श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
श्रीचैतन्य-नित्यानन्द, आचार्य अद्वैतचन्द्र, स्वरूप-रूप-रघुनाथदास। इँहा-सबार श्रीचरण, शिरे वन्दि निजधन, जन्मलीला गाइल कृष्णदास ॥ 124 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे जन्ममहोत्सव-वर्णनं नाम त्रयोदश परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामी, इन सबको अपना एकमात्र धन जानकर तथा इन सभीके श्रीचरणोंमें अपने शीशको रखकर उनकी वन्दना करते हुए कृष्णदासने महाप्रभुकी जन्मलीलाका गान किया है॥ 124 ॥ अनुभाष्य—श्रीमन्महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैत प्रभु, श्रीदामोदरस्वरूप, श्रीरूप और श्रीरघुनाथदासके श्रीचरणकमल ही श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी एवं उनके अनुगत शुद्धभक्त अथवा अन्तरङ्ग भक्तोंके निजधन हैं। विषयोंका धन मायिक दाम (बन्धन-स्वरूप रस्सी) है; वास्तवमें उसे 'ऋण' कहना ही उचित है। श्रीकृष्ण-विमुख जीव, परमार्थको धन न मानकर जड़-भोगमय ऋणरूप कामको 'धन' समझते हैं। जिन सब वस्तुओंको 'धन' समझकर विषयी जीव व्यस्त हैं, हरिजनोंकी उनमें ऋण-बुद्धि है, धन-बुद्धि नहीं है। पक्षान्तरमें, निजकृपारूप धनदानसे भगवान् जिन्हें धनी बनाते हैं, उनके जागतिक धनसमूहका वे अपहरण कर लेते हैं। (भाः 10/88/8) भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर महाराजसे कहा— “यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।” “मैं जिसके ऊपर कृपा करता हूँ, उसका सारा धन धीरे-धीरे छीन लेता हूँ।” श्रीनरोत्तम ठाकुरने भी अपने पदोंमें कहा है— 13/124 ] “धन मोर नित्यानन्द” “राधाकृष्ण-श्रीचरण, सेइ मोर प्राणधन” “श्रीनित्यानन्द ही मेरे धन हैं”; “राधाकृष्णके श्रीचरण, मेरे प्राणधन हैं”; “जय पतितपावन, देह मोरे एइ धन, तुया बिना अन्य नाहि भाय” “हे पतितपावन! आपकी जय हो, मुझे यही धन दो, आपके बिना मुझे संसारमें कुछ नहीं भाता है”; “श्रीरूपमञ्जरी-पद, सेइ मोर सम्पद, सेइ मोर भजन-पूजन। सेइ मोर प्राणधन” “श्रीरूप-मञ्जरीके चरणकमल ही मेरी सम्पत्ति हैं, वे ही मेरा भजन-पूजन हैं और वे ही मेरे प्राणधन हैं”; “प्रेमरतन-धन हेलाय हराइनु। अधने यतन करि' धन तेयागिनु” “प्रेमरत्न-धनकी उपेक्षा करके उसे मैंने गवाँ दिया और जो धन नहीं है, उसके लिये प्रयास करके वास्तविक धनका त्याग कर दिया” आदि। स्मार्त्त-लोग अपनी शौक्रबुद्धि अर्थात् जन्मके आधारपर जातिका निर्णय करते हैं। इस कारण वे श्रीरघुनाथदासको ब्राह्मणकुलमें जन्म न लेनेके कारण कायस्थकुलमें उत्पन्न शूद्र मानते हैं। ऐसी मति सम्पन्न लोगोंकी भक्ति उनका धन नहीं अपितु ऋण अर्थात् नकारात्मक है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके चरणकमलोंमें उनको अप्राकृत ब्राह्मण स्वीकार करना ही भक्तोंकी सम्पत्ति और सकारात्मक बुद्धि भावना है। इसका तात्पर्य यह है कि वैष्णवोंमें अप्राकृत बुद्धि रखकर भजन करनेसे ही भक्ति 'धन' होती है अन्यथा वह ऋण ही है॥ 124 ॥ इति अनुभाष्य त्रयोदश परिच्छेद। तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें जन्ममहोत्सव-वर्णन नाम तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। तेरहवाँ अध्याय | 171
चित्र 7
चौदहवाँ अध्याय चौदहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी बाल्यलीला वर्णित हुई है। महाप्रभुका घुटनोंके बल चलना, रोनेके छलसे नामका प्रचार, मिट्टी खानेके छलसे माताको ज्ञान प्रदान करना, अतिथि ब्राह्मणको अपना प्रसाद देकर उसका उद्धार, चोरोंके कन्धेपर चढ़कर उनको भुलाकर वापिस अपने घर ले आना, रोगके बहाने एकादशीके दिन हिरण्य-जगदीशका नैवेद्य खाना, बाल-चपलता, माताको मूर्च्छित देखकर नारियल लाकर देना, गङ्गाके तटपर कन्याओंके साथ परिहास, लक्ष्मीदेवीकी पूजाको ग्रहण करना, जूठे मिट्टीके बर्तनोंके गढ़ढ़ेमें बैठकर माताको ब्रह्मज्ञान प्रदान करना और माताकी आज्ञाका पालन करना तथा श्रीजगन्नाथ मिश्रका शुद्धवात्सल्य—ये सब बाल्यलीलाके प्रकरण इस अध्यायमें वर्णित हुए हैं। (अमृतप्रवाह भाष्य) (हरिभक्तिविलास 20/1)— कथञ्चन स्मृते यस्मिन् दुष्करं सुकरं भवेत्। विस्मृते विपरीतं स्यात् श्रीचैतन्यममुं भजे॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनको थोड़ासा भी स्मरण करनेपर कठिन विषय भी सहज हो जाता है और जिनको भूल जानेपर सहज विषय भी कठिन हो जाता है, उन श्रीचैतन्यका मैं भजन करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य—यस्मिन् (गौरकृष्णे) कथञ्चन (येन केन प्रकारेणापि) स्मृते (स्मरणपथमारूढ़े सति) दुष्करं (दुःसाध्यं कर्म) सुकरं (सहजसाध्यमनुष्ठानं) भवेत्, यस्मिन् (गौरकृष्णे) विस्मृते [सति] विपरीतं (सहजसाध्यमनुष्ठानं दुःसाध्यं कर्म) स्यात्, तं अमुं श्रीचैतन्यं भजे। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र, जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ प्रभुर कहिल एइ जन्मलीला-सूत्र। यशोदानन्दन यैछे हैल शचीपुत्र॥ 3 ॥ संक्षेपे कहिल जन्मलीला-अनुक्रम। एबे कहि बाल्यलीला-सूत्रेरे गणन॥ 4 ॥ अनुवाद—मैंने महाप्रभुकी जन्मलीलाको सूत्ररूपमें और यशोदानन्दन ही शचीदेवीके पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुए हैं, इसका वर्णन किया। मैंने जन्मलीलाको क्रमानुसार संक्षेपमें ही वर्णन किया, अब बाल्यलीलाको सूत्ररूपमें कहूँगा॥ 4 ॥ मानुषी होनेपर भी श्रीगौरलीला अप्राकृत :— वन्दे चैतन्यकृष्णस्य बाल्यलीलां मनोहराम्। लौकिकीमपि तामीश-चेष्टया बलितान्तराम्॥ 5 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीचैतन्य-कृष्णकी मनोहर बाल्यलीलाओंकी वन्दना करता हूँ, ये बाल्यलीलाएँ लौकिक लीलाकी भाँति होनेपर भी ईश्वर-चेष्टासे मिश्रित हैं॥ 5 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यकृष्णस्य (गौरकृष्णस्य) लौकिकीं (प्रापञ्चिक-मानुष-चेष्टिताम्) अपि ईशचेष्टया (अलौकिकप्रयासेन) बलितान्तरां (बलितं युक्तम् अन्तरं यस्याः तां) मनोहरां (हृदयाकर्षिणीं) बाल्यलीलां (शैशवक्रीड़ाम्) अहं वन्दे॥ श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 5 ॥
