श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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भिन्न-भिन्न श्रेणियोंमें स्थित हैं, इसलिये वे एक-दूसरेकी बात समझनेमें असमर्थ हैं।॥ 107 ॥ महाप्रभुका जातकर्म :- आचार्यरत्न, श्रीनिवास, जगन्नाथमिश्र-पाश, आसि' ताँरे करे सावधान। कराइल जातकर्म, ये आछिल विधि-धर्म, तबे मिश्र करे नाना दान॥ 108 ॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीनिवास पण्डितने श्रीजगन्नाथ मिश्रके पास आकर उन्हें सचेत किया और विधि-विधानके अनुसार जातकर्म संस्कार करवाये तथा तब श्रीजगन्नाथ मिश्रने अनेक वस्तुएँ दान की॥ 108 ॥ अनुभाष्य-'आचार्यरत्न'-चन्द्रशेखर; 'श्रीनिवास'-श्रीवास पण्डित ॥ 108 ॥ शुभकर्मके उपलक्ष्यमें मिश्रके द्वारा दान :- यौतुक पाइल यत, घरे वा आछिल कत, सब धन विप्रे दिल दान। यत नर्त्तक, गायन, भाट, अकिञ्चन जन, धन दिया कैल सबार मान॥ 109 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्रने जो कुछ भी भेंट और उपहारमें सामान आया था और जो कुछ उनके घरमें था, वह सब उन्होंने ब्राह्मणोंको दान किया। नर्तकों, गायकों, भाट और दरिद्र लोगोंको धन दानकर उनका यथायोग्य सम्मान किया॥ 109 ॥ मालिनी ठाकुरानी और महाप्रभुकी मौसीके द्वारा माङ्गलिक कार्य :- श्रीवासेर ब्राह्मणी, नाम ताँर 'मालिनी', आचार्यरत्नेर पत्नी-सङ्गे। सिन्दूर, हरिद्रा, तैल, खइ, कला, नाना फल, दिया पूजे नारीगण रङ्गे॥ 110 ॥ अनुवाद-श्रीवासजीकी पत्नीने जिनका नाम मालिनी था, श्रीचन्द्रशेखर आचार्यकी पत्नीके साथ मिलकर आनन्दसे सिन्दूर, हल्दी, तेल, चावल, केला और अनेक प्रकारके फलोंसे नवजात शिशुके दर्शनके लिये आनेवाली स्त्रियोंका (शचीमाताकी ओरसे) सम्मान किया॥ 110 ॥ सीता ठाकुरानीके कृत्य :- अद्वैत-आचार्य-भार्या, जगत्पूजिता आर्या, नाम ताँर 'सीताठाकुराणी'। आचार्येर आज्ञा पाञा, गेला उपहार लञा, देखिते बालक-शिरोमणि॥ 111 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यकी पत्नी जगत् पूज्यनीया 'सीताठाकुराणी' उनकी आज्ञा पाकर उपहार लेकर उस बालक-शिरोमणिके दर्शनके लिये शचीमाताके घर आयीं॥ 111 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके जन्मदिनके पश्चात् एक दिन श्रीअद्वैताचार्यकी अनुमति पाकर उनकी पत्नी सीतादेवी उपहार लेकर शान्तिपुरसे नवद्वीपमें शिशुदर्शनके लिये आयीं। यद्यपि उस समय नवद्वीपमें भी श्रीअद्वैतप्रभुका घर था, तथापि 'निजालय' का उल्लेख होनेसे उस समय वे शान्तिपुरमें ही थे, ऐसा प्रतीत होता है।॥ 111 ॥ शिशुरूपी महाप्रभुके अलङ्कार :- सुवर्णेर कड़ि-बाउलि, रजतमुद्रा-पांशुलि, सुवर्णेर अङ्गद, कङ्कण। दु-बाहुते दिव्य शङ्ख, रजतेर मलबङ्ग, स्वर्णमुद्रार नाना हारगण॥ 112 ॥ व्याघ्रनख हेमजड़ि, कटि-पट्टसूत्र-डोरी, हस्त-पदेर यत आभरण। चित्रवर्ण पट्टसाड़ी, बुनि फोतो पट्टपाड़ी, स्वर्ण-रौप्य-मुद्रा बहुधन॥ 113 ॥ माङ्गलिक अनुष्ठान :- दुर्वा, धान्य, गोरोचन, हरिद्रा, कुङ्कुम, चन्दन, मङ्गल-द्रव्य पात्र भरिया। वस्त्र-गुप्त दोला चड़ि', सङ्गे लञा दासी चेड़ी, वस्त्रालङ्कार पेटारि भरिया॥ 114 ॥
166 | श्रीचैतन्यचरितामृत