भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती-कृत चैतन्य-चन्द्रामृतमें- “अचैतन्यमिदं विश्वं यदि चैतन्यमीश्वरम्। न भजेत् सर्वतो मृत्युरुपास्यममरोत्तमैः ॥ 95 ॥ अचैतन्यमिदं विश्वं यदि चैतन्यमीश्वरम्। न विदुः सर्वशास्त्रज्ञा ह्यपि भ्राम्यन्ति ते जनाः ॥ 37 ॥ प्रसारित-महाप्रेम-पीयूषरस-सागरे। चैतन्यचन्द्रे प्रकटे यो दीनो दीन एव सः ॥ 36 ॥ अवतीर्णो गौरचन्द्रे विस्तीर्णे प्रेमसागरे। सुप्रकाशित-रत्नौघे यो दीनो दीन एव सः ॥ 34 ॥” “यह श्रीकृष्णभक्तिहीन बहिर्मुख जगत् (अर्थात् बहिर्मुख व्यक्ति) यदि शिव-ब्रह्मादि उत्तम देवताओंके उपास्य सर्वनियन्ता स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचैतन्यका भजन नहीं करता, तो वह जन्म-मरणके वशीभूत होकर सुख-दुःखादि कर्मफल ही भोग करता है। जो श्रीचैतन्य महाप्रभुको 'स्वयं भगवान्' के रूपमें स्वीकार नहीं करते, वे सब शास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी इस अचित्-जगत्में अर्थात् हरिविमुखताके राज्यमें ही भ्रमण करते हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रके द्वारा उदित होकर महाभावामृत-रससागरका वर्धन करनेपर भी जो व्यक्ति 'दीन' अर्थात् प्रेमामृतपानसे वञ्चित है, वह यथार्थमें ही 'दीन' अर्थात् परम दुर्भागा है। अनन्त प्रेमसिन्धुसे श्रीगौरचन्द्रने समुदित होकर श्रवण कीर्तनादि नवविध-भक्तिरत्नराशिको सुप्रकाशित किया है; इस प्रकार सुयोग प्राप्त करके भी जो व्यक्ति दरिद्र ही रह गया अर्थात् जिसने भक्ति-रत्नोंकी उपलब्धि नहीं की, वह निश्चय ही परम दुर्भागा है, इसमें सन्देह नहीं है।” (भाः 2/3/19,20,23)- “श्वविड्वराहोष्ट्र न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः ॥ 19 ॥ बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य। जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥ 20 ॥ जीवच्छवो भागवताङ्घ्रिरेणुं न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु। श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः श्वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम् ॥ 23 ॥” “जिनके कानोंमें कभी भी श्रीकृष्णके नामने प्रवेश नहीं किया, वे मानव कुत्ते, ग्रामके शूकर, ऊँट और गधेके समान पशु कहे गये हैं, अर्थात् ऐसे श्रीकृष्ण-भजनसे हीन मनुष्योंको पशुसे भी अधिक निन्दनीय माना गया है। जो व्यक्ति अपने कानोंसे प्रचुर गुणोंसे युक्त भगवान्‌के पराक्रमकी कथा नहीं सुनते, उनके दोनों कानोंके छिद्र बिलके समान व्यर्थ ही हैं। जिसकी जिह्वा भगवान्‌की लीलाओंका कीर्तन नहीं करती, अर्थात् जो जिह्वा अपने पति भगवान् हृषीकेशकी लीलाओंका गुणगान न करके तरह-तरहकी सांसारिक वार्त्ताको ही कहती रहती है, वह असती नारी अथवा वेश्याके समान है; वह मेंढककी जिह्वाके समान केवल टर्र-टर्रका शोर मचाकर कालसर्पके समान मृत्युका ही आह्वान करती है। जिस व्यक्तिने कभी भी भगवद्भक्तोंकी चरणरेणुको भलीभाँति अपने समस्त अङ्गोंमें नहीं लगाया, जीवित रहनेपर भी उस व्यक्तिके अङ्ग प्रेतके समान हैं, क्योंकि वह सदा-सर्वदा साधुओंसे भयभीत रहता है। उसके हाथोंके द्वारा की गयी पूजा-सेवाको भी भगवान् स्वीकार नहीं करते। इसी प्रकार जो मनुष्य भगवान् श्रीविष्णुके श्रीचरणोंमें अर्पित तुलसीकी सुगन्धको लेकर आनन्दित नहीं होता, वह व्यक्ति साँस लेते हुए भी मृत प्राणीके समान ही है।” (भाः 10/1/4)- “निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्- भवौषधाच्छ्र क उत्तमःश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ 4 ॥” “जिनकी सांसारिक भोगोंकी कामना सदाके लिये समाप्त हो गयी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष भी पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर श्रीकृष्णकी गुणावलीका कीर्तन किया करते हैं। मुक्तिकामियोंके लिये भी जो भवरोगकी अमोघ औषधि है और विषयी लोगोंके लिये भी उनके कानों और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णके ऐसे मधुर गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त कौन ऐसा है जो उससे विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे।” (भा. 3/23/56)- “xx न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः ॥ 56 ॥ “जिसका वैराग्य तीर्थपद श्रीहरिकी सेवामें पर्यवसित नहीं होता, वह व्यक्ति जीवित होनेपर भी मृत ही है।” ॥ 123 ॥ 170 | श्रीचैतन्यचरितामृत