श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 699, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें13/90-99 ] शुभाशुभ-निर्णयकी व्यवस्था करते हैं। इस गणनासे भी नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने महाप्रभुके सुलक्षण दर्शन किये॥ 90 ॥ चन्द्रमाको तिरस्कार करते हुए ही जैसे श्रीगौरचन्द्रका उदय :- अ-कलङ्क गौरचन्द्र दिला दरशन। स-कलङ्क चन्द्रे आर कोन् प्रयोजन ॥ 91 ॥ चन्द्रग्रहण और उसके उपलक्ष्यमें जीवोंका हरिनाम्-ग्रहण :- एत जानि' चन्द्रे राहु करिला ग्रहण। 'कृष्ण' 'कृष्ण' 'हरि' नामे भासे त्रिभुवन ॥ 92 ॥ जय जय ध्वनि हैल सकल भुवन। चमत्कार हैया लोक भावे मने मन ॥ 93 ॥ जीवोंके हरिनाम ग्रहणकालमें महाप्रभुका अवतार :- जगत् भरिया लोक बोले—'हरि' 'हरि'। सेइक्षणे गौरकृष्ण भूमे अवतरि ॥ 94 ॥ अनुवाद—जब निष्कलङ्क श्रीगौरचन्द्र प्रकट होकर दर्शन दे रहे हैं, तब कलङ्कयुक्त चन्द्रमासे क्या प्रयोजन ? यह जानकर राहुने चन्द्रमाको ग्रास कर लिया। उस समय 'कृष्ण-कृष्ण' और 'हरि-हरि' नामसे तीनों लोक परिपूर्ण हो गये। सभी लोकोंमें जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी और लोग मन-ही-मन चमत्कारका अनुभव करने लगे। जिस समय सारे जगत्के लोग 'हरि-हरि' बोल रहे थे, उसी क्षण श्रीगौरकृष्ण पृथ्वीपर अवतरित हुए॥ 91-94 ॥ उस समय यवनोंके द्वारा भी उपहासके छलसे हरिनाम-ग्रहण :- प्रसन्न हइल सब जगतेर मन। 'हरि' बलि' हिन्दुके हास्य करये यवन ॥ 95 ॥ स्वर्गमें देवताओंको आनन्द :- 'हरि' बलि' नारीगण देइ हुलाहुलि। स्वर्ग वाद्य-नृत्य करे देव कुतूहली ॥ 96 ॥ सर्वत्र आनन्दकी लहर :- प्रसन्न हैल दशदिक्, प्रसन्न नदीजल। स्थावर-जङ्गम हैल आनन्दे विह्वल ॥ 97 ॥ अनुवाद—समस्त जगतवासियोंका मन तब प्रसन्न हो गया और यहाँ तक यवन लोग भी 'हरि-हरि' बोलकर हिन्दुओंसे उपहास करने लगे। 'हरि-हरि' बोलकर महिलाएँ 'हुलाहुलि' ध्वनि करने लगीं। स्वर्गके देवता भी आनन्दसे वाद्य बजाते हुए नृत्य करने लगे। दसों दिशाएँ प्रफुल्लित हो गयीं, आनन्दसे नदियोंके जलमें उत्ताल तरङ्गों उठने लगीं। सभी चल-अचल प्राणी आनन्दमें विह्वल हो गये॥ 95-97 ॥ अमृतानुकणिका—शास्त्रोंमें तन्त्री, ताल, झाँझ, नगाड़ा और तुरही—इन पाँच प्रकारके बाजोंके शब्द एवं वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शङ्खध्वनि और हुलूध्वनि (हुलाहुलि)—इन पाँच प्रकारकी ध्वनियोंको मङ्गलमय कहा है॥ 95-97 ॥ महाप्रभुकी जन्मलीला-सूत्ररूपमें; हरिनाम-कीर्त्तनके मध्य श्रीगौरहरिका आविर्भाव :- नदीया-उदयगिरि, पूर्णचन्द्र गौरहरि, कृपा करि' हइल उदय। पाप-तमो हैल नाश, त्रिजगतेर उल्लास, जगभरि' हरिध्वनि हय ॥ 98 ॥ अनुवाद—नदियाके उदयाचलपर पूर्णचन्द्र श्रीगौरहरि कृपापूर्वक उदय हुए। उनके उदय होनेसे पापरूपी अन्धकारका नाश हो गया, तीनों लोकोंमें उल्लास छा गया और सर्वत्र हरिध्वनि होने लगी ॥ 98 ॥ श्रीअद्वैतप्रभुका आनन्दित होकर नृत्य करना :- सेइकाले निजालय, उठिया अद्वैत राय, नृत्य करे आनन्दित मने। हरिदासे लञा सङ्गे, हुङ्कार-कीर्त्तन-रङ्गे, केने नाचे, केह नाहि जाने ॥ 99 ॥ तेरहवाँ अध्याय | 163