श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 705, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें13/119-123 ] अन्यान्य लोगोंको सम्मान देते हुए देखकर पिता-माताको आनन्द प्राप्त हुआ। ॥ 119 ॥ मिश्र-शान्त, संयत और उदार वैष्णव :- मिश्र-वैष्णव, शान्त, अलम्पट, शुद्ध, दान्त, धनभोगे नाहि अभिमान। पुत्रेर प्रभावे यत, धन आसि' मिले तत, विष्णुप्रीते द्विजे देन दान ॥ 120 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथ मिश्र परम वैष्णव थे। वे शान्त, सदाचारी, शुद्ध और संयमी थे। उनमें धन भोगनेकी कोई इच्छा नहीं थी। पुत्रके प्रभावसे जितना भी धन आता, उसे वे विष्णुकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणोंको दान कर देते थे ॥ 120 ॥ अनुभाष्य-जगत्के विषयी लोग जिस प्रकारसे स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें आकर धनादिके भोगके अभिमानमें व्यस्त रहते हैं, शुद्धभक्त श्रीजगन्नाथ मिश्र वैसे नहीं थे। पुत्रके प्रभावसे उन्हें जो कुछ भी प्राप्त हो रहा था, उसे उन्होंने अपने भोगके लिये स्वीकार नहीं किया, अपितु सब कुछ भगवान्को अर्पणकर ब्राह्मणादि योग्यपात्रोंको उसका अवशेष प्रदान किया ॥ 120 ॥ चक्रवर्त्ती द्वारा महाप्रभुकी कुण्डली-गणना :- लग्न गणि' हर्षमति, नीलाम्बर चक्रवर्त्ती, गुप्ते किछु कहिल मिश्रेरे। महापुरुषेर चिह्न, लग्ने अङ्गे भिन्न भिन्न, देखि, —एइ तारिबे संसारे ॥ 121 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके जन्मके लग्नकी गणना करके नीलाम्बर चक्रवर्त्तीने हर्षित मनसे एकान्तमें श्रीजगन्नाथ मिश्रसे कहा कि मैंने इस बालकके जन्मके मुहूर्तमें और इसके अङ्गोंमें महापुरुषोंके भिन्न-भिन्न लक्षण देखे हैं और यह समस्त जगत्का उद्धार करेगा ॥ 121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'लग्ने अङ्गे भिन्न भिन्न'-(सामुद्रिक मतमें) 'लग्ने' अर्थात् जातक-कुण्डलीमें (जिससे नवजात शिशुका शुभ-अशुभ फल कहा जाता है, फलित ज्योतिषके उस अङ्गमें) और 'अङ्गे' अर्थात् शरीरमें ॥ 121 ॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये त्रयोदश परिच्छेद। तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य - 'गुप्ते' - अप्रकाशित ॥ 121 ॥ जन्मवृत्तान्त-श्रवण-माहात्म्य :- ऐछे प्रभु शची-घरे, कृपाय कैल अवतारे, येइ इहा करेय श्रवण। गौरप्रभु दयामय, ताँरे हुयेन सदय, सेइ पाय ताँहार चरण ॥ 122 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कृपापूर्वक शचीमाताके घरमें अवतीर्ण हुए। महाप्रभु परम दयालु हैं और जो भी उनके जन्मकी लीलाका श्रवण करता है, उसके प्रति वे दया करके उसे अपने चरणोंका आश्रय प्रदान करते हैं ॥ 122 ॥ श्रीगौर-विरोधी विषयी लोगोंका दुर्भाग्य :- पाइया मानुष जन्म, ये ना सुने गौरगुण, हेन जन्म तार व्यर्थ हैल। पाइया अमृतधुनी, पिये विषगर्त्त-पानि, जन्मिया से केने नाहि मैल ॥ 123 ॥ अनुवाद-मनुष्य जन्म पाकर भी जो श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके गुणोंका श्रवण नहीं करता है, उसका जन्म व्यर्थ ही जाता है। जो (श्रीगौरसुन्दरके गुण कीर्तनरूपी) अमृत-नदीको छोड़कर (इन्द्रिय-विषयभोगरूपी) विषसे भरे गढ्ढेका जल पीता है, वह जन्म लेते ही क्यों नहीं मर गया ? ॥ 123 ॥ अनुभाष्य - 'अमृतधुनी' अर्थात् सुधा-नदी। श्रीकृष्णभक्तिरूप सुधा-स्रोतका जलपान त्याग करके जो व्यक्ति विषय-कूपका (आत्माके लिये विषकर) जल पीता है, वह नितान्त मूढ़ है और उसका जीवन धारण करना उचित नहीं है। तेरहवाँ अध्याय | 169