भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 723

14/84–92 ] “मिश्र, तुमि पुत्रेर तत्त्व किछुइ ना जान। भर्त्सन-ताड़न कर,—पुत्र करि' मान'॥” 85 ॥ अनुवाद—उसी रात्रि जगन्नाथ मिश्रने स्वप्नमें देखा कि एक ब्राह्मण आकर उन्हें क्रोधित होकर कह रहा है,—“मिश्र, तुम अपने पुत्रके तत्त्वके सम्बन्धमें कुछ भी नहीं जानते हो, उसे केवल अपना पुत्र मानकर उसे डाँट-फटकार लगाते हो॥” 84-85 ॥ मिश्रका अप्राकृत स्नेहपूर्ण उत्तर :— मिश्र कहे,—“देव, सिद्ध, मुनि केने नय। ये से बड़ हउक्, एबे आमार तनय ॥ 86 ॥ पुत्रेर लालन-शिक्षा—पितार स्वधर्म। आमि ना शिखाले, कैछे जानिबे धर्म-मर्म॥” 87 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ मिश्रने कहा,—“यह देव, सिद्ध, मुनि ही क्यों न हो अथवा कोई महान् पुरुष ही क्यों न हो, किन्तु अभी तो मेरा पुत्र ही है। पुत्रका लालन-पालन और उसे शिक्षा देना, यह पिताका स्वधर्म है। यदि मैं इसे शिक्षा नहीं दूँगा, तो धर्मके रहस्यको कैसे जानेगा ? ॥” 86-87 ॥ विप्र और मिश्रकी उक्ति और प्रत्युक्ति :— विप्र कहे,—“एइ यदि दैव-सिद्ध हय। स्वतःसिद्धज्ञान, तबे शिक्षा व्यर्थ हय ॥” 88 ॥ मिश्र कहे,—“पुत्र केने नहे नारायण। तथापि पितार धर्म—पुत्रके शिक्षण ॥” 89 ॥ अनुवाद—ब्राह्मणने कहा,—“यदि तुम्हारा पुत्र सिद्ध देवता है, तो इसका ज्ञान स्वतः सिद्ध ही है, तब तुम्हारा इसे शिक्षा देना व्यर्थ है।” जगन्नाथ मिश्रने उत्तर दिया,—“मेरा पुत्र यदि स्वयं नारायण ही क्यों न हो, तो भी पुत्रको शिक्षा देना पिताका धर्म है॥” 88-89 ॥ अनुभाष्य—(श्रीजगन्नाथ मिश्रका) अपने पुत्र निमाईको अशिक्षित और अनभिज्ञ समझकर उसे शिक्षा देकर ज्ञानी बनानेकी अभिलाषाको देखकर ब्राह्मणने मिश्रसे कहा,—“तुम्हारे पुत्रके नित्यसिद्ध देवता होनेके कारण उसके नित्यसिद्ध स्वाभाविक ज्ञानको मूर्खता समझनेके कारण तुम्हारा उसे शिक्षा देना व्यर्थ है, इसलिये ऐसा करना तुम्हारे लिये अनुचित है॥” 88 ॥ महाप्रभुके प्रति मिश्रका शुद्ध वात्सल्य-स्नेह :— एइमते दुँहे करेन धर्मेर विचार। शुद्ध वात्सल्य मिश्रेर, नाहि जाने आर ॥ 90 ॥ अनुवाद—इस प्रकार दोनों धर्मका विचार करने लगे। किन्तु श्रीजगन्नाथ मिश्रका महाप्रभुके प्रति शुद्ध-वात्सल्य भाव होनेके कारण वे इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते॥ 90 ॥ अनुभाष्य—(भक्तिरसामृतसिन्धु पश्चिम विभाग चतुर्थ लहरी)— “विभावाद्यैस्तु वात्सल्यं स्थायी पुष्टिमुपागतः। एष 'वत्सल'-नामात्र प्रोक्तः ॥” “वात्सल्य-रतिको स्थायीभाव, विभावादिके द्वारा पुष्टि लाभ करनेपर उसे पण्डित लोग 'वात्सल्य-भक्तिरस' कहते हैं।” (भाः 10/8/45)— “त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः। उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम् ॥” “तीनों वेदों, उपनिषदों, सांख्य, योग और सात्वत-शास्त्रोंमें जिनके माहात्म्यका गान किया गया है, यशोदादेवी उन श्रीहरिको अपनी कोखसे उत्पन्न पुत्र मानती हैं॥” 90 ॥ स्वप्न समाप्त होनेपर मिश्रका विस्मित होना और बन्धुओंको स्वप्नके सम्बन्धमें बताना :— एत शुनि' द्विज गेला हञा आनन्दित। मिश्र जागिया हइला परम विस्मित ॥ 91 ॥ बन्धु-बान्धव-स्थाने स्वप्न कहिल। शुनिया सकल लोक विस्मित हइल ॥ 92 ॥ चौदहवाँ अध्याय | 187