[ 14/6-15 अपने श्रीचरणतलमें शंख-चक्र- ध्वज-वज्र-मीन-चिह्न-प्रदर्शन :- बाल्यलीलाय आगे प्रभुर उत्तान-शयन। पिता-माताय देखाइल चिह्न चरण ॥६॥ गृहे दुइ जन देखि' लघुपद-चिह्न। ताहातेइ ध्वज, वज्र, शङ्ख, चक्र, मीन ॥७॥ देखिया दोँहार चित्ते जन्मिल विस्मय। कार पदचिह्न घरे, ना पाय निश्चय ॥८॥ अनुवाद—महाप्रभुकी प्रथम बाल्यलीलाका वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि महाप्रभुने पीठके बल शयन करते हुए पिता-माताको अपने चरण-चिह्न दिखलाये। (इससे पूर्व) घरमें (पिता-माता) दोनोंने छोटेसे पदचिह्नोंको देखा जिसमें ध्वज, वज्र, शङ्ख, चक्र और मीन विद्यमान थे। यह देखकर दोनोंको बहुत विस्मय हुआ, किन्तु वे यह निश्चित नहीं कर पा रहे थे कि घरमें ये चरणचिह्न किसके हैं?॥६-८॥ अनुभाष्य—'उत्तान'—ऊपर मुख करके पीठके बल शयन करना; पाठान्तरमें 'उत्थान'—इस अर्थमें पैरोंके बलपर स्वयं खड़े होनेका प्रयास करनेपर अभ्यास नहीं होनेके कारण बालकों जैसी असमर्थता दिखाकर शयन किया॥६॥ मिश्रकी उक्ति :- मिश्र कहे, —"बालगोपाल आछे शिला-सङ्गे। तेंहो मूर्त्ति हञा खेले, जानि घरे रङ्गे ॥"९॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा, —"शालग्राम-शिलाके साथ घरमें बालगोपाल विराजमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे ही बालक बनकर आनन्दसे घरमें खेलते हैं॥"९॥ सेइ क्षणे जागि' निमाइ करये क्रन्दन। अङ्के लञा शची ताँरे पियाइल स्तन ॥१०॥ अनुवाद—निमाइ उसी समय जागकर रोने लगे, तब शचीमाताने उन्हें गोदमें लेकर स्तनपान कराया॥१०॥ शची और मिश्र, दोनोंके द्वारा निमाइके चरणचिह्न-दर्शन :- स्तन पियाइते पुत्रेर चरण देखिल। सेइ चिह्न पाये देखि' मिश्रे बोलाइल ॥११॥ देखिया मिश्रेर हइल आनन्दित मति। गुप्ते बोलाइल नीलाम्बर चक्रवर्त्ती ॥१२॥ अनुवाद—स्तनपान कराते समय उन्होंने पुत्रके चरणोंको देखा। उनमें उन्हीं चिह्नोंको देखकर शचीमाताने जगन्नाथ मिश्रजीको बुलाया। यह देखकर जगन्नाथ मिश्र बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने एकान्तमें नीलाम्बर चक्रवर्तीको बुलाया॥११-१२॥ नीलाम्बर चक्रवर्तीकी उक्ति :- चिह्न देखि' चक्रवर्त्ती बलेन हासिया। "लग्न गणि' पूर्वे आमि राखियाछि लिखिया ॥१३॥ बत्रिश लक्षण—महापुरुष-भूषण। एइ शिशु अङ्गे देखि से-सब लक्षण ॥१४॥ अनुवाद—उन चरणचिह्नोंको देखकर नीलाम्बर चक्रवर्तीने हँसकर कहा, —"मैंने तो पहलेसे ही लग्नकी गणना करके लिख रखा है। महापुरुषोंमें भूषणस्वरूप जो बत्तीस लक्षण हैं, मैं वे सब इस बालकके अङ्गोंमें देख रहा हूँ॥"१३-१४॥ महापुरुषके बत्तीस लक्षण :- सामुद्रका तीसरा-श्लोक— पञ्चदीर्घः पञ्चसूक्ष्मः सप्तरक्तः षडुन्नतः। त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरो द्वात्रिंशल्लक्षणो महान् ॥१५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नासिका, भुजाएँ, ठोडी, नेत्र और घुटना—ये पाँच दीर्घ (बड़े); त्वचा, केश, अँगुलीका अग्रभाग, दाँत और रोम—ये पाँच सूक्ष्म (पतले); नेत्रप्रान्त, चरणका तलवा, हथेली, तालु, अधर, ओष्ठ और नाखून—ये सात रक्त (लाल); वक्ष, स्कन्ध, 174 | श्रीचैतन्यचरितामृत
14/15–21 ] [बायाँ स्तम्भ] नाखून, नासिका, कटि और मुख—ये छह उन्नत; गर्दन, जङ्घा और मेहन (जनेन्द्रिय)—ये तीन ह्रस्व (छोटे); कटि, ललाट और वक्ष—ये तीन विस्तीर्ण (चौड़े); नाभि, स्वर, सत्त्व (बुद्धि)—ये तीन गम्भीर,—महापुरुष इन बत्तीस लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥15॥ अनुभाष्य—पञ्चदीर्घः (पञ्च नासा-भुज-हनु-नेत्र-जानूनि दीर्घाणि यस्य सः), पञ्चसूक्ष्मः (पञ्चत्वक्-केशाङ्गुलिपर्व-दन्त-रोमाणि सूक्ष्माणि यस्य सः) सप्तरक्तः (सप्त नयनप्रान्त-पदतल-करतल- ताल्र्वधरौष्ठनखाः च रक्ताः रक्तवर्णाः यस्य सः) षडुन्नतः (षट् वक्षः-स्कन्ध-नख-नासिका-कटि-मुखानि उन्नतानि उच्चानि यस्य सः) त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरः (त्रीणि ग्रीवा-जङ्घा-मेह्नानि ह्रस्वानि लघूनि, त्रीणि कटि-ललाट-वक्षांसि पृथुनि विशालानि, त्रीणि नाभि-स्वर-सत्त्वानि गम्भीराणि यस्य सः) द्वात्रिंशल्लक्षणः (एतानि द्वात्रिंशत् लक्षणानि यस्य सः जनः)—महान् (महापुरुषः)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥15॥ नीलाम्बर चक्रवर्ती द्वारा शिशुका माहात्म्य-वर्णन और भविष्यवाणी :— नारायणेर चिह्नयुक्त श्रीहस्त-चरण। एइ शिशु सर्वलोके करिबे तारण॥16॥ एइ त' करिबे वैष्णव-धर्मेर प्रचार। इहा हैते हबे दुइ कुलेर निस्तार॥17॥ अनुवाद—इस शिशुके श्रीहस्त-चरणोंमें वही चिह्न हैं जो नारायणके हस्त-चरणोंमें हैं, इसलिये यह सभी लोगोंका उद्धार करेगा। यह वैष्णव धर्मका प्रचार करेगा और इससे दोनों कुलोंका उद्धार होगा॥16-17॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘दुइकुलेर’—पितृकुल और मातृकुल॥17॥ नामकरण-महोत्सव :— महोत्सव कर, सब बोलाह ब्राह्मण। आजि दिन भाल,—करिब नामकरण॥18॥ 'विश्वम्भर' नाम :— सर्वलोके करिबे एइ धारण, पोषण। 'विश्वम्भर' नाम इहार,—एइ त' कारण॥”19॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—आजका दिन शुभ है, इसलिये मैं आज ही इसका नामकरण करूँगा, आप सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर महोत्सव कीजिये। यह सभी लोगोंका धारण और पोषण करेगा, इसलिये इसका नाम 'विश्वम्भर' है॥”18-19॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय— “जगत् हइल सुस्थ इहान जनमे। पूर्वे येन पृथिवी धरिला नारायणे॥48॥ अतएव इहान ‘श्रीविश्वम्भर’ नाम॥49(क)॥” “जैसे पूर्वकालमें पृथ्वी श्रीनारायणके वराहावतारके द्वारा धारण किये जानेपर स्वस्थ हुई थी, वैसे ही इन बालकके जन्मके साथ ही सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ हो गया है अर्थात् श्रीकृष्णनाम-श्रवण-कीर्तनके प्रभावसे स्वरूपभ्रान्त- अनर्थ रोगसे ग्रस्त जीव-जगत्ने अपने स्वरूपमें स्थित होकर स्वास्थ्य (निश्चित मङ्गल) लाभ किया है, इसलिये इनका नाम ‘श्रीविश्वम्भर’ है।” 'विश्वम्भर'—अथर्ववेदसंहिता, दूसरा काण्ड, तीसरा अनुवाक्, तीसरा प्रपाठक, सोलहवाँ मन्त्र, पाँचवीं संख्या— “विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा।” “हे समस्त प्राणियोंका पोषण करनेवाले विश्वम्भरदेव! आप अपनी समस्त पोषण-शक्तिसे हमारी सुरक्षा करें और हमारी आहुति ग्रहण करें॥”19॥ शुनि' शची-मिश्रेर मने आनन्द बाड़िल। ब्राह्मण-ब्राह्मणी आनि' महोत्सव कैल॥20॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीशचीदेवी और श्रीजगन्नाथ मिश्र बड़े आनन्दित हुए तथा उन्होंने ब्राह्मणों और ब्राह्मणियोंको बुलाकर महोत्सव किया॥20॥ अलौकिक-चेष्टा-प्रदर्शन :— तबे कत दिने प्रभुर जानु-चक्रमण। तथा नाना चमत्कार कराइल दर्शन॥21॥ अनुवाद—कुछ दिनोंके बाद महाप्रभुने घुटनोंके चौदहवाँ अध्याय | 175
