भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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14/72-75 ] फेंकी हुई जूठी हाँड़ियोंके ऊपर निमाइका बैठना :- उच्छिष्ट-गर्त्ते त्यक्त-हाण्डीर उपर। बसियाछेन सुखे प्रभु देव-विश्वम्भर ॥ 73 ॥ अनुवाद—एक दिन शचीदेवी किसी कारणसे क्रोधित होकर निमाइको डाँटते हुए उन्हें पकड़ने गयीं, किन्तु वे भाग गये। एक गढ्ढे, जिसमें जूठी हाँड़ियाँ पड़ी थीं, उसके ऊपर प्रभु विश्वम्भर सुखपूर्वक बैठ गये ॥ 72-73 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सातवाँ अध्याय,- “विष्णुनैवेद्येर यत वर्ज्य हाँड़िगण। बसिलेन प्रभु, हाँड़ि करिया आसन ॥ 162 ॥ माये आसि' देखिया करेन हाय हाय। ए स्थानेते बाप, बसिवारे ना युयाय ॥ 167 ॥ प्रभु बोले,-सर्वत्र मोर अद्वितीय ज्ञान। एसब हाँड़िते मूले नाहिक दूषण ॥ 177 ॥ विष्णुर रन्धन-स्थाली कभु नाहि दुष्ट हय। से हाँड़ि-परशे आर स्थान शुद्ध हय ॥ 178 ॥ “विष्णु नैवेद्य बनानेके बाद हाँड़ियाँ जहाँ फेंक दी जाती थीं, वहाँ जाकर महाप्रभु एक हाँड़ीको आसन बनाकर बैठ गये। शचीमाता यह देखकर ‘हाय’ ‘हाय’ करती हुई आयीं और कहने लगीं, - ‘बेटा! यह स्थान बैठनेके योग्य नहीं है।' महाप्रभु बोले, - 'मेरा तो सर्वत्र ही अद्वितीय ज्ञान है। इन सब हाँड़ियोंके मूलमें कोई दोष नहीं है। जिस हाँड़ीमें विष्णुके लिये भोग बनाया जाता है, वह कभी भी दूषित नहीं हो सकती और उस हाँड़ीके स्पर्शसे सभी स्थान पवित्र हो जाते हैं'।” चैःचः अन्त्यलीला, 4/174-176 संख्या द्रष्टव्य है। (भाः 11/28/4- श्रीकृष्णने उद्धवसे कहा)- “किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत्। वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च ॥” “अद्वयज्ञान-सम्बन्धरहित सभी मायिक प्रतीति-युक्त वस्तुएँ वास्तवमें 'अवस्तु' और 'द्वैत' हैं, उसमें यह भली है अथवा बुरी है, इसके सम्बन्धमें मनके द्वारा जो चिन्तन होता है अथवा वाक्यके द्वारा जो कहा जाता है, वह सब असत्य है।” अर्थात् “भद्राभद्र-वस्तुज्ञान नाहि अप्राकृते।” “अप्राकृत वस्तुमें 'भले-बुरे' की बुद्धि करना उचित नहीं है।” “द्वैते भद्राभद्र-ज्ञान-सब मनोधर्म। एइ भाल, एइ मन्द, एइ सब भ्रम ॥” “द्वैत-भावसे जो भले-बुरेका ज्ञान है, वह सब मनोधर्म है। यह भला है, यह बुरा है-यह सब मनका भ्रम है।” (भाः 11/19/45)- “गुण-दोष-दृशिर्दोषो गुणस्तूभय-वर्ज्जितः ।” “(वास्तव वस्तुसे सम्बन्धरहित होकर) गुण और दोषका दर्शन 'दोष' और इन दोनों (गुण और दोष) को नहीं देखना ही गुण है।” (भाः 11/21/3-4)- “शुद्ध्यशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु। द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ ॥ 3 ॥ धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ ॥ 4 क ॥” “हे निष्पाप उद्धव ! द्रव्य योग्य अथवा अयोग्य है, इस सन्देहके निवारणके लिये द्रव्योंके धर्मार्थ (धर्म-सम्पादनके लिये) शुद्धि और अशुद्धि, व्यवहारार्थ (समाजका व्यवहार सुचारु रूपसे चले इसलिये) गुण और दोष तथा देहयात्रा (जीवन निर्वाहकी सुविधा) के लिये शुभ और अशुभ-निरूपण विहित है ॥” 73 ॥ शचीकी पुत्रको अशुद्धिके विचारके द्वारा सुधारनेकी चेष्टा :- शची आसि' कहे, - “केने अशुचि धुँइला। गङ्गास्नान कर याइ'- अपवित्र हइला ॥” 74 ॥ अनुवाद-शचीमाताने आकर कहा,- “तुमने इस अपवित्र स्थानका स्पर्श क्यों किया ? तुम अपवित्र हो गये हो, इसलिये अब जाकर गङ्गामें स्नान करके आओ ॥” 74 ॥ पुत्रका माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश :- इहा शुनि' माताके कहिल ब्रह्मज्ञान। विस्मिता हइया माता कराइला स्नान ॥ 75 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 185

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