भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 722

[ 14/75-84 अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने माताको ब्रह्मज्ञानका उपदेश दिया, जिसे सुनकर माता विस्मित हो गयीं और वे स्वयं उनको स्नान कराने लगीं॥75॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने कहा,—‘हे माता! उच्छिष्ट और अनुच्छिष्ट, ये दोनों मनुष्यके भावमात्र हैं, वास्तवमें इसमें कुछ भी सत्य नहीं है। आपने इन बर्तनोंमें विष्णुके लिये भोग-द्रव्य पकाकर विष्णुको अर्पण किया है, इसलिये ये सब बर्तन कभी भी उच्छिष्ट नहीं हो सकते। आत्मा नित्य पवित्र वस्तु है, उसके लिये उच्छिष्टादिका क्या विचार है? इस प्रकारके ब्रह्मज्ञानको सुनकर शचीमाता विस्मित हो गयीं और उनको स्नान कराने लगीं॥” 75॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये चतुर्दश परिच्छेद। चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। शयनके समय शचीके द्वारा देवताओंका दर्शन :— कभु पुत्रसङ्गे शची करिला शयन। देखे, दिव्यलोक आसि' भरिल भवन॥76॥ शची बले,—“याह, पुत्र, बोलाह बापेरे।” मातृ-आज्ञा पाइया प्रभु चलिला बाहिरे॥77॥ माताके कहनेपर चलते समय चरणोंमें नूपुर न होने पर भी नूपुर-ध्वनि :— चलिते चरणे नूपुर बाजे झन्झन्। शुनि' चमकित हैल पिता-मातार मन॥78॥ अनुवाद—एक दिन शचीमाता निमाइके साथ सो रही थीं, तो उन्होंने देखा कि दिव्य लोगोंसे उनका घर भर गया। शचीमाताने कहा,—“जाओ पुत्र, अपने पिताजीको बुला लाओ।” माताकी आज्ञा पाकर महाप्रभु बाहर चले और चलनेपर उनके चरणोंमें नूपुरोंकी झङ्कार होने लगी, जिसे सुनकर पिता-माता चकित हो गये॥76-78॥ मिश्रका विस्मय :— मिश्र कहे,—“एइ बड़ अद्भुत काहिनी। शिशुर शून्यपदे केने नूपुरेर ध्वनि॥”79॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा,—‘यह बड़े आश्चर्यकी बात है! बालकके खाली पाँवोंसे नूपुरकी ध्वनि कैसे आ रही है?॥”79॥ देवताओंके दर्शनसे शचीका विस्मय :— शची कहे,—“आर एक अद्भुत देखिल। दिव्य दिव्य लोक आसि' अङ्गन भरिल॥80॥ किबा कोलाहल करे, बुझिते ना पारि। काहाके वा स्तुति करे, अनुमान करि॥”81॥ अनुवाद—शचीमाताने कहा,—‘मैंने भी एक आश्चर्य देखा था। दिव्य-दिव्य लोग हमारे आङ्गनमें आये और सारा आँगन भर गया था। वे कोलाहल करते हुए क्या कह रहे थे, उसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरे अनुमानसे वे लोग किसीकी स्तुति कर रहे थे॥”80-81॥ दोनोंकी निमाइके कुशलकी चिन्ता :— मिश्र बले,—“किछु हउक्, चिन्ता किछु नाइ। विश्वम्भरेर कुशल हउक्,—एइमात्र चाइ॥”82॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा,—‘कुछ भी हो, चिन्ताकी कोई बात नहीं है। मैं केवल यही चाहता हूँ कि हमारा पुत्र विश्वम्भर कुशलसे रहे॥”82॥ महाप्रभुकी चपलता देखकर मिश्रके द्वारा तीव्र भर्त्सना :— एकदिन मिश्र पुत्रेर चापल्य देखिया। धर्म-शिक्षा दिल बहु भर्त्सना करिया॥83॥ अनुवाद—एक दिन जगन्नाथ मिश्रने निमाइकी चपलताको देखकर उसको बहुत फटकार लगायी और उसे धर्मके सम्बन्धमें शिक्षा प्रदान की॥83॥ रात्रिमें स्वप्न-दर्शन—एक ब्राह्मणके द्वारा मिश्रकी भर्त्सना :— रात्रे स्वप्न देखे,—एक आसि' ब्राह्मण। मिश्रेरे कहये किछु सरोष वचन॥84॥ 186 | श्रीचैतन्यचरितामृत