भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 701

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स्वर्णकान्ति शिशुके दर्शनसे नर-नारी सभीको आनन्द :- ब्राह्मण-सज्जन-नारी, नाना द्रव्य पात्र भरि', आइला सबे यौतुक लइया। येन काँचा-सोना-द्युति, देखि' बालकेर मूर्त्ति, आशीर्वाद करे सुख पाञा॥ 104॥

अनुवाद- (शची माताके पुत्र हुआ है, यह समाचार पाकर) ब्राह्मणों और भक्तोंकी स्त्रियाँ नवजात-शिशुके दर्शनके लिये अनेक पात्रोंमें नाना प्रकारके उपहार और भेंट लेकर आयीं। शिशुकी नवीन स्वर्णके समान कान्ति देखकर परम आनन्दित होकर सभीने उसको आशीर्वाद दिया॥ 104॥

ब्राह्मणी-वेशमें देवियोंके द्वारा मर्त्यलोकमें आकर श्रीगौरदर्शन :- सावित्री, गौरी, सरस्वती, शची, रम्भा, अरुन्धती, आर यत देव-नारीगण। नाना द्रव्य पात्र भरि', ब्राह्मणीर वेश धरि', आसि' सबे करेन दरशन॥ 105॥

अनुवाद-सावित्री, गौरी, सरस्वती, शची, रम्भा, अरुन्धती और जितनी भी देवताओंकी स्त्रियाँ थी, वे सभी ब्राह्मणियोंका वेश धारण करके नाना प्रकारके माङ्गलिक द्रव्योंको पात्रोंमें भरकर नवजात शिशुके दर्शनके लिये आयीं॥ 105॥

अनुभाष्य- 'सावित्री'—ब्रह्माजीकी पत्नी; 'गौरी'— शिवजीकी पत्नी; 'सरस्वती'—श्रीनृसिंहकान्ता, जैसे श्रीधरस्वामीकी टीकामें कहा है- “वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि। यस्यास्ते हृदये सम्वित् तं नृसिंहमहं भजे॥” “मैं ऐसे नृसिंह भगवान्‌की वन्दना करता हूँ, जिनके मुखके भीतर वाणीकी स्वामिनी सरस्वती निवास करती हैं, जिनके वक्षस्थलपर लक्ष्मी वास करती हैं और हृदयमें चेतनाकी दैवीशक्ति निवास करती हैं।”

'शची'—इन्द्रकी पत्नी; 'रम्भा'—स्वर्गकी नर्तकी; 'अरुन्धती'—वशिष्ठ ऋषिकी पत्नी॥ 105॥

आकाशमें देवतादिका आनन्द, प्रणाम, स्तुति और नृत्य :- अन्तरीक्षे देवगण, सिद्ध, गन्धर्व, चारण, स्तुति-नृत्य करे वाद्य-गीत। नर्त्तक, वादक, भाट, नवद्वीपे यार नाट, सबे आसि' नाचे पाञा प्रीत॥ 106॥

अनुवाद-अन्तरिक्षमें देवता, सिद्ध, गन्धर्व और चारण वाद्य-गीतके द्वारा स्तुति करते हुए नृत्य करने लगे। नवद्वीपमें जितने नर्तक, वादक और भाट थे, सभी मिश्रभवनमें आकर प्रीतिपूर्वक आनन्दसे नृत्य करने लगे॥ 106॥

अनुभाष्य- 'सिद्ध'—मन्त्रसिद्धिसे प्राप्त-देवयोनि। 'गन्धर्व'—स्वर्गके गायक, ब्रह्माकी कान्तिसे उत्पन्न; गुह्यलोक इनका वासस्थान है। 'चारण'—'देवानां गायनास्ते च चारणाः स्तुतिपाठकाः।' ये देवयोनिमें विशेष जाति हैं, जो स्तुति-पाठ करते हैं॥ 106॥

केबा आसे केबा याय, केबा नाचे केबा गाय, सम्भाळिते नारे कार बोल। खण्डिलेक दुःख-शोक, प्रमोदपूरित लोक, मिश्र हैला आनन्दे विह्वल॥ 107॥

अनुवाद-कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन नाच रहा है, कौन गा रहा है, किसीको पता नहीं चल रहा था और कौन क्या बोल रहा है, किसीकी समझमें नहीं आ रहा था। सभी लोकोंके दुःख-शोकका नाश हो गया और सभी लोग प्रसन्नतासे पूरित हो गये। श्रीजगन्नाथ मिश्रके आनन्दकी कोई सीमा नहीं रही और वे आनन्दसे विह्वल हो गये॥ 107॥

अनुभाष्य- 'सम्भालिते'—समझनेमें। देव, नर, सिद्धादि

तेरहवाँ अध्याय | 165