भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 700

[ 13/99-103 [बायाँ स्तम्भ] अनुवाद—उस समय अपने घरमें श्रीअद्वैताचार्य उठकर आनन्दपूर्वक नृत्य करने लगे और वे अपने साथ हरिदास ठाकुरको लेकर आनन्दसे हुङ्कार और कीर्तन करने लगे, परन्तु कोई नहीं जानता था कि वे क्यों नृत्य कर रहे हैं॥ 99 ॥ अनुभाष्य—'निजालय'—शान्तिपुरके घरमें। महाप्रभुके जन्मवाले दिन हरिदास ठाकुर शान्तिपुरमें थे॥ 99 ॥ चन्द्रग्रहणमें लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :— देखि' उपराग हासि', शीघ्र गङ्गाघाटे आसि', आनन्दे करिल गङ्गास्नान। पाञा उपराग-छले, आपनार मनोबले, ब्राह्मणेरे दिल नाना दान ॥ 100 ॥ अनुवाद—चन्द्रग्रहण आरम्भ होते देखकर अथवा चन्द्रग्रहण देखकर हँसकर श्रीअद्वैत आचार्यने हरिदास ठाकुरके साथ शीघ्र ही गङ्गाघाटपर आकर आनन्दसे स्नान किया। चन्द्रग्रहणके बहाने मनमें आनन्द होनेसे ब्राह्मणोंको अनेक वस्तुएँ दान कीं॥ 100 ॥ अनुभाष्य—'उपराग'—ग्रहण। 'मनोबले'—मनके उत्साहसे अथवा मनके द्वारा ब्राह्मणोंको दान किया था। (भाः 10/3/11)— “स विस्मयोत्फुल्लविलोचनो हरिं सुतं विलोक्यानकदुन्दुभिस्तदा। कृष्णावतारोत्सवसम्भ्रमोऽस्पृशन् मुदा द्विजेभ्योऽयुतमाप्लुतो गवाम्॥” “भगवान् श्रीहरिको पुत्रके रूपमें दर्शन करके वसुदेवजीने कृष्णजन्मोत्सवके कारण आनन्दित होकर कारागारमें मन-ही-मन दस हजार गैयाँ ब्राह्मणोंको दान कीं॥” 100 ॥ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा हरिदासको महाप्रभुके शुभाविर्भावका इङ्गित :— जगत् आनन्दमय, देखि' मने सविस्मय, ठारे-ठोरे कहे हरिदास। “तोमार ऐछन रङ्ग, मोर मन परसन्न, देखि—किछु कार्ये आछे भास॥” 101 ॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—सारे जगत्‌को आनन्दमय देखकर हरिदास ठाकुर आश्चर्यचकित होकर श्रीअद्वैत आचार्यको इङ्गित करके कहने लगे कि आप इतने आनन्दमें हैं और मेरा मन भी अति प्रसन्न है, तो ऐसा लगता है कि कोई विशेष कार्य प्रकाशित होनेवाला है॥ 101 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'देखि किछु कार्ये आछे भास'—ऐसा प्रतीत होता है कि किसी विशेष कार्यका प्रकाश हुआ है॥ 101 ॥ अनुभाष्य—'ठारे-ठोरे'—इङ्गित करके॥ 101 ॥ श्रीवासका आनन्दपूर्वक हरिनाम-कीर्तन :— आचार्यरत्न, श्रीनिवास, हैल मने सुखोल्लास, याइ' स्नान कैल गङ्गाजले। आनन्दे विह्वल मन, करे हरिसङ्कीर्त्तन, नाना दान कैल मनोबले ॥ 102 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीनिवास (श्रीवास) पण्डितके मनमें भी आनन्दके कारण अपूर्व उल्लास हुआ और उन्होंने जाकर गङ्गाजलमें स्नान किया। उनका मन आनन्दसे विह्वल हो रहा था और वे हरिसङ्कीर्तन करने लगे तथा उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारका दान दिया॥ 102 ॥ जगत्‌के सभी भक्तोंके हृदयमें आनन्द :— एइ मत भक्तयति, याँर येइ देशे स्थिति, ताहाँ ताहाँ पाञा मनोबले। नाचे, करे सङ्कीर्त्तन, आनन्दे विह्वल मन, दान करे ग्रहणेर छले ॥ 103 ॥ अनुवाद—इस प्रकार जिस-जिस स्थानपर जो भी भक्त थे, सभीका मन आनन्दसे विह्वल हो गया और वे भी कीर्तन करते हुए नृत्य करने लगे। मनमें आनन्द होनेके कारण चन्द्रग्रहणके छलसे अनेक दान करने लगे॥ 103 ॥ 164 | श्रीचैतन्यचरितामृत