श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 711, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें14/15–21 ] [बायाँ स्तम्भ] नाखून, नासिका, कटि और मुख—ये छह उन्नत; गर्दन, जङ्घा और मेहन (जनेन्द्रिय)—ये तीन ह्रस्व (छोटे); कटि, ललाट और वक्ष—ये तीन विस्तीर्ण (चौड़े); नाभि, स्वर, सत्त्व (बुद्धि)—ये तीन गम्भीर,—महापुरुष इन बत्तीस लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥15॥ अनुभाष्य—पञ्चदीर्घः (पञ्च नासा-भुज-हनु-नेत्र-जानूनि दीर्घाणि यस्य सः), पञ्चसूक्ष्मः (पञ्चत्वक्-केशाङ्गुलिपर्व-दन्त-रोमाणि सूक्ष्माणि यस्य सः) सप्तरक्तः (सप्त नयनप्रान्त-पदतल-करतल- ताल्र्वधरौष्ठनखाः च रक्ताः रक्तवर्णाः यस्य सः) षडुन्नतः (षट् वक्षः-स्कन्ध-नख-नासिका-कटि-मुखानि उन्नतानि उच्चानि यस्य सः) त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरः (त्रीणि ग्रीवा-जङ्घा-मेह्नानि ह्रस्वानि लघूनि, त्रीणि कटि-ललाट-वक्षांसि पृथुनि विशालानि, त्रीणि नाभि-स्वर-सत्त्वानि गम्भीराणि यस्य सः) द्वात्रिंशल्लक्षणः (एतानि द्वात्रिंशत् लक्षणानि यस्य सः जनः)—महान् (महापुरुषः)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥15॥ नीलाम्बर चक्रवर्ती द्वारा शिशुका माहात्म्य-वर्णन और भविष्यवाणी :— नारायणेर चिह्नयुक्त श्रीहस्त-चरण। एइ शिशु सर्वलोके करिबे तारण॥16॥ एइ त' करिबे वैष्णव-धर्मेर प्रचार। इहा हैते हबे दुइ कुलेर निस्तार॥17॥ अनुवाद—इस शिशुके श्रीहस्त-चरणोंमें वही चिह्न हैं जो नारायणके हस्त-चरणोंमें हैं, इसलिये यह सभी लोगोंका उद्धार करेगा। यह वैष्णव धर्मका प्रचार करेगा और इससे दोनों कुलोंका उद्धार होगा॥16-17॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘दुइकुलेर’—पितृकुल और मातृकुल॥17॥ नामकरण-महोत्सव :— महोत्सव कर, सब बोलाह ब्राह्मण। आजि दिन भाल,—करिब नामकरण॥18॥ 'विश्वम्भर' नाम :— सर्वलोके करिबे एइ धारण, पोषण। 'विश्वम्भर' नाम इहार,—एइ त' कारण॥”19॥ [दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—आजका दिन शुभ है, इसलिये मैं आज ही इसका नामकरण करूँगा, आप सभी ब्राह्मणोंको बुलाकर महोत्सव कीजिये। यह सभी लोगोंका धारण और पोषण करेगा, इसलिये इसका नाम 'विश्वम्भर' है॥”18-19॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय— “जगत् हइल सुस्थ इहान जनमे। पूर्वे येन पृथिवी धरिला नारायणे॥48॥ अतएव इहान ‘श्रीविश्वम्भर’ नाम॥49(क)॥” “जैसे पूर्वकालमें पृथ्वी श्रीनारायणके वराहावतारके द्वारा धारण किये जानेपर स्वस्थ हुई थी, वैसे ही इन बालकके जन्मके साथ ही सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ हो गया है अर्थात् श्रीकृष्णनाम-श्रवण-कीर्तनके प्रभावसे स्वरूपभ्रान्त- अनर्थ रोगसे ग्रस्त जीव-जगत्ने अपने स्वरूपमें स्थित होकर स्वास्थ्य (निश्चित मङ्गल) लाभ किया है, इसलिये इनका नाम ‘श्रीविश्वम्भर’ है।” 'विश्वम्भर'—अथर्ववेदसंहिता, दूसरा काण्ड, तीसरा अनुवाक्, तीसरा प्रपाठक, सोलहवाँ मन्त्र, पाँचवीं संख्या— “विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा।” “हे समस्त प्राणियोंका पोषण करनेवाले विश्वम्भरदेव! आप अपनी समस्त पोषण-शक्तिसे हमारी सुरक्षा करें और हमारी आहुति ग्रहण करें॥”19॥ शुनि' शची-मिश्रेर मने आनन्द बाड़िल। ब्राह्मण-ब्राह्मणी आनि' महोत्सव कैल॥20॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीशचीदेवी और श्रीजगन्नाथ मिश्र बड़े आनन्दित हुए तथा उन्होंने ब्राह्मणों और ब्राह्मणियोंको बुलाकर महोत्सव किया॥20॥ अलौकिक-चेष्टा-प्रदर्शन :— तबे कत दिने प्रभुर जानु-चक्रमण। तथा नाना चमत्कार कराइल दर्शन॥21॥ अनुवाद—कुछ दिनोंके बाद महाप्रभुने घुटनोंके चौदहवाँ अध्याय | 175