भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 710, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 710

[ 14/6-15 अपने श्रीचरणतलमें शंख-चक्र- ध्वज-वज्र-मीन-चिह्न-प्रदर्शन :- बाल्यलीलाय आगे प्रभुर उत्तान-शयन। पिता-माताय देखाइल चिह्न चरण ॥६॥ गृहे दुइ जन देखि' लघुपद-चिह्न। ताहातेइ ध्वज, वज्र, शङ्ख, चक्र, मीन ॥७॥ देखिया दोँहार चित्ते जन्मिल विस्मय। कार पदचिह्न घरे, ना पाय निश्चय ॥८॥ अनुवाद—महाप्रभुकी प्रथम बाल्यलीलाका वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि महाप्रभुने पीठके बल शयन करते हुए पिता-माताको अपने चरण-चिह्न दिखलाये। (इससे पूर्व) घरमें (पिता-माता) दोनोंने छोटेसे पदचिह्नोंको देखा जिसमें ध्वज, वज्र, शङ्ख, चक्र और मीन विद्यमान थे। यह देखकर दोनोंको बहुत विस्मय हुआ, किन्तु वे यह निश्चित नहीं कर पा रहे थे कि घरमें ये चरणचिह्न किसके हैं?॥६-८॥ अनुभाष्य—'उत्तान'—ऊपर मुख करके पीठके बल शयन करना; पाठान्तरमें 'उत्थान'—इस अर्थमें पैरोंके बलपर स्वयं खड़े होनेका प्रयास करनेपर अभ्यास नहीं होनेके कारण बालकों जैसी असमर्थता दिखाकर शयन किया॥६॥ मिश्रकी उक्ति :- मिश्र कहे, —"बालगोपाल आछे शिला-सङ्गे। तेंहो मूर्त्ति हञा खेले, जानि घरे रङ्गे ॥"९॥ अनुवाद—जगन्नाथ मिश्रने कहा, —"शालग्राम-शिलाके साथ घरमें बालगोपाल विराजमान हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे ही बालक बनकर आनन्दसे घरमें खेलते हैं॥"९॥ सेइ क्षणे जागि' निमाइ करये क्रन्दन। अङ्के लञा शची ताँरे पियाइल स्तन ॥१०॥ अनुवाद—निमाइ उसी समय जागकर रोने लगे, तब शचीमाताने उन्हें गोदमें लेकर स्तनपान कराया॥१०॥ शची और मिश्र, दोनोंके द्वारा निमाइके चरणचिह्न-दर्शन :- स्तन पियाइते पुत्रेर चरण देखिल। सेइ चिह्न पाये देखि' मिश्रे बोलाइल ॥११॥ देखिया मिश्रेर हइल आनन्दित मति। गुप्ते बोलाइल नीलाम्बर चक्रवर्त्ती ॥१२॥ अनुवाद—स्तनपान कराते समय उन्होंने पुत्रके चरणोंको देखा। उनमें उन्हीं चिह्नोंको देखकर शचीमाताने जगन्नाथ मिश्रजीको बुलाया। यह देखकर जगन्नाथ मिश्र बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने एकान्तमें नीलाम्बर चक्रवर्तीको बुलाया॥११-१२॥ नीलाम्बर चक्रवर्तीकी उक्ति :- चिह्न देखि' चक्रवर्त्ती बलेन हासिया। "लग्न गणि' पूर्वे आमि राखियाछि लिखिया ॥१३॥ बत्रिश लक्षण—महापुरुष-भूषण। एइ शिशु अङ्गे देखि से-सब लक्षण ॥१४॥ अनुवाद—उन चरणचिह्नोंको देखकर नीलाम्बर चक्रवर्तीने हँसकर कहा, —"मैंने तो पहलेसे ही लग्नकी गणना करके लिख रखा है। महापुरुषोंमें भूषणस्वरूप जो बत्तीस लक्षण हैं, मैं वे सब इस बालकके अङ्गोंमें देख रहा हूँ॥"१३-१४॥ महापुरुषके बत्तीस लक्षण :- सामुद्रका तीसरा-श्लोक— पञ्चदीर्घः पञ्चसूक्ष्मः सप्तरक्तः षडुन्नतः। त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरो द्वात्रिंशल्लक्षणो महान् ॥१५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नासिका, भुजाएँ, ठोडी, नेत्र और घुटना—ये पाँच दीर्घ (बड़े); त्वचा, केश, अँगुलीका अग्रभाग, दाँत और रोम—ये पाँच सूक्ष्म (पतले); नेत्रप्रान्त, चरणका तलवा, हथेली, तालु, अधर, ओष्ठ और नाखून—ये सात रक्त (लाल); वक्ष, स्कन्ध, 174 | श्रीचैतन्यचरितामृत