'बृहज्जातकादि' ग्रन्थोंमें कथित ग्रहके तात्कालिक स्थानसे निर्दिष्ट रेखापात करके अष्टवर्ग गिने जाते हैं। इससे फल-योजनाके द्वारा होराशास्त्रविद्गण 162 | श्रीचैतन्यचरितामृत