श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 14/91-97 एइ मत शिशुलीला करे गौरचन्द्र। दिने दिने पिता-मातार बाड़िल आनन्द ॥ 93 ॥ अनुवाद-यह सुनकर वह ब्राह्मण आनन्दित होकर चला गया और जगन्नाथ मिश्र निद्रासे उठकर परम विस्मित हुए। जगन्नाथ मिश्रने अपने बन्धु-बान्धवोंको स्वप्नके विषयमें बतलाया, जिसे सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। श्रीगौरचन्द्र इस प्रकार बाल्यलीला करते, जिसे देखकर पिता-माताका आनन्द दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता ॥ 91-93 ॥ निमाइके हाथमें कलम (खड़िया) :- कत दिने मिश्र पुत्रेर हाते खड़ि दिल। अल्प दिने द्वादश-फला अक्षर शिखिल ॥ 94 ॥ अनुवाद-कुछ दिनोंके बाद जगन्नाथ मिश्रने निमाइके हाथोंमें कलम दी और कुछ ही दिनोंमें वे द्वादश-फला अक्षर सीख गये ॥ 94 ॥ अनुभाष्य-'द्वादश-फला'-रेफ, ण, न, म, य, र, ल, व, ऋ, ॠ, ऌ और ॡ फला ॥ 94 ॥ इति अनुभाष्ये चतुर्दश परिच्छेद। चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। यह बाल्यलीला-सूत्र विस्तारसे श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णित :- बाल्यलीला-सूत्र एइ कहिल अनुक्रम। इहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 95 ॥ अतएव बाल्यलीला संक्षेपे सूत्र कैल। पुनरुक्ति-भये विस्तारिया ना कहिल ॥ 96 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने बाल्यलीलाको क्रमानुसार सूत्र रूपमें कहा है, क्योंकि श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इन लीलाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसलिये मैंने पुनरुक्तिके भयसे विस्तारपूर्वक न कहकर बाल्यलीलाको संक्षेपमें सूत्ररूपसे ही वर्णन किया है ॥ 95-96 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 97 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे बाल्यलीला-सूत्रवर्णनं नाम चतुर्दश-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 97 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला बाल्यलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।