[ 14/21-25 बल चलना आरम्भ किया। उस समय उन्होंने अनेक प्रकारकी चमत्कारिक लीलाएँ प्रकाशित कीं॥२१॥ अनुभाष्य—‘जानुचंक्रमण’—घुटनोंके बल चलना। चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय— “जानुगति चले प्रभु परम सुन्दर। कटिते किङ्कणी बाजे अति मनोहर॥ 65 ॥ एकदिन एकसर्प बाड़ीते बेड़ाय। धरिलेन सर्प प्रभु बालक-लीलाय॥ 67 ॥ कुण्डली करिया सर्प रहिल बेड़िया। ठाकुर थाकिला सर्प उपरे शुइया॥ 68 ॥ प्रभुरे एड़िया सर्प पलाय तखन॥” “जब परम सुन्दर महाप्रभुने घुटनोंके बल चलना आरम्भ किया, तो उनकी कटिमें बँधी किङ्कणीकी बड़ी सुन्दर झङ्कार होती थी। एक दिन एक सर्प उनके आङ्गनमें घूम रहा था, महाप्रभुने बाल्यक्रीड़ावश उसको पकड़ लिया। वह सर्प कुण्डली मारकर वहाँ बैठ गया और महाप्रभु उसके ऊपर सो गये। महाप्रभुके उठनेपर वह सर्प वहाँसे चला गया॥”२१॥ हरिनामसे रोना बन्द :- क्रन्दनेर छले बलाइल हरिनाम। नारी सब ‘हरि’ बोले,—हासे गौरधाम ॥ 22 ॥ अनुवाद—रोनेके छलसे महाप्रभु सबसे हरिनाम उच्चारण करवाते। (जब स्त्रियाँ महाप्रभुको रोते हुए देखतीं,) तो वे ‘हरि-हरि’ कहती, यह देखकर महाप्रभु हँसने लगते॥ २२ ॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय— “तावत् कान्देन प्रभु कमललोचन। हरिनाम शुनिले रहेन ततक्षण॥ 8 ॥ परम सङ्केत एइ, सबे बुझिलेन। कान्दिलेइ हरिनाम सबेइ लयॆन॥ 9 ॥ प्रभु यॆइ कान्दे, सेइक्षणे नारीगण। हाते तालि दिया करे हरि-सङ्कीर्तन॥ 60 ॥ निरवधि सबार वदने हरिनाम। छले बोलायेन प्रभु, हेन इच्छा तान॥ 62 ॥” “कमलनयन महाप्रभु तब तक रोते रहते, परन्तु हरिनाम सुनते ही तुरन्त रोना बन्द कर देते। उनके इस परम सङ्केतको सभीने समझ लिया और उनके रोते ही सभी हरिनाम लेने लगते। जिस क्षण महाप्रभु रोने लगते, उसी क्षण सभी नारियाँ हाथोंसे ताली बजाकर हरिनाम सङ्कीर्तन करने लगतीं। इस प्रकार छलसे महाप्रभु सभीके मुखोंसे निरन्तर हरिनाम करवाते॥”२२॥ बालकोंके साथ क्रीड़ा :- तबे कत दिने कैल पद-चंक्रमण। शिशुगणे मिलि’ कैल विविध खेलन ॥ 23 ॥ अनुवाद—कुछ दिनोंमें महाप्रभुने अपने पैरोंपर चलना आरम्भ किया और फिर दूसरे बालकोंके साथ मिलकर अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करने लगे॥ 23 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, चौथा अध्याय— “एइमत दिने दिने श्रीशचीनन्दन। हाँटिया करेन प्रभु अङ्गने भ्रमण॥ 77 ॥” “इस प्रकार दिन-प्रतिदिन लीला करते हुए श्रीशचीनन्दन आङ्गनमें पैरोंपर चलते हुए भ्रमण करते॥”२३॥ एकदिन शची खइ-सन्देश आनिया। बाटी भरि’ दिया बोले,—“खाओ त’ बसिया ॥”24॥ अनुवाद—एक दिन शचीमाताने खील-सन्देशको कटोरीमें डालकर महाप्रभुको दिया और कहा,—“इसे यहाँ बैठकर खाओ॥”२४॥ अनुभाष्य—‘बाटी’—खाद्यद्रव्य अथवा ताम्बुल रखनेका पात्र अथवा बर्तन॥ २४ ॥ निमाइके द्वारा मिट्टी खाना :- एत बलि’ गेला शची गृहे कर्म करिते। लुकाञा लागिला शिशु मृत्तिका खाइते ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह कहकर शचीमाता गृहके कार्य करने चली गयीं और उधर महाप्रभु छिपकर मिट्टी खाने लगे॥ 25 ॥ 176 | श्रीचैतन्यचरितामृत
14/25-34 ] अनुभाष्य-चैतन्यभागवतके आदिखण्ड चतुर्थ अध्यायमें कही गई अन्यान्य बाल्य-लीलाओंमें इस घटनाका वर्णन नहीं है, इसका यहींपर वर्णन किया गया है॥ 25 ॥ शचीके द्वारा उसका कारण पूछना :- देखि' शची धाञा आइला करि' हाय, हाय'। माटि काड़ि' लञा बले—'माटि केने खाय' ॥ 26 ॥ अनुवाद-यह देखकर शचीमाता 'हाय, हाय' करती हुईं दौड़कर आयीं और महाप्रभुके हाथसे मिट्टीको छीनकर बोलीं,- 'मिट्टी क्यों खाते हो?' ॥ 26 ॥ निमाइका दार्शनिक उत्तर :- कान्दिया बलेन शिशु, - "केने करे रोष। तुमि माटि खाइते दिले, मोर किबा दोष ॥ 27 ॥ सब कुछ ही मिट्टीका विकार :- खइ-सन्देश-अन्न, यतेक-माटिर विकार। इह माटि, सेह माटि, कि भेद-विचार ॥ 28 ॥ माटि-देह, माटि-भक्ष्य, देखह विचारि'। अविचारे देह दोष, कि बलिते पारि ॥" 29 ॥ अनुवाद-रोते हुए निमाइने कहा, - "क्रोध क्यों करती हो? आपने ही तो मुझे मिट्टी खानेको दी है, इसमें मेरा क्या दोष है? खील, सन्देश और अन्न, सभी (मिट्टीसे उत्पन्न होनेके कारण) मिट्टीके ही तो विकार हैं। यह भी मिट्टी है और वह भी मिट्टी है, इसमें क्या भेद-विचार है? विचार करके देखो कि यह शरीर भी मिट्टीसे बना है और खानेके पदार्थ भी मिट्टीसे बने हैं। परन्तु आप बिना विचार किये ही मुझपर दोष लगा रही हैं, तो मैं क्या कह सकता हूँ?" ॥ 27-29 ॥ शचीका प्रत्युत्तर :- अन्तरे विस्मित शची बलिल ताहारे। “माटि खाइते ज्ञानयोग के शिखाल तोरे ॥ 30 ॥ द्रव्य और उसके विकारकी विशेषता अथवा अनुकूल और प्रतिकूलका वैशिष्ट्य :- माटिर विकार अन्न खाइले देह-पुष्टि हय। माटि खाइले रोग हय, देह याय क्षय ॥ 31 ॥ माटिर विकार घटे पानि भरि' आनि। माटि-पिण्डे धरि यबे, शोषि' याय पानि ॥”32 ॥ अनुवाद-यह सुनकर शचीमाता मन-ही-मन बहुत विस्मित हुईं, परन्तु वात्सल्यके कारण बोलीं, - "मिट्टी खानेका ज्ञानयोग तुम्हें किसने सिखलाया है? मिट्टीके विकार अन्नको खानेसे शरीर पुष्ट होता है, परन्तु मिट्टी खानेसे शरीरमें रोग हो जाता है और शरीरका नाश हो जाता है। (सुनो पुत्र!) मिट्टीके विकार घड़ेमें जल भरकर लाया जा सकता है, परन्तु मिट्टीके ढेलेपर जल डालनेसे वह जलको सोख लेता है ॥” 30-32 ॥ उसको सुनकर महाप्रभुकी उक्ति :- आत्म लुकाइते प्रभु बलिला ताहारे। “आगे केन इहा, माता, ना शिखाले मोरे ॥ 33 ॥ एबे से जानिलाङ, आर माटि ना खाइब। क्षुधा लागे यबे, तबे तोमार स्तन पिब ॥”34 ॥ अनुवाद-(माताके वचन सुनकर) महाप्रभुने अपने स्वरूपको छिपाते हुए कहा, - “आपने पहले मुझे इस बातकी शिक्षा क्यों नहीं दी? अब मैं जान गया हूँ, इसलिये पुनः मिट्टी नहीं खाऊँगा। मुझे जब भी भूख लगेगी, आपके स्तनका दूध ही पीऊँगा ॥”33-34 ॥ अनुभाष्य- (अपने सुखके लिये ही) भोज्य-विषयोंको ग्रहण करना जड़ीय चेष्टा है, उसमें हरिसेवा नहीं है। निर्विशेषवादी लोग भ्रमवश ऐसे प्रतिकूल विषयों और श्रीकृष्णसेवाके अनुकूल विषयोंको (अर्थात् श्रीकृष्णको भोग अर्पण करनेको) सजातीय समझते हैं। इस प्रकारकी धारणा प्राकृत सिद्धान्तका नितान्त भ्रमयुक्त अस्फुट विकास है। उसी प्रकारकी मूढ़-निर्विशेष-चिन्ताकी अकर्मण्यताको, श्रीमन् महाप्रभुने माताके मुखसे मिट्टी और घटके सहज दृष्टान्तके द्वारा प्रदर्शित किया ॥ 27-33 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 177
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[ 14/35-39 एत बलि' जननीर कोलेते चड़िया। स्तनपान करे प्रभु ईषत् हासिया॥ 35 ॥ अनेक प्रकारसे ऐश्वर्यलीला-प्रकाश :- एइमते नाना छले ऐश्वर्य देखाय। बाल्यभाव प्रकटिया पश्चात् लुकाय॥ 36 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभु शचीमाताकी गोदमें चढ़ गये और मन्द-मन्द मुसकाते हुए उनका स्तनपान करने लगे। इस प्रकार महाप्रभु नाना प्रकार छलसे ऐश्वर्य दिखते और बाल्यभावको प्रकटकर अपने ऐश्वर्यको छिपा लेते॥ 35-36 ॥ तैर्थिक ब्राह्मणका अन्नभोजन और उद्धार :- अतिथि-विप्रेर अन्न खाइल तिनबार। पाछे गुप्ते सेइ विप्रे करिल निस्तार॥ 37 ॥ अनुवाद-एक बार महाप्रभुने एक अतिथि-ब्राह्मणके भोजनको तीन बार खाया और बादमें गुप्तरूपसे उसका उद्धार किया॥ 