भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 712

[ 14/21-25 बल चलना आरम्भ किया। उस समय उन्होंने अनेक प्रकारकी चमत्कारिक लीलाएँ प्रकाशित कीं॥२१॥ अनुभाष्य—‘जानुचंक्रमण’—घुटनोंके बल चलना। चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय— “जानुगति चले प्रभु परम सुन्दर। कटिते किङ्कणी बाजे अति मनोहर॥ 65 ॥ एकदिन एकसर्प बाड़ीते बेड़ाय। धरिलेन सर्प प्रभु बालक-लीलाय॥ 67 ॥ कुण्डली करिया सर्प रहिल बेड़िया। ठाकुर थाकिला सर्प उपरे शुइया॥ 68 ॥ प्रभुरे एड़िया सर्प पलाय तखन॥” “जब परम सुन्दर महाप्रभुने घुटनोंके बल चलना आरम्भ किया, तो उनकी कटिमें बँधी किङ्कणीकी बड़ी सुन्दर झङ्कार होती थी। एक दिन एक सर्प उनके आङ्गनमें घूम रहा था, महाप्रभुने बाल्यक्रीड़ावश उसको पकड़ लिया। वह सर्प कुण्डली मारकर वहाँ बैठ गया और महाप्रभु उसके ऊपर सो गये। महाप्रभुके उठनेपर वह सर्प वहाँसे चला गया॥”२१॥ हरिनामसे रोना बन्द :- क्रन्दनेर छले बलाइल हरिनाम। नारी सब ‘हरि’ बोले,—हासे गौरधाम ॥ 22 ॥ अनुवाद—रोनेके छलसे महाप्रभु सबसे हरिनाम उच्चारण करवाते। (जब स्त्रियाँ महाप्रभुको रोते हुए देखतीं,) तो वे ‘हरि-हरि’ कहती, यह देखकर महाप्रभु हँसने लगते॥ २२ ॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड चौथा अध्याय— “तावत् कान्देन प्रभु कमललोचन। हरिनाम शुनिले रहेन ततक्षण॥ 8 ॥ परम सङ्केत एइ, सबे बुझिलेन। कान्दिलेइ हरिनाम सबेइ लयॆन॥ 9 ॥ प्रभु यॆइ कान्दे, सेइक्षणे नारीगण। हाते तालि दिया करे हरि-सङ्कीर्तन॥ 60 ॥ निरवधि सबार वदने हरिनाम। छले बोलायेन प्रभु, हेन इच्छा तान॥ 62 ॥” “कमलनयन महाप्रभु तब तक रोते रहते, परन्तु हरिनाम सुनते ही तुरन्त रोना बन्द कर देते। उनके इस परम सङ्केतको सभीने समझ लिया और उनके रोते ही सभी हरिनाम लेने लगते। जिस क्षण महाप्रभु रोने लगते, उसी क्षण सभी नारियाँ हाथोंसे ताली बजाकर हरिनाम सङ्कीर्तन करने लगतीं। इस प्रकार छलसे महाप्रभु सभीके मुखोंसे निरन्तर हरिनाम करवाते॥”२२॥ बालकोंके साथ क्रीड़ा :- तबे कत दिने कैल पद-चंक्रमण। शिशुगणे मिलि’ कैल विविध खेलन ॥ 23 ॥ अनुवाद—कुछ दिनोंमें महाप्रभुने अपने पैरोंपर चलना आरम्भ किया और फिर दूसरे बालकोंके साथ मिलकर अनेक प्रकारकी क्रीड़ाएँ करने लगे॥ 23 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, चौथा अध्याय— “एइमत दिने दिने श्रीशचीनन्दन। हाँटिया करेन प्रभु अङ्गने भ्रमण॥ 77 ॥” “इस प्रकार दिन-प्रतिदिन लीला करते हुए श्रीशचीनन्दन आङ्गनमें पैरोंपर चलते हुए भ्रमण करते॥”२३॥ एकदिन शची खइ-सन्देश आनिया। बाटी भरि’ दिया बोले,—“खाओ त’ बसिया ॥”24॥ अनुवाद—एक दिन शचीमाताने खील-सन्देशको कटोरीमें डालकर महाप्रभुको दिया और कहा,—“इसे यहाँ बैठकर खाओ॥”२४॥ अनुभाष्य—‘बाटी’—खाद्यद्रव्य अथवा ताम्बुल रखनेका पात्र अथवा बर्तन॥ २४ ॥ निमाइके द्वारा मिट्टी खाना :- एत बलि’ गेला शची गृहे कर्म करिते। लुकाञा लागिला शिशु मृत्तिका खाइते ॥ 25 ॥ अनुवाद—यह कहकर शचीमाता गृहके कार्य करने चली गयीं और उधर महाप्रभु छिपकर मिट्टी खाने लगे॥ 25 ॥ 176 | श्रीचैतन्यचरितामृत