भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 703, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 703

13/112–116 ] भक्ष्य, भोज्य, उपहार, सङ्गे लइल बहु भार, शचीगृहे हैल उपनीत। देखिया बालक-ठाम, साक्षात् गोकुल-कान, वर्णमात्र देखि विपरीत॥115॥ अनुवाद—उन्होंने अपने साथ नवजात बालक और उसकी माताके लिये सोनेकी किङ्किणी, चाँदीकी नूपुर, सोनेके अङ्गद और कङ्कन, दोनों भुजाओंके लिये दिव्य शङ्खसे बने कङ्कन, चाँदीके पाँवके कड़े और सोनेकी मुद्राओंके अनेक प्रकारके हार, सोनेमें जड़े बाघके नख, कमरमें बाँधनेवाली गोटा और किनारेसे युक्त रेशमी डोरी, हाथों और पाँवोंके लिये आभूषण, चित्रकलासे युक्त रेशमी साड़ियाँ, शिशुके पहननेके लिये रेशमी वस्त्र, सोने एवं चाँदीकी मुद्रायें तथा बहुतसा धन उपहारके रूपमें एकत्रित किये और इन्हें एक पेटीमें रखा। उन्होंने एक पात्रमें दूर्वाघास, धान्य, गोरोचन, हल्दी, कुङ्कुम, चन्दनादि मङ्गल-द्रव्योंको भरा। तब वे कपड़ेसे ढकी पालकीमें बैठकर ये सब उपहार और खानेका बहुतसा सामान तथा अनेक दासियोंको साथमें लेकर शचीमाताके घर पहुँचीं। सीतादेवीने उस शिशुको देखकर विचार किया कि उसके शरीरका गठन तो साक्षात् गोकुलके कान्हाके समान है, परन्तु वर्णमात्र ही विपरीत है॥112-115॥ अनुभाष्य—'कड़ि-बउलि'—स्वर्णकी बनी हुई कटि-बन्ध (कमर-पेटी); 'पाशुलि'—चाँदीके पैरोंके विशेष आभूषण; 'सुवर्णेर अङ्गद, कङ्कण'—सोनेकी चूड़ियाँ, बालियाँ; 'दिव्य शङ्ख'—शङ्खसे बने कङ्कन; 'मलवङ्ग'—पाँवोंके वक्र-कड़े। 'व्याघ्रनख हेमजड़ि'—बाघके नख जड़े हुए सोनेके अलङ्कार; 'कटिपट्टसूत्रडोरि'—कटि (कमर) में बाँधनेवाला रंगीन धागा; 'चित्रवर्ण पट्टसाड़ी'—विचित्र रेशमी वस्त्र; 'बूनि फोटो पट्टपाड़ी'—बुना हुआ रेशमका शिशुके पहननेवाला जामा। 'गोरोचन'—गोमस्तकसे प्राप्त उज्ज्वल पीतद्रव्य; 'कुङ्कुम'—काश्मीर देशमें उत्पन्न होनेवाला एक विशेष गन्धद्रव्य। “काश्मीर-देशजे क्षेत्रे कुङ्कुमं यद्भवैत् हि तत्। सूक्ष्म-केशरमारक्तं पद्मगन्धि तदुत्तमम्॥ बाहीकदेशसञ्जातं कुङ्कुमं पाण्डुरं भवेत्। केतकीगन्धयुक्तं तन्मध्यमं सूक्ष्मकेशरम्॥ कुङ्कुमं पारसीकेयं मधुगन्धि तदीरितम्। ईषत् पाण्डुवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम्॥” “काश्मीर देशके खेतोंमें जो कुङ्कुम होता है, वह सूक्ष्म केशरवाला, लाल रङ्गका और पद्मकी गन्धवाला होता है—यह उत्तम कुङ्कुम है। बाहीक देशमें (भारत और पाकिस्तानमें पंजाब क्षेत्रमें) उत्पन्न होनेवाला कुङ्कुम सूक्ष्म केशरवाला, पीले रङ्गका और केतकीकी गन्धसे युक्त होता है—यह मध्यम कुङ्कुम है। पारसिक देशमें (वर्तमान ईरानमें) उत्पन्न होनेवाला कुङ्कुम स्थूल केशरवाला, शहदकी गन्धयुक्त और थोड़ा पीले रङ्गका होता है—यह कुङ्कुम अधम जातिका कहा गया है।” 'वस्त्रगुप्तदोला'—कपड़ेके द्वारा आवृत डोली; 'चेड़ी'—दासी। 'ठाम'—गठन; 'कान'—कानू अथवा कृष्ण; 'कृष्णेर वर्ण'—इन्द्रनील-घनश्याम; 'विश्वम्भरेर वर्ण'—उसके विपरीत गौरवर्ण॥112-115॥ शिशुकी स्वर्णकान्तियुक्त देहके दर्शनसे स्त्रियोंमें वात्सल्यकी उत्पत्ति :— सर्व अङ्ग—सुनिर्माण, सुवर्ण-प्रतिमा-भान, सर्व अङ्ग—सुलक्षणमय। बालकेर दिव्य ज्योति, देखि' पाइल बहु प्रीति, वात्सल्यते द्रविल हृदय॥116॥ अनुवाद—उन्होंने देखा कि उसके सभी अङ्गोंकी रचना अति सुन्दर और सभी सुलक्षणोंसे युक्त है तथा उसका शरीर स्वर्णके समान वर्णका है। उस शिशुकी दिव्य ज्योतिको देखकर उन्हें बहुत आनन्द हुआ और वात्सल्य-भावसे उनका हृदय द्रवित हो गया॥116॥ अनुभाष्य—'सुनिर्माण'—सुन्दर रूपसे अङ्ग-प्रत्यङ्गका गठन; 'भान'—भ्रम॥116॥ तेरहवाँ अध्याय | 167

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