भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 709

चौदहवाँ अध्याय चौदहवें अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी बाल्यलीला वर्णित हुई है। महाप्रभुका घुटनोंके बल चलना, रोनेके छलसे नामका प्रचार, मिट्टी खानेके छलसे माताको ज्ञान प्रदान करना, अतिथि ब्राह्मणको अपना प्रसाद देकर उसका उद्धार, चोरोंके कन्धेपर चढ़कर उनको भुलाकर वापिस अपने घर ले आना, रोगके बहाने एकादशीके दिन हिरण्य-जगदीशका नैवेद्य खाना, बाल-चपलता, माताको मूर्च्छित देखकर नारियल लाकर देना, गङ्गाके तटपर कन्याओंके साथ परिहास, लक्ष्मीदेवीकी पूजाको ग्रहण करना, जूठे मिट्टीके बर्तनोंके गढ़ढ़ेमें बैठकर माताको ब्रह्मज्ञान प्रदान करना और माताकी आज्ञाका पालन करना तथा श्रीजगन्नाथ मिश्रका शुद्धवात्सल्य—ये सब बाल्यलीलाके प्रकरण इस अध्यायमें वर्णित हुए हैं। (अमृतप्रवाह भाष्य) (हरिभक्तिविलास 20/1)— कथञ्चन स्मृते यस्मिन् दुष्करं सुकरं भवेत्। विस्मृते विपरीतं स्यात् श्रीचैतन्यममुं भजे॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनको थोड़ासा भी स्मरण करनेपर कठिन विषय भी सहज हो जाता है और जिनको भूल जानेपर सहज विषय भी कठिन हो जाता है, उन श्रीचैतन्यका मैं भजन करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य—यस्मिन् (गौरकृष्णे) कथञ्चन (येन केन प्रकारेणापि) स्मृते (स्मरणपथमारूढ़े सति) दुष्करं (दुःसाध्यं कर्म) सुकरं (सहजसाध्यमनुष्ठानं) भवेत्, यस्मिन् (गौरकृष्णे) विस्मृते [सति] विपरीतं (सहजसाध्यमनुष्ठानं दुःसाध्यं कर्म) स्यात्, तं अमुं श्रीचैतन्यं भजे। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य, जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र, जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥ प्रभुर कहिल एइ जन्मलीला-सूत्र। यशोदानन्दन यैछे हैल शचीपुत्र॥ 3 ॥ संक्षेपे कहिल जन्मलीला-अनुक्रम। एबे कहि बाल्यलीला-सूत्रेरे गणन॥ 4 ॥ अनुवाद—मैंने महाप्रभुकी जन्मलीलाको सूत्ररूपमें और यशोदानन्दन ही शचीदेवीके पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुए हैं, इसका वर्णन किया। मैंने जन्मलीलाको क्रमानुसार संक्षेपमें ही वर्णन किया, अब बाल्यलीलाको सूत्ररूपमें कहूँगा॥ 4 ॥ मानुषी होनेपर भी श्रीगौरलीला अप्राकृत :— वन्दे चैतन्यकृष्णस्य बाल्यलीलां मनोहराम्। लौकिकीमपि तामीश-चेष्टया बलितान्तराम्॥ 5 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीचैतन्य-कृष्णकी मनोहर बाल्यलीलाओंकी वन्दना करता हूँ, ये बाल्यलीलाएँ लौकिक लीलाकी भाँति होनेपर भी ईश्वर-चेष्टासे मिश्रित हैं॥ 5 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यकृष्णस्य (गौरकृष्णस्य) लौकिकीं (प्रापञ्चिक-मानुष-चेष्टिताम्) अपि ईशचेष्टया (अलौकिकप्रयासेन) बलितान्तरां (बलितं युक्तम् अन्तरं यस्याः तां) मनोहरां (हृदयाकर्षिणीं) बाल्यलीलां (शैशवक्रीड़ाम्) अहं वन्दे॥ श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 5 ॥