श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 704, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/117-119 शिशुको आशीर्वाद और रक्षाकवच-बन्धन :- दुर्वा, धान्य, दिल शीर्षे, कैल बहु आशिषे, चिरजीवि हओ दुइ भाइ। डाकिनी-शाँखिनी हैते, शङ्का उपजिल चिते, डरे नाम थुइल 'निमाइ' ॥117॥ अनुवाद—उन्होंने शिशुके शीषपर दुर्वा, धान्यादि मङ्गल पदार्थोंको रखकर अनेक आशीर्वाद देकर उन दोनों भाइयों (श्रीविश्वरूप और महाप्रभु) की दीर्घ आयुकी कामना की। तब शिशुके सुन्दर रूपको देखकर उनके मनमें डाकिनी-शाँखिनीके द्वारा शिशुके अमङ्गलकी शङ्का उनके हृदयमें हुई, इसलिये उस भयके कारण उन्होंने बालकका नाम 'निमाई' रखा॥117॥ अनुभाष्य—'दुई भाई'—विश्वरूप और विश्वम्भर। 'डाकिनी-शाँखिनी'—पार्वती-महेशके सहवर्त्तिनी (अनुगामिनी) स्त्री-योनिवाली अशुभ-कारिणी विशेष प्रेतयोनि हैं। ये सब अपदेवता पवित्र नीमवृक्ष और नीमवृक्षके आस-पासके स्थानपर जानेमें असमर्थ हैं॥117॥ शची-मिश्रके द्वारा पूजा :- पुत्रमाता-स्नानदिने, दिल वस्त्र विभूषणे, पुत्रसह मिश्रेर सम्मनि' । शची-मिश्रेर पूजा लञा, मनेते हरिष हञा, घरे आइला सीता ठाकुराणी ॥118॥ अनुवाद—पुत्र निमाइ और माता शचीदेवीके स्नानके दिन श्रीसीता ठाकुराणीने निमाइ और श्रीजगन्नाथ मिश्रको वस्त्र और आभूषण देकर उनका सम्मान किया। तब वे शचीदेवी और श्रीजगन्नाथ मिश्रके द्वारा पूजित (सम्मानित) होकर मन-ही-मन हर्षित होती हुई अपने घर शान्तिपुर लौट आयीं ॥118॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पुत्रमाता स्नान दिने'—अर्थात् पाँचवें दिन 'पाँचट' और नवें दिन 'नत्ता' दिवसमें ॥118॥ अनुभाष्य—'पुत्रमाता-स्नान दिने' अर्थात् बाहर आनेवाले दिनमें। प्राचीनकालमें बङ्गालमें ब्राह्मणादि वर्ण जननाशौचका समय (सन्तान उत्पन्न होनेके बाद जितने समय माताको सूतिका गृहमैं ही रहना पड़ता था) चार मास स्वीकार करते थे और उसके बाद ही वह सूर्यदेवका दर्शन करती थी। बादमें चार मासके बदले विप्रादि द्विजवर्णमें इक्कीस दिन [महाप्रभुके जन्मके समय यह काल एक मासका था] जननाशौच स्वीकार करनेकी व्यवस्था है; परन्तु शूद्रादिके लिये एक मासकी व्यवस्था है। कर्त्ताभजा और सतीमा-दलमें 'हरिनुटमें' (सङ्कीर्तनमें कुछ मिठाई फेंककर) तत्काल ही शिशुकी माताकी सूतिका गृहसे बाहर निकलनेकी प्रथा देखी जाती थी। 'शची-मिश्रेर पूजा लञा'—बङ्गालमें सामाजिक-व्यवहारमें वर्तमान कालमें भी यह विदायीके समयकी रीत दिखायी देती है। निज-परिवारिकजनके घर आनेपर उनकी विदायीके समय गृहस्थ उनको वस्त्रादि देकर सम्मान किया करते हैं। श्रीजगन्नाथ मिश्र एवं श्रीशचीदेवीके द्वारा इस प्रकार सम्मान पाकर सीताठाकुराणी शान्तिपुर लौट आयीं ॥118॥ शची और मिश्रको पुत्र-प्राप्तिसे आनन्द :- ऐछे शची-जगन्नाथ, पुत्र पाञा लक्ष्मीनाथ, पूर्ण हइल सकल वाञ्छित। धन-धान्य भरे घर, लोकमान्य कलेवर, दिने दिने हय आनन्दित ॥119॥ अनुवाद—इस प्रकार साक्षात् श्रीलक्ष्मीनाथ (सर्वलक्ष्मीमयी श्रीमती राधिकाके नाथ व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण) को पुत्रके रूपमें पाकर शचीदेवी और श्रीजगन्नाथकी समस्त कामनायें पूर्ण हो गयीं। उस दिनसे उनका घर सदा धन-धान्यसे भरा रहता था। पुत्र निमाइके दिव्य शरीरको देखकर उनका आनन्द दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया ॥119॥ अनुभाष्य—'लोकमान्य-कलेवर'—श्रीमहाप्रभुके श्रीअङ्ग लोकमान्य होनेके कारण अर्थात् उनके सौन्दर्य, ऐश्वर्य और लावण्य-दर्शनसे आकृष्ट होकर देव, नर तथा 168 | श्रीचैतन्यचरितामृत