श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीचैतन्य-नित्यानन्द, आचार्य अद्वैतचन्द्र, स्वरूप-रूप-रघुनाथदास। इँहा-सबार श्रीचरण, शिरे वन्दि निजधन, जन्मलीला गाइल कृष्णदास ॥ 124 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे जन्ममहोत्सव-वर्णनं नाम त्रयोदश परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामी, इन सबको अपना एकमात्र धन जानकर तथा इन सभीके श्रीचरणोंमें अपने शीशको रखकर उनकी वन्दना करते हुए कृष्णदासने महाप्रभुकी जन्मलीलाका गान किया है॥ 124 ॥ अनुभाष्य—श्रीमन्महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैत प्रभु, श्रीदामोदरस्वरूप, श्रीरूप और श्रीरघुनाथदासके श्रीचरणकमल ही श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी एवं उनके अनुगत शुद्धभक्त अथवा अन्तरङ्ग भक्तोंके निजधन हैं। विषयोंका धन मायिक दाम (बन्धन-स्वरूप रस्सी) है; वास्तवमें उसे 'ऋण' कहना ही उचित है। श्रीकृष्ण-विमुख जीव, परमार्थको धन न मानकर जड़-भोगमय ऋणरूप कामको 'धन' समझते हैं। जिन सब वस्तुओंको 'धन' समझकर विषयी जीव व्यस्त हैं, हरिजनोंकी उनमें ऋण-बुद्धि है, धन-बुद्धि नहीं है। पक्षान्तरमें, निजकृपारूप धनदानसे भगवान् जिन्हें धनी बनाते हैं, उनके जागतिक धनसमूहका वे अपहरण कर लेते हैं। (भाः 10/88/8) भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर महाराजसे कहा— “यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।” “मैं जिसके ऊपर कृपा करता हूँ, उसका सारा धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ।” श्रीनरोत्तम ठाकुरने भी अपने पदोंमें कहा है— 13/124 ] “धन मोर नित्यानन्द” “राधाकृष्ण-श्रीचरण, सेइ मोर प्राणधन” “श्रीनित्यानन्द ही मेरे धन हैं”; “राधाकृष्णके श्रीचरण, मेरे प्राणधन हैं”; “जय पतितपावन, देह मोरे एइ धन, तुया बिना अन्य नाहि भाय” “हे पतितपावन! आपकी जय हो, मुझे यही धन दो, आपके बिना मुझे संसारमें कुछ नहीं भाता है”; “श्रीरूपमञ्जरी-पद, सेइ मोर सम्पद, सेइ मोर भजन-पूजन। सेइ मोर प्राणधन” “श्रीरूप-मञ्जरीके चरणकमल ही मेरी सम्पत्ति हैं, वे ही मेरा भजन-पूजन हैं और वे ही मेरे प्राणधन हैं”; “प्रेमरतन-धन हेलाय हराइनु। अधने यतन करि' धन तेयागिनु” “प्रेमरत्न-धनकी उपेक्षा करके उसे मैंने गवाँ दिया और जो धन नहीं है, उसके लिये प्रयास करके वास्तविक धनका त्याग कर दिया” आदि। स्मार्त्त-लोग अपनी शौक्रबुद्धि अर्थात् जन्मके आधारपर जातिका निर्णय करते हैं। इस कारण वे श्रीरघुनाथदासको ब्राह्मणकुलमें जन्म न लेनेके कारण कायस्थकुलमें उत्पन्न शूद्र मानते हैं। ऐसी मति सम्पन्न लोगोंकी भक्ति उनका धन नहीं अपितु ऋण अर्थात् नकारात्मक है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणकमलोंमें उनको अप्राकृत ब्राह्मण स्वीकार करना ही भक्तोंकी सम्पत्ति और सकारात्मक बुद्धि भावना है। इसका तात्पर्य यह है कि वैष्णवोंमें अप्राकृत बुद्धि रखकर भजन करनेसे ही भक्ति 'धन' होती है अन्यथा वह ऋण ही है॥ 124 ॥ इति अनुभाष्य त्रयोदश परिच्छेद। तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें जन्ममहोत्सव-वर्णन नाम तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। तेरहवाँ अध्याय | 171