37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-एक तैर्थिक ब्राह्मण श्रीजगन्नाथ मिश्रके घरमें अतिथि बनकर आया। श्रीजगन्नाथ मिश्रने उन्हें रसोई बनानेकी सामग्री लाकर दी और उस ब्राह्मणने ठाकुरजीके लिये भोग बनाया। तैर्थिक ब्राह्मणने जब ध्यानमें गोपालको भोग निवेदन किया, तब निमाइ आकर उस भोगको खाने लगे। निमाइके द्वारा स्पर्श किये हुए अन्नको त्यागकर अतिथि ब्राह्मणने और एक बार भोग बनाया। इस बार भी ध्यानमें निवेदनके समय वही घटना हुई। उसने तीसरी बार जब भोग बनाया, तब घरमें सभी लोग सो रहे थे। ब्राह्मणने जब ध्यानमें गोपालको भोग निवेदन कर रहा था, तब निमाइ आकर वह भोग खाने लगे। ब्राह्मण अपनेको दुर्भागा मानकर हाहाकार करने लगा। तब निमाइ बोले,-'हे ब्राह्मण ! जब मैं व्रजमें यशोदा-दुलाल था, तब भी तुम्हारे साथ ऐसी ही घटना घटी थी। इस बार भी तुम्हारी भक्तिसे आकृष्ट होकर मैंने कृपाकर तुम्हें इसके दर्शन करवा दिये हैं।' तब ब्राह्मणने अपने इष्टदेवका दर्शन करके महाप्रेममें मुग्ध होकर स्वयंको धन्य माना और उसने निमाइके अवशिष्ट प्रसादसेवा की अर्थात् उस प्रसादको ग्रहण किया। महाप्रभुने उसको इस गुप्तलीलाको किसीके समक्ष प्रकाश करनेके लिये निषेध किया॥ 37 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 37 ॥ चोरोंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न करना :- चोरे लञा गेल प्रभुके बाहिरे पाइया। तार स्कन्धे चढ़ि' आइला तारे भुलाइया॥ 38 ॥ अनुवाद-एक बार महाप्रभुको घरसे बाहर खेलते हुए पाकर चोर उन्हें उठा ले गये, परन्तु अपने प्रभावसे महाप्रभु उनको मार्ग भुलाकर उन्हींके कन्धोंपर चढ़कर घर लौट आये॥ 38 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु जब अभी छोटेसे बालक थे, तब वे स्वर्णके अलङ्कारोंसे भूषित होकर द्वारके बाहर खेलने गये। दो चोर उन्हें 'सन्देश' (बङ्गालकी एक मिठाई) खिलानेका लोभ देकर अपने कन्धेपर चढ़ाकर ले गये। चोरोंने सोचा कि वनमें ले जाकर इस बालकको मारकर हम इसके सारे अलङ्कार ले लेंगे। महाप्रभुने अपनी मायाका विस्तार करके उन दोनोंको मार्ग भुला दिया और चोरोंके कन्धोंपर चढ़कर उन्हें अपने ही घरके द्वारपर ले आये। महाप्रभुके जानेपर उनके परिवारके लोग उनको खोजनेके लिये इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे और वे चोर उन सबके सामने बालकको छोड़कर भाग गये। तब महाप्रभुके परिवारजन बहुत कठिनाईसे उन्हें शचीमाताके आङ्गनमें लाये॥ 38 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय द्रष्टव्य है॥ 38 ॥ एकादशीमें हिरण्य-जगदीशके घरमें विष्णुनैवेद्य-भोजन :- व्याधि-छले जगदीश-हिरण्य-सदने। विष्णु-नैवेद्य खाइल एकादशी-दिने॥ 39 ॥ 178 | श्रीचैतन्यचरितामृत
14/39-43 ] अनुवाद-एक बार एकादशीके दिन महाप्रभुने रोगके छलसे हिरण्य और जगदीश पण्डितके घरमें विष्णुके लिये बने नैवेद्यको खाया ॥ 39 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जगदीश और हिरण्य पण्डितके घरमें एकादशीके दिन (विष्णु)-नैवेद्य तैयार हो रहा था। महाप्रभुने उस नैवेद्यको खानेकी आशासे अपने पिताजीको हिरण्य-जगदीशके घरमें भेजा। हिरण्य-जगदीश बालककी प्रार्थना सुनकर आश्चर्यचकित होकर बोले,- “आज एकादशी है और हमारे घरमें विष्णु-नैवेद्य बन रहा है, इस बातका इस बालकको कैसे पता चला है? अवश्य ही उसमें कोई वैष्णवी-शक्ति है।” उन्होंने उस नैवेद्यकी वस्तुओंको बालकके खानेके लिये भेज दीं। शरीर रोगग्रस्त हुआ है और विष्णु-नैवेद्य खानेसे उस रोगसे मुक्ति मिलेगी-इस बहानेसे महाप्रभुने नैवेद्य मँगवाया था। जगन्नाथ मिश्रने लाये गये नैवेद्यको पहले बालकोंको खिलाया और फिर स्वयं भी कुछ खाया। इससे महाप्रभु रोगसे मुक्त हो गये। जगन्नाथ मिश्रके घरसे हिरण्य-जगदीशका भवन लगभग एक कोस दक्षिण-पूर्व दिशाकी ओर है, इसलिये बालकके लिये इतनी दूरकी बातको जानना असम्भव है ॥ 39 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड छठा अध्याय द्रष्टव्य है ॥ 39 ॥ बालकोचित्त लीला-चोरी और कलहादि :- शिशुगण लये पाड़ा-पड़सीर घरे। चुरि करि' द्रव्य खाय, मारे बालकेरे ॥ 40 ॥ अनुवाद-महाप्रभु बालकोंको साथ लेकर पड़ोसियोंके घर जाते और वहाँ जाकर खाद्य सामग्रीकी चोरी करके खाते तथा (उस घरके) बालकोंको मारते भी थे ॥ 40 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय,– “निकटे बसये यत बन्धुवर्ग घरे। प्रतिदिन कौतुके आपने चुरि करे ॥ 100 ॥ कारो घरे दुग्ध पिये, कारो भात खाय। हाँड़ि भाङ्गे, यार घरे किछुइ ना पाय ॥ 101 ॥ घरे यदि शिशु थाके, ताहारे काँदाय ॥ 102 (क) ॥” “निकटमें जितने बन्धु-बान्धवोंके घर थे, महाप्रभु उनके घरोंमें प्रतिदिन कौतुकसे चोरी करते। किसीके घरमें चोरी करके दूध पीते और किसीके घरमें भात खाते। जिस घरमें उन्हें कुछ नहीं मिलता, उनकी हाँडी फोड़ देते। जिस घरमें छोटा बच्चा होता, तो उसे रुलाते।” चैःभाः छठा अध्याय,– “केह बोले,-पुत्र अति-बालक आमार। कर्णे जल दिया तारे कान्दाय अपार ॥ 65 ॥” “(जगन्नाथ मिश्रको उलाहना देते हुए) कोई कहता कि मेरा बालक अभी बहुत छोटा है और आपका पुत्र उसके कानमें जल डाल देता है, जिससे वह बहुत रोता है ॥” 40 ॥ शचीसे शिकायत और शचीके द्वारा फटकार :- शिशुसब शची-स्थाने कैल निवेदन। शुनि' शची पुत्रे किछु दिला ओलाहन ॥ 41 ॥ “केने चुरि कर, केने मारह शिशुरे। केने पर-घरे याह, किवा नाहि घरे ॥” 42 ॥ अनुवाद-सभी बालकोंने शचीमाताके पास जाकर निमाइके क्रिया-कलाप बतलाये। जिसे सुनकर शचीमाताने निमाइको डाँटते हुए पूछा, – “तुम चोरी क्यों करते हो? बालकोंको क्यों मारते हो? दूसरोंके घर क्यों जाते हो? हमारे घरमें क्या कमी है?” ॥ 41-42 ॥ अनुभाष्य- 'ओलाहन'- तिरस्कार, भर्त्सना ॥ 41 ॥ महाप्रभुका क्रोध और घरमें उपद्रव :- शुनि' क्रु धरे यत भाण्ड छिल, फेलिल भाङ्गिया ॥ 43 ॥ अनुवाद-(शचीमाताके द्वारा इस प्रकार डाँटनेपर) निमाइ क्रोधित होकर घरके भीतर गये और घरके सभी बर्तनोंको फेंककर तोड़ दिया ॥ 43 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 179
[ 14/44-53 महाप्रभुको सान्त्वना और महाप्रभुका लज्जित होना :- तबे शची कोले करि' कराइल सन्तोष। लज्जित हइला प्रभु जानि' निज-दोष ॥ 44 ॥ अनुवाद-तब शचीमाताने निमाइको गोदमें लेकर शान्त किया और महाप्रभु भी अपने दोषको जानकर लज्जित हुए ॥ 44 ॥ मातापर प्रहार, माताको मूर्छित देखकर दुष्प्राप्य नारियल लाना :- कभु मृदुहस्ते कैल माताके ताड़न। माताके मूर्च्छिता देखि' करये क्रन्दन ॥ 45 ॥ नारीगण कहे,—"नारिकेल देह आनि'। तबे सुस्थ हइबेन तोमार जननी ॥" 46 ॥ बाहिरे याञा आनिलेन दुइ नारिकेल। देखिया अपूर्व हैला विस्मित सकल ॥ 47 ॥ अनुवाद-किसी समय महाप्रभुने अपने कोमल हाथोंसे माताको बाल्यभावसे पीटा और माता मूर्च्छित होने का अभिनय करने लगीं, जिसे देखकर महाप्रभु रोने लगे। तब अन्य स्त्रियोंने महाप्रभुसे कहा,—"माताको नारियल लाकर दो, तभी वह स्वस्थ हो सकती है।" यह सुनकर तत्क्षण महाप्रभु बाहरसे दो नारियल ले आये, जिसे देखकर सभी अत्यन्त विस्मित हो गये ॥ 45-47 ॥ अनुभाष्य-लोचनदास ठाकुरकृत चैतन्यमङ्गलमें आदि- "तँहि एक दिव्य नारी कहिल हासिया। चिबुक धरिया विश्वम्भरे बले वाणी। नारिकेल फल दुइ माये देह आनि'॥ तबे से जीयये शची-एड़ तोर माता। ×× इहा शुनि' विश्वम्भर हरिष हइला। तखनि युगल नारिकेल आनि' दिला॥" "तब एक दिव्य नारीने विश्वम्भरकी ठोडी पकड़कर हँसकर कहा कि तुम दो नारियलके फल लाकर दो, तभी तुम्हारी शचीमाता जीवित होगी। यह सुनकर विश्वम्भर हर्षित हो गये और वे दो नारियल लेकर आये ॥" 46 ॥ स्नानके समय कुमारी कन्याओंके साथ कौतुक :- कभु शिशु-सङ्गे स्नान करिल गङ्गाते। कन्यागण आइला ताँहा देवता पूजिते ॥ 48 ॥ गङ्गास्नान करि' पूजा करिते लागिला। कन्यागण-मध्ये प्रभु आसिया बसिला ॥ 49 ॥ अनुवाद-एक दिन अन्य बालकोंके साथ महाप्रभु गङ्गामें स्नान कर रहे थे। उसी समय कुछ कन्याएँ देवपूजनके लिये वहाँ आयीं। गङ्गा स्नानके बाद जब वे देवपूजा करने लगीं, तब महाप्रभु कन्याओंके बीचमें झटसे जाकर बैठ गये ॥ 48-49 ॥ कन्याओंके प्रति महाप्रभुकी उक्ति :- कन्यारे कहे,—"आमा पूज, आमि दिब वर। गङ्गा-दुर्गा-दासी मोर, महेश-किङ्कर ॥" 50 ॥ आपनि चन्दन परि' परेन फुलमाला। नैवेद्य काड़िया खांन-सन्देश, चाल, कला ॥ 51 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कन्याओंसे कहा,—"तुम मेरी पूजा करो और मैं तुम्हें वरदान दूँगा। गङ्गा, दुर्गा तो मेरी दासियाँ हैं और महेश मेरे दास हैं।" यह कहकर महाप्रभुने स्वयं ही चन्दन और फूल-मालाएँ उठाकर अपने अङ्गोंपर धारण कर लिये तथा सन्देश, चावल, केला आदि नैवेद्य छीनकर खाने लगे ॥ 50-51 ॥ कन्याओंकी प्रत्युक्ति :- क्रोधे कन्यागण कहे,—"शुन, हे निमाञि। ग्राम-सम्बन्धे हओ तुमि आमा सबार भाइ ॥ 52 ॥ आमा सबार पक्षे इहा कहिते ना युयाय। ना लह देवता-सज्ज, ना कर अन्याय ॥" 53 ॥ अनुवाद-वे कन्याएँ क्रोधित होकर कहने लगीं,—"हे निमाइ, सुनो! ग्रामके सम्बन्धसे तुम हमारे भाई लगते 180 | श्रीचैतन्यचरितामृत
14/52-61 ] हो। तुम्हारा हम सबसे ऐसा कहना उचित नहीं है। देवताओंके लिये लायी गयी पूजा-सामग्रीको मत लो, ऐसा अन्याय मत करो॥" 52-53 ॥ छलसे महाप्रभुका वरदान :- प्रभु कहे,–“तोमा-सबाके दिलाङ एइ वर। तोमा सबार भर्त्ता हबे परम सुन्दर ॥ 54 ॥ पण्डित, विदग्ध, युवा, धनधान्यवान्। सात सात पुत्र हबे—चिरायु, मतिमान् ॥” 55 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,–“मैं तुम सबको यह वर देता हूँ कि तुम्हारा पति परम सुन्दर, पण्डित, कुशल, नवयुवक और धन-धान्यसे युक्त होगा तथा तुम सबके सात-सात चिरायु तथा बुद्धिमान पुत्र होंगे ॥" 54-55 ॥ वर शुनि' कन्यागणेर अन्तरे सन्तोष। बाहिरे भर्त्सन करे करि' मिथ्या रोष ॥ 56 ॥ अनुवाद-वर सुनकर सभी कन्याओंके हृदयमें सन्तोष हुआ, परन्तु बाहरसे मिथ्या रोष प्रकट करते हुए वे महाप्रभुकी भर्त्सना करने लगीं ॥ 56 ॥ भागने वाली कन्याओंके प्रति शापके छलसे कृत्रिम क्रोध :- कोन कन्या पलाइल नैवेद्य लइया। तारे डाकि' कहे प्रभु सक्रोध हइया ॥ 57 ॥ “यदि नैवेद्य ना देह हइया कृपणी। बूढ़ा भर्त्ता हबे, आर चारि सतिनी ॥” 58 ॥ अनुवाद-कई कन्याएँ नैवेद्य लेकर भागने लगीं, तो महाप्रभुने उन्हें पुकारते हुए क्रोधित होकर कहा,–“यदि तुम कृपणता करके मुझे नैवेद्य नहीं दोगी, तो तुम्हें बूढ़ा पति और चार-चार सौतने प्राप्त होंगी ॥” 57-58 ॥ भयसे बालिकाओंके द्वारा नैवेद्य-अर्पण :- इहा शुनि' ता-सबार मने हइल भय। “कोन किछु जाने, किबा देवाविष्ट हय ॥” 59 ॥ आनिया नैवेद्य तारा सम्मुखे धरिल। खाइया नैवेद्य तारे इष्टवर दिल ॥ 60 ॥ अनुवाद-यह सुनकर वे सब मन-ही-मन भयभीत हो गयीं और सोचने लगीं,–“हो सकता है कि निमाइ कुछ ज्योतिष जानता है अथवा इसमें किसी देवताका आवेश है।” निमाइके वचन सत्य नहीं हो जाँय, इस भयसे वे लौट आयीं और अपने नैवेद्यको महाप्रभुके सामने रख दिया। महाप्रभुने उस नैवेद्यको खाकर उन्हें मनोभीष्ट वर प्रदान किया ॥ 59-60 ॥ महाप्रभुकी मधुर चापल्य-लीलासे सभीको सुख :- एइ मत चापल्य सब लोकेरे देखाय। दुःख कारो मने नहे, सबे सुख पाय ॥ 61 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु सबसे चपलता करते, किन्तु इसके द्वारा किसीके भी मनमें दुःख नहीं होता, अपितु सभी सुखका ही अनुभव करते ॥ 61 ॥ अमृतानुकणिका-'एइ मत चापल्य'–कौतुकी विश्वम्भर बालकोंके साथ जब गङ्गा स्नानके लिये जाते, तो वे एक-दूसरेपर जल फेंका करते थे। सब बालकोंको साथ लेकर महाप्रभु गङ्गामें तैरते। पलभरमें डुबकी लगाते, तो दूसरे ही पल ऊपर दिखाई देते। इस प्रकार महाप्रभु नाना क्रीड़ाएँ करते रहते। श्रीगौरसुन्दर जब जलक्रीड़ा करते, तो वे चरणोंसे जल उछालते जो अन्य सबके शरीरपर लगता था। किसीके तो शरीरपर जलका कुल्ला ही कर देते थे। इस प्रकार महाप्रभु सबको बारम्बार स्नान करवाते। सबके मना करनेपर वे किसीकी भी बात नहीं मानते थे, एक स्थानपर स्थिर न रहनेके कारण कोई उन्हें पकड़ भी नहीं पाता था। महाप्रभुको न पकड़ पानेके कारण सब ब्राह्मण उनके पिता जगन्नाथ मिश्रके पास पहुँचे। सब मिलकर कहने लगे,–“हे परम बान्धव मिश्रवर ! सुनिये, सुनिये, हम सब आपको आपके पुत्रके अन्यायपूर्ण व्यवहारकी बातें सुनाते हैं, जिसके कारण हम लोग अच्छी तरह चौदहवाँ अध्याय | 181
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गङ्गा-स्नान भी नहीं कर पाते हैं।” कोई कहने लगे,—“वह जल फेंककर हमारा ध्यान भङ्ग कर देता है। फिर कहता है,—अरे ! तुम किसका ध्यान करते हो? देखो, कलियुगमें मैं ही प्रत्यक्ष नारायण हूँ।” कोई कहते,—“वह मेरा शिवलिङ्ग चुरा लेता है।” कोई कहते,—“मेरा उत्तरीय लेकर भाग जाता है।” कोई कहते,—“पुष्प, दूर्वा, नैवेद्य, चन्दनादि श्रीविष्णुपूजाकी सामग्री और श्रीविष्णुका आसन रखकर मैं तो उधर स्नान करने लग जाता हूँ और इधर आपका बालक उस आसनपर आ बैठता है और वहाँ सारा नैवेद्य खाकर तथा माल्यादि पहनकर भाग जाता है। फिर ऊपरसे कहता है—तुम अपने दुःखी क्यों होते हो? जिसके लिये ये सब तुमने किया था, वही स्वयं आकर खा गया।” कोई कहने लगे,—“जब मैं गङ्गाजलमें खड़ा होकर सन्ध्या कर रहा होता हूँ, तब यह डुबकी लगाकर मेरे पाँव पकड़कर खींचता है।” कोई कहने लगे,—“मेरे पुष्पचयन पात्र और धोतीको ही उठाकर ले जाता है।” कोई कहने लगे,—“मेरी गीताकी पोथीको चुराकर ले जाता है।” किसीने कहा,—“मेरा लड़का अभी बहुत छोटा है, यह उसके कानमें जल डाल देता है, जिससे वह बहुत रोता है।” किसीने कहा,—“मेरी पीठपर पैर रखकर कन्धेपर चढ़ जाता है और 'मैं ही महेश हूँ', ऐसा कहकर गङ्गामें कूद जाता है।” कोई कहने लगे,—“मेरे पूजाके आसनपर स्वयं बैठ जाता है और नैवेद्य खाकर स्वयं ही विष्णुपूजा करने लगता है। हम स्नान करके ऊपर उठते हैं, तब हमारे शरीरपर रेत डाल देता है और जितने भी चञ्चल बालक हैं, वे सब इसके साथ रहते हैं। कभी-कभी स्त्रियों और पुरुषोंके कपड़े बदलकर रख देता है, जिनको पहनते समय सब लज्जासे विकल हो जाते हैं। हे मिश्रजी ! आप हमारे परम-बान्धव हैं, एक दिनकी बात नहीं, यह प्रतिदिन ऐसा ही व्यवहार करता है, तभी तो हम कहने आये हैं। दो प्रहरतक यह जलसे बाहर ही नहीं निकलता। बताओ, फिर इसका शरीर कैसे ठीक रहेगा ?”
उसी समय पड़ोसमें रहनेवाली सब बालिकाएँ शचीदेवीके पास क्रोधित होकर आ पहुँचीं। वे सब शचीमातासे कहने लगीं,—“हे ठकुरानी ! अपने पुत्रकी करतूतें सुनिये—वह हमारे वस्त्रोंको चुरा लेता है और हमसे बहुत बुरे शब्द बोलता है। जब हम कुछ उत्तर देती हैं, तो हमारे ऊपर जल फेंकता है और झगड़ने लगता है। हम व्रत करनेके लिये जो-जो फल-फूल ले जाती हैं, जबरदस्ती हमसे छीनकर फेंक देता है। स्नान करके आनेपर वह हमारे शरीरपर रेत फेंक देता है। कभी छिपकर आता है और हठात् कानके निकट आकर उच्च स्वरसे चीत्कार करता है।” कोई कहने लगीं—“आज इसने मेरे मुखपर कुल्ला कर दिया। फिर हम सबके बालोंमें ओकड़ाका फल (शरीरपर लगनेसे जिससे शरीरमें तीव्र खुजलाहट होती है) चिपका देता है।” कोई कहने लगी,—“मुझसे तो यह विवाह करना चाहता है। यह प्रतिदिन ऐसा व्यवहार करता है, जैसे तुम्हारा निमाइ कोई राजकुमार हो ? पूर्वकालमें जैसे श्रीनन्दके कुमारके विषयमें सुना जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा निमाइ सब आचरण करता है। दुःखी होकर जिस दिन हम अपने पिता-मातासे ये सब बातें कहेंगी, उसी दिन आपके साथ उनका झगड़ा हो जायेगा। इसलिये आप अपने छोटे बालकको तुरन्त रोक दें। नदिया नगरीमें ऐसा आचरण करना कभी भी अच्छा नहीं है।” महाप्रभुकी जननी ये सब बातें सुनकर हँस पड़ीं और सबको गोदीमें लेकर प्रियवाणी कहने लगीं—“आज निमाइके घर आनेपर उसको बाँधकर लाठीसे मारूँगी, जिसे वह फिर और उपद्रव न करे।” यह सुनकर सबने शचीमाताकी चरणधूलि लेकर अपने सिरपर धारण की और सभी पुनः स्नानके लिये गङ्गा-घाटपर चली गयीं। महाप्रभु जिनके साथ जितनी भी चञ्चलता करते, वास्तवमें उससे उन सबके मनमें बड़ा सन्तोष होता। वे कौतुकवश मिश्रजीके पास कहने आये थे। उनकी बातें सुनकर मिश्रजी क्रोधित होकर तर्जन-गर्जन करने
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14/61–67 ] लगे-“निरन्तर सबके साथ ऐसा ही व्यवहार करता है, परस्परके दर्शनसे दोनोंको सुख :- लोगोंको अच्छी तरह गङ्गा-स्नान भी नहीं करने देता। ताँरे देखि' प्रभुर हइल साभिलाष मन। अभी शीघ्र ही उसे दण्ड देनेके लिये जाता हूँ।” लक्ष्मी चित्ते सुख पाइल प्रभुर दर्शन ॥ 63 ॥ उस समय सब बालकोंके बीचमें श्रीगौरसुन्दर अनुवाद—उन्हें देखकर महाप्रभुके मनमें एक अभिलाषा गङ्गाजलमें क्रीड़ा करते हुए अत्यन्त मनोहर लग रहे जाग्रत हुई और महाप्रभुको देखकर लक्ष्मीदेवीके मनमें थे। क्रोधपूर्वक जब मिश्रजी घरसे चले, तो सर्वान्तर्यामी भी प्रसन्नता हुई ॥ 63 ॥ श्रीगौराङ्गने जान लिया। तभी कन्याओंने आकर कहा दोनोंकी नित्यसिद्ध स्वाभाविक प्रीति और हर्ष :- कि हे निमाइ भाग जाओ, तुम्हारे पिताजी क्रोधित होकर साहजिक प्रीति दुँहार करिल उदय। आ रहे हैं। महाप्रभुने सब बालकोंको सिखा दिया कि बाल्यभावे छन्न-तनु हइल निश्चय ॥ 64 ॥ पिताजी जब आयें, तो ऐसा कहना कि आपका पुत्र तो दुँहा देखि' दुहार चित्ते हइल उल्लास। अभी स्नान करने ही नहीं आया। वह तो आज देवपूजा-छले कैल दुँहे परकाश ॥ 65 ॥ पाठशालासे उसी मार्गसे सीधा घर चला गया था, हम अनुवाद—उन दोनोंकी स्वभाविक प्रीति जो अभी भी यहाँ उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।” इस प्रकार सबको तक बाल्यभावसे ढकी हुई थी, वह आज निश्चित सिखाकर महाप्रभु दूसरे रास्तेसे घर चले गये और इधर रूपसे प्रकटित हो गयी। एक दूसरेको देखकर दोनोंके मिश्रजी गङ्गाघाटपर आ पहुँचे। गङ्गाघाटपर आकर हृदयमें उल्लास हुआ और देवपूजाके छलसे दोनोंने उन्होंने चारों ओर देखा, परन्तु बालकोंके बीचमें अपने अपने-अपने हृदयकी बातको प्रकाशित कर दिया ॥ 64-65 ॥ पुत्रको कहीं भी न देख पाये। मिश्रजीने बालकोंसे अमृतप्रवाह भाष्य—लक्ष्मीजी भगवान्की नित्य पत्नी पूछा, — “विश्वम्भर कहाँ गया?” सभी बालकोंने वही हैं और भगवान् लक्ष्मीजीके नित्यपति हैं। अतः उन कहा जैसा निमाइने सिखाया था। हाथमें छड़ी लिये दोनोंमें जो नित्यप्रीति है, वह स्वाभाविक है। वह प्रीति मिश्रजीने चारों ओर देखा, परन्तु पुत्रको न देखकर बाल्यभावसे आच्छादित थी और अब उसकी प्रतीति तर्जन-गर्जन करने लगे। जिन ब्राह्मणोंने मिश्रजीके पास हुई ॥ 64 ॥ जाकर महाप्रभुका अन्याय निवेदन किया था, उन्हीं सब महाप्रभुका लक्ष्मीको अपने अर्चनके लिये आदेश :- ब्राह्मणोंने पुनः कहा, — “मिश्रजी ! विश्वम्भर आपके डरके प्रभु कहे,—“आमा' पूज, आमि महेश्वर। मारे घरको भाग गया है; आप घर जाइये, उससे कुछ आमारे पूजिले पाबे अभीप्सित वर ॥” 66 ॥ कहना नहीं। अब पुनः यदि वह चञ्चलता करेगा, तो अनुवाद—महाप्रभुने लक्ष्मीदेवीसे कहा, — “तुम मेरी हम स्वयं ही उसे पकड़कर आपके पास ले आयेंगे।” पूजा करो, मैं महेश्वर हूँ। मेरी पूजा करनेसे तुम्हें (चैःभाः आदिखण्ड छठा अध्याय) ॥ 61 ॥ मनोवाञ्छित वरकी प्राप्ति होगी ॥” 66 ॥ वल्लभकी पुत्री लक्ष्मीदेवीके साथ साक्षात्कार :- लक्ष्मीका आदेश-पालन :- एकदिन वल्लभाचार्य-कन्या 'लक्ष्मी' नाम। लक्ष्मी ताँर अङ्गे दिल स-पुष्प-चन्दन। देवता पूजिते आइल करि' गङ्गास्नान ॥ 62 ॥ मल्लिकार माला दिया करिल वन्दन ॥ 67 ॥ अनुवाद—एक दिन श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री 'लक्ष्मी' देवपूजनके लिये गङ्गा स्नान करने आयीं ॥ 62 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 183
[ 14/67-72 अनुवाद-लक्ष्मीदेवीने महाप्रभुके श्रीअङ्गोंमें पुष्पके साथ चन्दन प्रदान किया और मल्लिकाके फूलोंकी माला उनके गलेमें देकर उनकी वन्दना की॥67॥ महाप्रभुका सन्तोष :- प्रभु ताँर पूजा पाञा हासिते लागिला। श्लोक पड़ि' ताँर भाव अङ्गीकार कैला ॥ 68 ॥ अनुवाद-उनकी पूजा पाकर महाप्रभु हँसने लगे और उन्होंने एक श्लोक पढ़कर लक्ष्मीदेवीके भावोंको ग्रहण किया॥68॥ अनुभाष्य-‘वल्लभाचार्य' नवद्वीपवासी राजपण्डित थे। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 44वाँ श्लोक)— “पुरासीत् जनको राजा मिथिलाधिपतिर्महान्। अधुना वल्लभाचार्य भीष्मकोऽपि च सम्मतः ॥ 44 ॥” “मिथिला अधिपति महान् राजा जनक अब श्रीवल्लभाचार्य हैं। कोई-कोई इन्हें (श्रीरुक्मिणीके पिता) भीष्मक भी कहते हैं।” श्रीगौरहरिने प्रथम विवाह इनकी कन्या 'लक्ष्मीप्रिया' देवीसे किया। 'लक्ष्मीदेवी'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 45वाँ श्लोक)— “श्रीजानकी रुक्मिणी च 'लक्ष्मी' नाम्नी च तत्सुता।” “श्रीजानकी और श्रीरुक्मिणी एक साथ मिलकर श्रीवल्लभाचार्यकी पुत्री श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी हुई हैं।” श्रीचैतन्यचरितमें- “व्यक्ता लक्ष्मीनाम्नी च सा यथा। सा वल्लभाचार्य-सुता चलन्ती स्नातुं सखीभिः सुरदीर्घिकायाः। लक्ष्मीरनेनैव कृतावसारा प्रभोर्ययौ लोचनवर्त्म तत्र॥” “वल्लभाचार्यकी कन्या श्रीलक्ष्मीप्रियादेवी, जो स्वयं लक्ष्मीका अवतार हैं, जिस समय सखियोंके साथ गङ्गा-स्नानके लिये जा रही थीं, तभी अकस्मात् महाप्रभुकी दृष्टि उनपर पड़ी।” ॥ 62-68 ॥ श्रीमद्भागवत (10/22/25)- सङ्कल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम्। मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥ 69 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥69॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे साध्वियों ! तुम सबकी पूजाका तात्पर्य मैं जान गया हूँ, इससे मुझे विशेष आनन्दकी प्राप्ति हुई है। तुम्हारी अभिलाषाएँ निश्चित ही सिद्ध होने योग्य हैं॥69॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी अभिलाषासे कात्यायनी व्रत करनेवाली गोपियोंके वस्त्रहरणके पश्चात् उन्हें फिरसे वस्त्र लौटा देनेपर उन सबकी कृष्णकामनाको देखकर श्रीकृष्णने कहा,– हे साध्व्यः (सत्यः)! मदर्च्चनं (मत्प्राप्त्यर्थं अर्च्चनं तदेव) भवतीनां (गोपीनां) सङ्कल्पः (मनोरथः, मनोगतभावः इत्यर्थः, युष्माभिः लज्जया अकथितः अपि) मया विदितः [सन्] अनुमोदितः (स्वीकृतः); [अतः] सः असौ [सङ्कल्पः] सत्यः (यथार्थः) भवितुम् अर्हति (योग्यो भवति)। श्लोक भावानुवाद-हे साध्वियों ! तुम सबकी पूजाका मनोभाव तुम्हारे लज्जाके कारण नहीं बतानेपर भी मैं जान गया हूँ और यह मेरे द्वारा अनुमोदित है। इसलिये तुम्हारा सङ्कल्प सत्य होनेके योग्य है॥69॥ एइमत लीला दुँहे करि' गेला घरे। गम्भीर चैतन्य-लीला के बुझिते पारे ॥ 70 ॥ अनुवाद-इस प्रकारकी लीलाके बाद दोनों अपने-अपने घर चले गये। चैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अत्यन्त गम्भीर है, उनके अन्तरङ्ग भक्तोंके अतिरिक्त इनको कौन समझ सकता है? ॥ 70 ॥ महाप्रभुका लीला-चापल्य देखकर सभीका अभियोग :- चैतन्य-चापल्य देखि' प्रेमे सर्वजन। शची-जगन्नाथे देखि' देन ओलाहन ॥ 71 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी चपलताको सभी लोग प्रेमसे देखते, परन्तु जब वे शचीमाता और जगन्नाथ मिश्रसे मिलते, तो उन्हें उलाहना भी देते॥71॥ शचीकी निमाइको पकड़नेकी चेष्टा :- एकदिन शची-देवी पुत्रेरे भर्त्सिया। धरिबारे गेला पुत्रे, गेला पलाइला ॥ 72 ॥ 184 | श्रीचैतन्यचरितामृत
14/72-75 ] फेंकी हुई जूठी हाँड़ियोंके ऊपर निमाइका बैठना :- उच्छिष्ट-गर्त्ते त्यक्त-हाण्डीर उपर। बसियाछेन सुखे प्रभु देव-विश्वम्भर ॥ 73 ॥ अनुवाद—एक दिन शचीदेवी किसी कारणसे क्रोधित होकर निमाइको डाँटते हुए उन्हें पकड़ने गयीं, किन्तु वे भाग गये। एक गढ्ढे, जिसमें जूठी हाँड़ियाँ पड़ी थीं, उसके ऊपर प्रभु विश्वम्भर सुखपूर्वक बैठ गये ॥ 72-73 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सातवाँ अध्याय,- “विष्णुनैवेद्येर यत वर्ज्य हाँड़िगण। बसिलेन प्रभु, हाँड़ि करिया आसन ॥ 162 ॥ माये आसि' देखिया करेन हाय हाय। ए स्थानेते बाप, बसिवारे ना युयाय ॥ 167 ॥ प्रभु बोले,-सर्वत्र मोर अद्वितीय ज्ञान। एसब हाँड़िते मूले नाहिक दूषण ॥ 177 ॥ विष्णुर रन्धन-स्थाली कभु नाहि दुष्ट हय। से हाँड़ि-परशे आर स्थान शुद्ध हय ॥ 178 ॥ “विष्णु नैवेद्य बनानेके बाद हाँड़ियाँ जहाँ फेंक दी जाती थीं, वहाँ जाकर महाप्रभु एक हाँड़ीको आसन बनाकर बैठ गये। शचीमाता यह देखकर ‘हाय’ ‘हाय’ करती हुई आयीं और कहने लगीं, - ‘बेटा! यह स्थान बैठनेके योग्य नहीं है।' महाप्रभु बोले, - 'मेरा तो सर्वत्र ही अद्वितीय ज्ञान है। इन सब हाँड़ियोंके मूलमें कोई दोष नहीं है। जिस हाँड़ीमें विष्णुके लिये भोग बनाया जाता है, वह कभी भी दूषित नहीं हो सकती और उस हाँड़ीके स्पर्शसे सभी स्थान पवित्र हो जाते हैं'।” चैःचः अन्त्यलीला, 4/174-176 संख्या द्रष्टव्य है। (भाः 11/28/4- श्रीकृष्णने उद्धवसे कहा)- “किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्। वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥” “अद्वयज्ञान-सम्बन्धरहित सभी मायिक प्रतीति-युक्त वस्तुएँ वास्तवमें 'अवस्तु' और 'द्वैत' हैं, उसमें यह भली है अथवा बुरी है, इसके सम्बन्धमें मनके द्वारा जो चिन्तन होता है अथवा वाक्यके द्वारा जो कहा जाता है, वह सब असत्य है।” अर्थात् “भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि अप्राकृते।” “अप्राकृत वस्तुमें 'भले-बुरे' की बुद्धि करना उचित नहीं है।” “द्वैते भद्राभद्र-ज्ञान-सब मनोधर्म। एइ भाल, एइ मन्द, एइ सब भ्रम ॥” “द्वैत-भावसे जो भले-बुरेका ज्ञान है, वह सब मनोधर्म है। यह भला है, यह बुरा है-यह सब मनका भ्रम है।” (भाः 11/19/45)- “गुण-दोष-दृशिर्दोषो गुणस्तूभय-वर्ज्जितः ।” “(वास्तव वस्तुसे सम्बन्धरहित होकर) गुण और दोषका दर्शन 'दोष' और इन दोनों (गुण और दोष) को नहीं देखना ही गुण है।” (भाः 11/21/3-4)- “शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु। द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ 3 ॥ धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ ॥ 4 क ॥” “हे निष्पाप उद्धव ! द्रव्य योग्य अथवा अयोग्य है, इस सन्देहके निवारणके लिये द्रव्योंके धर्मार्थ (धर्म-सम्पादनके लिये) शुद्धि और अशुद्धि, व्यवहारार्थ (समाजका व्यवहार सुचारु रूपसे चले इसलिये) गुण और दोष तथा देहयात्रा (जीवन निर्वाहकी सुविधा) के लिये शुभ और अशुभ-निरूपण विहित है ॥” 73 ॥ शचीकी पुत्रको अशुद्धिके विचारके द्वारा सुधारनेकी चेष्टा :- शची आसि' कहे, - “केने अशुचि धुँइला। गङ्गास्नान कर याइ'- अपवित्र हइला ॥” 74 ॥ अनुवाद-शचीमाताने आकर कहा,- “तुमने इस अपवित्र स्थानका स्पर्श क्यों किया ? तुम अपवित्र हो गये हो, इसलिये अब जाकर गङ्गामें स्नान करके आओ ॥” 74 ॥ पुत्रका माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश :- इहा शुनि' माताके कहिल ब्रह्मज्ञान। विस्मिता हइया माता कराइला स्नान ॥ 75 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 185
[ 14/75-84 अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने माताको ब्रह्मज्ञानका उपदेश दिया, जिसे सुनकर माता विस्मित हो गयीं और वे स्वयं उनको स्नान कराने लगीं॥75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—‘हे माता! उच्छिष्ट और अनुच्छिष्ट, ये दोनों मनुष्यके भावमात्र हैं, वास्तवमें इसमें कुछ भी सत्य नहीं है। आपने इन बर्तनोंमें विष्णुके लिये भोग-द्रव्य पकाकर विष्णुको अर्पण किया है, इसलिये ये सब बर्तन कभी भी उच्छिष्ट नहीं हो सकते। आत्मा नित्य पवित्र वस्तु है, उसके लिये उच्छिष्टादिका क्या विचार है? इस प्रकारके ब्रह्मज्ञानको सुनकर शचीमाता विस्मित हो गयीं और उनको स्नान कराने लगीं॥” 75॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये चतुर्दश परिच्छेद। चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। शयनके समय शचीके द्वारा देवताओंका दर्शन :— कभु पुत्रसङ्गे शची करिला शयन। देखे, दिव्यलोक आसि' भरिल भवन॥76॥ शची बले,—“याह, पुत्र, बोलाह बापेरे।” मातृ-आज्ञा पाइया प्रभु चलिला बाहिरे॥77॥ माताके कहनेपर चलते समय चरणोंमें नूपुर न होने पर भी नूपुर-ध्वनि :— चलिते चरणे नूपुर बाजे झन्झन्। शुनि' चमकित हैल पिता-मातार मन॥78॥ अनुवाद—एक दिन शचीमाता निमाइके साथ सो रही थीं, तो उन्होंने देखा कि दिव्य लोगोंसे उनका घर भर गया। शचीमाताने कहा,—“जाओ पुत्र, अपने पिताजीको बुला लाओ।” माताकी आज्ञा पाकर महाप्रभु बाहर चले और चलनेपर उनके चरणोंमें नूपुरोंकी झङ्कार होने लगी, जिसे सुनकर पिता-माता चकित हो गये॥76-78॥ मिश्रका विस्मय :— मिश्र कहे,—“एइ बड़ अद्भुत काहिनी। शिशुर शून्यपदे केने नूपुरेर ध्वनि॥”79॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा,—‘यह बड़े आश्चर्यकी बात है! बालकके खाली पाँवोंसे नूपुरकी ध्वनि कैसे आ रही है?॥”79॥ देवताओंके दर्शनसे शचीका विस्मय :— शची कहे,—“आर एक अद्भुत देखिल। दिव्य दिव्य लोक आसि' अङ्गन भरिल॥80॥ किबा कोलाहल करे, बुझिते ना पारि। काहाके वा स्तुति करे, अनुमान करि॥”81॥ अनुवाद—शचीमाताने कहा,—‘मैंने भी एक आश्चर्य देखा था। दिव्य-दिव्य लोग हमारे आङ्गनमें आये और सारा आँगन भर गया था। वे कोलाहल करते हुए क्या कह रहे थे, उसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरे अनुमानसे वे लोग किसीकी स्तुति कर रहे थे॥”80-81॥ दोनोंकी निमाइके कुशलकी चिन्ता :— मिश्र बले,—“किछु हउक्, चिन्ता किछु नाइ। विश्वम्भरेर कुशल हउक्,—एइमात्र चाइ॥”82॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा,—‘कुछ भी हो, चिन्ताकी कोई बात नहीं है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि हमारा पुत्र विश्वम्भर कुशलसे रहे॥”82॥ महाप्रभुकी चपलता देखकर मिश्रके द्वारा तीव्र भर्त्सना :— एकदिन मिश्र पुत्रेर चापल्य देखिया। धर्म-शिक्षा दिल बहु भर्त्सना करिया॥83॥ अनुवाद—एक दिन जगन्नाथ मिश्रने निमाइकी चपलताको देखकर उसको बहुत फटकार लगायी और उसे धर्मके सम्बन्धमें शिक्षा प्रदान की॥83॥ रात्रिमें स्वप्न-दर्शन—एक ब्राह्मणके द्वारा मिश्रकी भर्त्सना :— रात्रे स्वप्न देखे,—एक आसि' ब्राह्मण। मिश्रेरे कहये किछु सरोष वचन॥84॥ 186 | श्रीचैतन्यचरितामृत
14/84–92 ] “मिश्र, तुमि पुत्रेर तत्त्व किछुइ ना जान। भर्त्सन-ताड़न कर,—पुत्र करि' मान'॥” 85 ॥ अनुवाद—उसी रात्रि जगन्नाथ मिश्रने स्वप्नमें देखा कि एक ब्राह्मण आकर उन्हें क्रोधित होकर कह रहा है,—“मिश्र, तुम अपने पुत्रके तत्त्वके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं जानते हो, उसे केवल अपना पुत्र मानकर उसे डाँट-फटकार लगाते हो॥” 84-85 ॥ मिश्रका अप्राकृत स्नेहपूर्ण उत्तर :— मिश्र कहे,—“देव, सिद्ध, मुनि केने नय। ये से बड़ हउक्, एबे आमार तनय ॥ 86 ॥ पुत्रेर लालन-शिक्षा—पितार स्वधर्म। आमि ना शिखाले, कैछे जानिबे धर्म-मर्म॥” 87 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ मिश्रने कहा,—“यह देव, सिद्ध, मुनि ही क्यों न हो अथवा कोई महान् पुरुष ही क्यों न हो, किन्तु अभी तो मेरा पुत्र ही है। पुत्रका लालन-पालन और उसे शिक्षा देना, यह पिताका स्वधर्म है। यदि मैं इसे शिक्षा नहीं दूँगा, तो धर्मके रहस्यको कैसे जानेगा ? ॥” 86-87 ॥ विप्र और मिश्रकी उक्ति और प्रत्युक्ति :— विप्र कहे,—“एइ यदि दैव-सिद्ध हय। स्वतःसिद्धज्ञान, तबे शिक्षा व्यर्थ हय ॥” 88 ॥ मिश्र कहे,—“पुत्र केने नहे नारायण। तथापि पितार धर्म—पुत्रके शिक्षण ॥” 89 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,—“यदि तुम्हारा पुत्र सिद्ध देवता है, तो इसका ज्ञान स्वतः सिद्ध ही है, तब तुम्हारा इसे शिक्षा देना व्यर्थ है।” जगन्नाथ मिश्रने उत्तर दिया,—“मेरा पुत्र यदि स्वयं नारायण ही क्यों न हो, तो भी पुत्रको शिक्षा देना पिताका धर्म है॥” 88-89 ॥ अनुभाष्य—(श्रीजगन्नाथ मिश्रका) अपने पुत्र निमाईको अशिक्षित और अनभिज्ञ समझकर उसे शिक्षा देकर ज्ञानी बनानेकी अभिलाषाको देखकर ब्राह्मणने मिश्रसे कहा,—“तुम्हारे पुत्रके नित्यसिद्ध देवता होनेके कारण उसके नित्यसिद्ध स्वाभाविक ज्ञानको मूर्खता समझनेके कारण तुम्हारा उसे शिक्षा देना व्यर्थ है, इसलिये ऐसा करना तुम्हारे लिये अनुचित है॥” 88 ॥ महाप्रभुके प्रति मिश्रका शुद्ध वात्सल्य-स्नेह :— एइमते दुँहे करेन धर्मेर विचार। शुद्ध वात्सल्य मिश्रेर, नाहि जाने आर ॥ 90 ॥ अनुवाद—इस प्रकार दोनों धर्मका विचार करने लगे। किन्तु श्रीजगन्नाथ मिश्रका महाप्रभुके प्रति शुद्ध-वात्सल्य भाव होनेके कारण वे इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते॥ 90 ॥ अनुभाष्य—(भक्तिरसामृतसिन्धु पश्चिम विभाग चतुर्थ लहरी)— “विभावाद्यैस्तु वात्सल्यं स्थायी पुष्टिमुपागतः। एष 'वत्सल'-नामात्र प्रोक्तः ॥” “वात्सल्य-रतिको स्थायीभाव, विभावादिके द्वारा पुष्टि लाभ करनेपर उसे पण्डित लोग 'वात्सल्य-भक्तिरस' कहते हैं।” (भाः 10/8/45)— “त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः। उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥” “तीनों वेदों, उपनिषदों, सांख्य, योग और सात्वत-शास्त्रोंमें जिनके माहात्म्यका गान किया गया है, यशोदादेवी उन श्रीहरिको अपनी कोखसे उत्पन्न पुत्र मानती हैं॥” 90 ॥ स्वप्न समाप्त होनेपर मिश्रका विस्मित होना और बन्धुओंको स्वप्नके सम्बन्धमें बताना :— एत शुनि' द्विज गेला हञा आनन्दित। मिश्र जागिया हइला परम विस्मित ॥ 91 ॥ बन्धु-बान्धव-स्थाने स्वप्न कहिल। शुनिया सकल लोक विस्मित हइल ॥ 92 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 187
[ 14/91-97 एइ मत शिशुलीला करे गौरचन्द्र। दिने दिने पिता-मातार बाड़िल आनन्द ॥ 93 ॥ अनुवाद-यह सुनकर वह ब्राह्मण आनन्दित होकर चला गया और जगन्नाथ मिश्र निद्रासे उठकर परम विस्मित हुए। जगन्नाथ मिश्रने अपने बन्धु-बान्धवोंको स्वप्नके विषयमें बतलाया, जिसे सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। श्रीगौरचन्द्र इस प्रकार बाल्यलीला करते, जिसे देखकर पिता-माताका आनन्द दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता ॥ 91-93 ॥ निमाइके हाथमें कलम (खड़िया) :- कत दिने मिश्र पुत्रेर हाते खड़ि दिल। अल्प दिने द्वादश-फला अक्षर शिखिल ॥ 94 ॥ अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद जगन्नाथ मिश्रने निमाइके हाथोंमें कलम दी और कुछ ही दिनोंमें वे द्वादश-फला अक्षर सीख गये ॥ 94 ॥ अनुभाष्य-'द्वादश-फला'-रेफ, ण, न, म, य, र, ल, व, ऋ, ॠ, ऌ और ॡ फला ॥ 94 ॥ इति अनुभाष्ये चतुर्दश परिच्छेद। चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। यह बाल्यलीला-सूत्र विस्तारसे श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णित :- बाल्यलीला-सूत्र एइ कहिल अनुक्रम। इहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 95 ॥ अतएव बाल्यलीला संक्षेपे सूत्र कैल। पुनरुक्ति-भये विस्तारिया ना कहिल ॥ 96 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने बाल्यलीलाको क्रमानुसार सूत्र रूपमें कहा है, क्योंकि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इन लीलाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसलिये मैंने पुनरुक्तिके भयसे विस्तारपूर्वक न कहकर बाल्यलीलाको संक्षेपमें सूत्ररूपसे ही वर्णन किया है ॥ 95-96 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 97 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे बाल्यलीला-सूत्रवर्णनं नाम चतुर्दश-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 97 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला बाल्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
पन्द्रहवाँ अध्याय
चित्र 8